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अक्टूबर के महीने को ‘ब्रेस्ट कैंसर जागरूकता महीने’ के रूप में मनाया जाता है। यूं तो ब्रेस्ट कैंसर कोई संक्रामक रोग नहीं है, मगर फिर भी इससे प्रभावित भारतीय महिलाओं की संख्या को देखकर यह कहा जा सकता है कि किसी महामारी की तरह ही यह बीमारी भी देश में तेज़ी से पांव पसार रही है। WHO के ही मुताबिक हर साल दुनिया में ब्रेस्ट कैंसर के 1.38 मिलियन नए केस दर्ज होते हैं और तकरीबन 4,58,000 लोगों की मौत हो जाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी WHO द्वारा इसी साल के फ़रवरी माह में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार साल 2018 में भारत में कैंसर से तकरीबन 1.16 मिलियन केस दर्ज किए गए थे, जिसमें 5.87 लाख महिलाएं शामिल थी। साथ ही इनमें से 1,62,500 महिलाएं ब्रेस्ट कैंसर से पीड़ित थी। WHO के ही मुताबिक हर साल पूरी दुनिया में ब्रेस्ट कैंसर के 1.38 मिलियन नए केस दर्ज होते हैं और तकरीबन 4,58,000 लोगों की मौत हो जाती है।

साल 2016 में आई इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च और PHFI की स्टडी के मुताबिक बीते 26 सालों में ब्रेस्ट कैंसर भारतीय महिलाओं में सबसे अधिक पाए जाने वाला कैंसर बन चुका है। हमारे देश में 60 फीसद से अधिक महिलाएं जो ब्रेस्ट कैंसर से पीड़ित हैं उन्हें इस बीमारे के बारे में कोई जानकारी और जागरूकता न होने के कारण वे काफी देर बाद चिकित्सीय परामर्श लेती हैं। विदेशों में महिलाओं को ब्रेस्ट कैंसर 50 साल की उम्र के बाद होता है लेकिन भारत में 30 से 50 साल की उम्र की महिलाएं सबसे अधिक ब्रेस्ट कैंसर से पीड़ित हैं। साथ ही विशेषज्ञों का मानना है कि हर 22 में से एक शहरी महिला को ब्रेस्ट कैंसर होने की संभावना होती है।

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कैंसर एक ऐसी बीमारी है जो समय के साथ और खतरनाक होती जाती है। एक आंकड़े के मुताबिक़ भारत में लगभग 50 फीसद महिला मरीज इस बीमारी के दूसरे अथवा तीसरे चरण में पहुंचने पर यह जान पाती हैं कि उन्हें ब्रेस्ट कैंसर है। वहीं, कैंसर के इलाज के दौरान एक बार सर्जरी होने के बाद भी बीमारी के हमेशा के लिए खत्म हो जाने का दावा नहीं किया जा सकता। दुर्भाग्यवश यह बीमारी कभी भी लौट कर आ सकती है। भारत में 60 प्रतिशत महिलाएं ‘पोस्ट-कैंसर’ यानि सर्जरी के बाद दोबारा होने वाले कैंसर से पीड़ित हैं।

बात अगर पुरुषों में ब्रेस्ट कैंसर की करें तो अमेरिकन कैंसर सोसाइटी के एक शोध के अनुसार ब्रेस्ट कैंसर के कुल मरीजों में केवल 1 फीसद पुरुष होते हैं। शोध की माने तो साल भर में अमेरिका में लगभग 2600 केस सामने आते हैं जिनमें से करीब 440 केस में ही पीड़ित पुरुषों की मौत होती है। पुरुषों में इस बीमारी के पता चलने की उम्र औसतन 50 से 60 साल के बीच होती है।

कैंसर एक ऐसी बीमारी है जो समय के साथ और खतरनाक होती जाती है। एक आंकड़े के मुताबिक़ भारत में लगभग 50 फीसद महिला मरीज इस बीमारी के दूसरे अथवा तीसरे चरण में पहुंचने पर यह जान पाती हैं कि उन्हें ब्रेस्ट कैंसर है।

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ब्रेस्ट कैंसर के लक्षण

ब्रेस्ट का सबसे आम लक्षण स्तन में गांठ का महसूस होना है। मुमकिन है कि सामने से देखने में यह गांठ किसी उभार की तरह आपको न दिखाई दे मगर जिस व्यक्ति को यह होता है उसे यह गांठ महसूस होती है। यह एक आम लक्षण है जिसके दिखने के बाद ज़्यादातर महिलाएं डॉक्टर के पास जाती हैं। मगर बहुत से मामलों में यह बीमारी अपने विकसित रूप में पहुंचने पर यह लक्षण दिखाती है, इसलिए ज़रूरी है कि अन्य लक्षणों को भी ध्यान में रखा जाए। ये लक्षण निम्नलिखित हैं –

  • त्वचा के रंग में परिवर्तन होना, स्तन में सूजन अथवा उसके आकार में परिवर्तन होना।
  • स्तन में हल्का सा दर्द बना रहना।
  • निप्पल से किसी द्रव का अत्यंत सूक्ष्म मात्रा में स्त्रावित होना।
  • स्तन में गाँठ का महसूस होना।
  • स्तन में आंतरिक खुजली महसूस होना।

मुमकिन है कि उपरोक्त सभी लक्षण किसी महिला को एक साथ महसूस न हो लेकिन इनमें से कोई भी लक्षण दिखाई देने पर डॉक्टर से ज़रूर संपर्क करना चाहिए। साथ यह बात ध्यान में रखना भी आवश्यक है कि चूंकि ब्रेस्ट कैंसर कई प्रकार के होते हैं इसलिए हर कैंसर के कुछ विशिष्ट लक्षण भी होते हैं।

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जागरूकता ही है बचाव

ब्रेस्ट कैंसर एक गंभीर बीमारी है मगