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भाग्यश्री बोयवाड ने टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान हैदराबाद से वूमेंस स्टडीज में एमए किया है। भाग्यश्री TISS हैदराबाद में 2019-20 में स्टूडेंट्स कांउसिल की पहली दलित महिला चेयरपर्सन हैं। वर्तमान में भाग्यश्री आनंदी एरिया नेटवर्क एंड डेवलपमेंट, पंचमहल दहोत, गुजरात में वायलेंस अगेंस्ट वूमेन एंड गर्ल्स में प्रोजेक्ट को-ऑर्डिनेटर के पद पर कार्यरत हैं। भाग्यश्री का जीवन और शिक्षा के लिए संघर्ष दलित परिवारों की वास्तविक सच्चाई को उजागर करता है। मैंने दलित महिलाओं से जुड़े शिक्षा के अवसर और सुरक्षा पर उनसे बातचीत की। बातचीत के कुछ अंश नीचे प्रस्तुत हैं :

सवाल: आप महाराष्ट्र में कहां की रहने वाली हैं? क्या आप अपने पारिवारिक पृष्ठभूमि के  विषय में कुछ साझा करना चाहेंगी?

भाग्यश्री : मैं मराठवाड़ा के एक पिछड़े जिले नांदेड़ से हूं। मैं आर्थिक रूप से पिछड़े परिवार से हूं, मेरे पिता एक ऑटो-चालक के रूप में काम करते हैं और मां एक घरेलू कामगार हैं। हमारे पास अपना घर नहीं है। हम बचपन से ही किराये के घर में रहे हैं। मेरे दोनों भाई-बहनों (एक बहन और एक भाई) में मैं बड़ी हूं। मेरी शिक्षा का सफर बेहद चुनौतीपूर्ण था। शिक्षा के लिए मैंने स्कूल दौरान ही काम करना शुरू कर दिया था। बेहतर नौकरी के अवसरों के लिए, मैं और मेरा परिवार पुणे आ गए। वहां मैंने Aundh Military Camp में मजदूरी की, वहां काम करके मुझे प्रतिदिन 120 रुपये मिलते थे। पर उस काम को करते हुए और कुछ भी करना अधिक कठिन लगा, इसलिए मैंने अपनी नौकरी बदल ली। मैं पॉली हाउस चला गयी और गुलदस्ता बनाने वाले श्रमिक के रूप में काम करने लगी। कुछ महीनों के बाद, मैंने राष्ट्रीय बीमा अकादमी के साथ एक बगीचे के मजदूर के रूप में काम करना शुरू कर दिया। जब मैं ग्यारहवीं क्लास में थी तो आर्थिक तंगी की वजह से मुझे पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी। छह महीने काम करके और कमजोर परिस्थितियों में रहकर, आखिरकार मैंने ग्यारहवीं में खुद को नामांकित करने के लिए कुछ पैसे बचा लिए थे। फिर भी मैं नियमित क्लास में शामिल नहीं हो सकती थी क्योंकि मुझे स्कूल की फीस देनी थी। मैं अच्छे अंकों (80.31%) के साथ हाई स्कूल से पास आउट होने में कामयाब रही, लेकिन स्कूल अधिकारियों द्वारा मुझे स्वीकार नहीं किया गया क्योंकि मैं दलित पृष्ठभूमि से थी।

मैंने काम कर के डिस्टेंस से ग्यारहवीं और बारहवीं की पढ़ाई पूरी की। मैंने ठान लिया था कि मैं अपनी पढ़ाई जारी रखूंगी। मैंने नांदेड़ के ही एक कॉलेज में सोशल वर्क से स्नातक किया। मुझे वहां भी भेदभाव का सामना करना पड़ा। लोग मुझे नहीं पसंद करते थे क्योंकि मैं अपनी बात सामने रखती थी। मुझे लोग अपने से अलग मानते थे, लोगों ने मेरी त्वचा के रंग पर भी टिप्पणी की क्योंकि मैं दलित हूं। उन्होंने मुझे महसूस कराया कि मैं अपनी जाति के कारण बाकी छात्रों के बराबर नहीं हो सकती। कॉलेज में रहते हुए मेरे लिए नौकरी ढूंढना मुश्किल था क्योंकि लोग मुझसे मेरी जाति और पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में पूछते रहते थे। वहां मैंने TISS के बारे में सुना। मुझे लोगों ने बताया कि मैं TISS में एडमिशन लेकर स्कॉलरशिप से पढ़ाई ज़ारी रख सकती हूं। फिर मैंने TISS में वूमेंस स्टडीज में अप्लाई किया और मेरा यहां सेलक्शन हो गया।  

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सवाल: TISS हैदराबाद में पढ़ने का अनुभव आपके लिए कैसा रहा?

भाग्यश्री : जब मैं TISS आयी तो यहां आकर पता चला की हॉस्टल में एक माह रहने की फी 8500 है, यह मेरे लिए बहुत ज्यादा थी। TISS हैदराबाद का अपना हॉस्टल नहीं है। प्राइवेट सर्विस प्रोवाइडर्स हॉस्टल चलाते हैं। यह सब देखकर पहले तो मैं वापिस चली गई फिर किसी तरह घर से 5000 रुपये का इंतज़ाम कर के मैं वापिस TISS आई। मैंने सर्विस प्रोवाइडर से बहुत विनती की तो 5000 देकर मैं हॉस्टल में रह पाई। एक बार तो हॉस्टल फीस ना भरने की वजह से सर्विस प्रोवाइडर ने मेरी बिजली और पानी ही बंद कर दिया था। TISS में स्कॉलरशिप की व्यवस्था थी, पर बहुत लड़ने के बाद मात्र 22 बच्चों को स्कॉलरशिप मिली। हम कई SC/ST स्टूडेंट्स थे जिनके परिवार की मासिक आय 5000 से अधिक नहीं थी। हॉस्टल सर्विस प्रोवाइडर्स हमको बोलते थे तुम SC/ST यहां घुस गए हो, जब पैसा नहीं है तो क्यों आते हो। अक्सर सर्विस प्रोवाइडर्स हॉस्टल में आकर हम पर जाति के आधार पर कुछ न कुछ बोलते ही रहते थे। अभी मेरी और कई SC/ST स्टूडेंट्स की हॉस्टल फीस बाकी हैं। जब तक हम सभी SC/ST स्टूडेंट्स हॉस्टल का बकाया नहीं देते, हमारी डिग्री नहीं मिलेगी। अभी मैं यहां गुजरात में काम कर रही हूं, पैसा जमा करुंगी तो फिर मेरा बकाया क्लियर होंगे और मुझे मेरी डिग्री मिलेगी।

TISS में मेरे सहपाठी और अध्यापक अच्छे हैं। TISS ने मुझे कुछ ऐसी चीजों को अनलर्न करना सिखाया है जो सामाजिक निर्माण द्वारा मुझमें अंतर्निहित थीं। मुझे मेरा डिपार्टमेंट अच्छा लगा, पर यहां भी कुछ दूसरे डिपार्टमेंट के छात्र थे जो मुझे मेरे कपड़ों पर टिप्पणी करते थे कि मुझे TISS की हवा लग गई है। जब TISS में चेयरपर्सन इलेक्शन का समय आया तब भी कई छात्रों ने कहा मैं दलित हूं, महिला हूं, मुझे अंग्रेज़ी ठीक से नहीं आती, मैं कैसे संभाल सकती हूं, मुझे राजनीतिक ज्ञान नहीं है। वूमेंस स्टडीज में पढ़ने की वजह से भी दूसरे डिपार्टमेंट के स्टूडेंट्स लेबल करते थे। अन्य डिपार्टमेंट के छात्र बोलते थे,  “हां बहुत सुना है इनका स्ट्रूगल हमको पता है” तो यह सब बुरा लगता था। पर कुछ लोग ऐसे भी थे जो बहुत सपोर्ट करते थे। फिर इलेक्शन हुआ और मैं चेयरपर्सन बन गई। अभी मैं देखती हूं कि हैदराबाद में कई यूनिवर्सिटी में महिलाएं काउंसिल की मेंबर तो हैं पर चेयरपर्सन नहीं हैं। दलित महिलाएं काउंसिल में ना के बराबर हैं। मैंने देख लिया है जहां भी जाओ संघर्ष ही हैं हमारे जीवन में।

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हॉस्टल सर्विस प्रोवाइडर्स हमको बोलते थे तुम SC/ST यहां घुस गए हो, जब पैसा नहीं है तो क्यों आते हो। अक्सर सर्विस प्रोवाइडर्स हॉस्टल में आकर हम पर जाति के आधार पर कुछ न कुछ बोलते ही रहते थे। अभी मेरी और कई SC/ST स्टूडेंट्स की हॉस्टल फीस बाकी हैं। जब तक हम सभी SC/ST स्टूडेंट्स हॉस्टल का बकाया नहीं देते, हमारी डिग्री नहीं मिलेगी।

सवाल : समाज में जो जातिगत असमानताएं हैं, उसका आपके बचपन अथवा परिवार पर क्या असर पड़ा?

भाग्यश्री : बचपन से मैं यह सुनती आ रही हूं कि मैं एक विशेष जाति से हूं। गांव में भी जातिगत अत्याचार होते हैं। उच्च जाति वाले अत्याचार करते हैं फिर उनके खिलाफ आवाज़ उठाओ तो पानी नहीं देते, बिजली काट देंगे, रास्ते बंद कर देंगे। शहर हो या गांव जातिगत अत्याचार हर जगह है। शहर में ऐसा बोलते हैं कि जाति अब नहीं है, पर अभी भी शहर में कहीं जाओ तो बोलेंगे चप्पल पहन कर अंदर आ सकते हो (पहले तो चप्पल भी बाहर उतारना होता था) पर यहां ही बैठो, इससे आगे अंदर मत आओ। मैं अभी का एक उदाहरण दूं तो मैं अभी यहां आंबेडकर नगर में रहती हूं, तो एक बार मुझे अंग्रेज़ी की क्लास लगाने एक जगह जाना था। मैं वहां गई तो वहां जो अफसर थे उन्होंने कहा, “अच्छा आंबेडकर नगर में रहती हो। वो तो गरीबों का एरिया है, वहां तो दलित और आदिवासी लोग रहते हैं।” तो शहरों में जातीय आधार पर विभाजन साफ़ देखने और अनुभव करने को मिलता है।

एक सभा में भाग्यश्री

सवाल : दलित महिलाओं की शिक्षा के अवसर और रोज़गार के बारे में आपके क्या विचार हैं?    

भाग्यश्री : दलित महिलाओं की शिक्षा की स्थिति बहुत ख़राब है। अधिकतर दलित लड़कियां फर्स्ट जनरेशन लर्नर हैं। गांव में स्कूल दूर होने के कारण वो स्कूल नहीं जा पाती और यदि जाती भी हैं तो घर से निकलने के बाद वो सुरक्षित नहीं हैं। ऐसा नहीं है कि दलित परिवार अपनी लड़कियों को पढ़ाना नहीं चाहते। परिवारों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति इतनी कमज़ोर है कि दलित लड़कियों को विश्वविद्यालय तक पहुंचने में बहुत सी चुनौतियों का  सामना  करना पड़ता है। फिर भी दलित लड़कियां विश्वविद्यालय तक पहुंचने का पूरा प्रयास करती हैं। परेशानी यह है कि यदि कोई दलित लड़की विश्वविद्यालय में एडमिशन ले लेती है या उनको नौकरी मिल जाती है तो आरक्षण के नाम पर उनको बहुत कुछ सुनना पड़ता है, जाति की वजह से अपमानित किया जाता है। कभी-कभी तो इतना अपमानित किया जाता है कि दलित लड़कियां या कुछ लड़के भी आत्महत्या कर लेते हैं। फिर लोग बोलते हैं आत्महत्या करना व्यक्तिगत मामला है। दरअसल ये व्यक्तिगत मामला नहीं है, ये जाति आधारित हिंसा है।  

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सवाल : हिंसा-हिंसा है, हिंसा को जाति की संरचना से जोड़ कर नहीं देखना चाहिए, आपके इस पर क्या विचार हैं ?

भाग्यश्री : मैं मानती हूं कि जब दलित महिला पर हिंसा होती है तो वह एक जातीय हिंसा ही  है। जाति के साथ लैंगिक हिंसा है। यह एक महिला के साथ उसके पूरे समाज का शोषण है। मैं यह मानती हूं कि दलित महिला पर जब किसी भी प्रकार की हिंसा होती है तो हिंसा का कोई भी रूप हो उसको दबाया जाता है। पुलिस भी सत्ता और उच्च जाति के लोगों से साथ मिली होती है। एफआईआर नहीं लिखी जाती, पुलिस खुद भद्दे और बेमतलब के सवाल पूछती है। जब दलित महिला के साथ बलात्कार या किसी प्रकार से उनका शारीरिक उत्पीड़न होता है तो SC,ST एक्ट के तहत कार्रवाई नहीं की जाती। जांच करने में बहुत समय लगा दिया जाता है। जब उच्च परिवार की लड़की के साथ कोई भी घटना होती है तो देश की बेटी है , देश का मुद्दा है , ऐसे सुनने को मिलता है। जब दलित लड़की के साथ ऐसी कोई घटना होती है तो उसको दबाया जाता है। मैं यह नहीं मानती कि यह हिंसा जाति आधारित नहीं है क्योंकि गांव या अन्य जगह पर रहने वाले लोगों को पता होता है कि लड़की दलित परिवार से है। वो या उसका परिवार क्या करते हैं, परिवार की कितनी आय है उच्च वर्ग को सब जानकारी होती है।  

सवाल : भारत में दलित महिलाओं और उनके जीवन की असुरक्षा के बारे में आप क्या कहना चाहती हैं? 

भाग्यश्री : दलित महिलाओं और उनके जीवन की सुरक्षा के बारे में मैं बहुत चिंतित हूं। सच कहूं तो दलित महिलाओं की सुरक्षा का मुद्दा किसी को गंभीर नहीं लगता है। जब कुछ बड़ी हिंसा होती है तब लगता है कुछ तो हुआ है, पर उसको भी ठीक से संज्ञान में नहीं लिया जाता। कई लोग तो ऐसा बोलते हैं कि दलित महिलाएं आगे नहीं आती, कुछ बोलती नहीं हैं। जबकि हम लिखते हैं, बोलते हैं पर ये ब्राह्मणवादी और जातिवादी समाज हमें सुनता ही नहीं है। हमारी आवाज़ को दबा दिया जाता है। लोग लिखते हैं, बोलते हैं दलित लाइव्स मैटर, आदिवासी लाइव्स मैटर, माइनॉरिटी लाइव्स मैटर लेकिन ये जो मनुवादी और ब्राह्मणवादी मीडिया हैं, कई लोग हैं जिनके लिए वास्तव में कुछ भी मैटर नहीं करता है। इस समाज में जॉर्ज फ्लॉयड को रेसिस्म की वजह से मार दिया जाता है तो मीडिया और पूरी फिल्म इंडस्ट्री सपोर्ट में आते हैं, बोलते हैं ब्लैक लाइव्स मैटर। लेकिन अभी कौन हैं जो हमारे साथ सॉलिडेरिटी दिखा कर रहे हैं या बोल रहे हैं। हम हीं हैं जो लिख रहे हैं, बोल रहे हैं। यदि मैटर करता तो एक के बाद एक हिंसा की खबरें नहीं आतीं। हमारे बारे में मीडिया भी ठीक से रिपोर्ट नहीं करता, केस रजिस्टर नहीं किए जाते। अक्सर बलात्कार के केस में पोस्टमार्टम भी नहीं होता है, होता भी है तो महिला और परिवार वालों को मानसिक या शारीरिक रूप से परेशान किया जाता है। पुलिस खुद ही मोरल पोलिसिंग करती है। पुलिस तंत्र, न्यायपालिका और उच्च ओहदे पर बैठे लोग सभी दलित महिलाओं के जीवन के साथ न्याय नहीं करते। दलित महिलाएं और दलित हम सभी असुरक्षित हैं।

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सवाल : कई लोग यह मानते हैं कि महिलाओं का बलात्कार करने वाले पुरुषों को फांसी दी जानी चाहिए। आपका इस पर क्या सोचना है?

भाग्यश्री : मृत्युदंड दलित और आदिवासी लोगों पर इस्तेमाल किया जाने वाला हथियार है। घटना कोई भी हो, न्याय होना चाहिए। ठीक से एफआईआर दर्ज होनी चाहिए। दलित महिला और उसके परिवार को सुरक्षा दी जानी चाहिए। महिला से सम्मानपूर्वक बात करनी चाहिए। मेडिकल रिपोर्ट और अन्य जांचें जल्द से जल्द होनी चाहिए। नेशनल वूमन कमीशन SC/ST के लिए सक्रिय होना चाहिए, और वहां पर जो महिलाएं कार्यरत हैं वो उसी समुदाय से होनी चाहिए। जब भी कोई घटना होती है तो तुरंत कार्यवाही करने वाली जिम्मेदार टीम होनी चाहिए। जांच की टीम में एक महिला दलित डॉक्टर भी होनी चाहिए। यदि कुछ भी गड़बड़ हो तो पुलिस और सरकार को तुरंत एक्शन लेना चाहिए। पुलिस सवेंदनशील होनी चाहिए। अभी हाथरस में जो हिंसा हुई है उसमें गंव में वालमिकी समाज के 15 या 16 ही घर हैं बाकि 500 से 600 घर उच्च जाति के हैं, तो ऐसे में दलित परिवार यह बोलता है कि जब मामला शांत पड़ जाएगा तो उच्च जाति के लोग हमको परेशान करेंगे। मेरा मनना है दलित परिवार और समाज को सुरक्षा प्रदान करने के लिए कोई वैकल्पिक तंत्र बनाना होगा। पुलिस और अन्य अधिकारी यदि रिपोर्ट करने में या कानूनी कार्रवाई करने में देर करते हैं तो उन पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।

सवाल : दलित महिलाओं के आंदोलन को और मजबूत बनाने के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण कदम क्या होना चाहिए?  

भाग्यश्री : दलित महिलाओं का आंदोलन दलित महिलाओं के हाथ में होना चाहिए। एकजुटता के लिए हमारे साथ अधिक से अधिक लोग आगे आने चाहिए। दलित महिलाओं को शिक्षा के लिए स्कूल से उच्च शिक्षा तक स्कॉलरशिप मिलनी चाहिए। शिक्षा और रोजगार के अवसर पर हमारा अधिकार हो, इसके लिए हम सभी को मिलकर आगे आना होगा, लड़ना होगा। सभी को दलित महिलाओं के मुद्दों, अधिकार और संघर्ष को गंभीर रूप से लेना होगा।

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(सभी तस्वीरें रितिका श्रीवास्तव द्वारा उपलब्ध करवाई गई हैं।)

Ritika Srivastava has completed her M.Phil. in Education from Tata Institute of Social Sciences, Hyderabad. Presently She is pursuing Ph.D. in Education from the same institute. After M.Phil., She worked in the Regional Institute of Education (NCERT) Bhopal as Assistant Professor in Education. She likes to work with children and teachers. She likes to read, write, and discuss contemporary equity and equality issues of education and society.

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3 COMMENTS

    • Many things have to learn from Bhagyashree. Your struggle, ignoring people’s comments, criticism, and interest to learn brought you to here. I wish me and my friends, girls should learn from you. Best wishes.❤️❤️

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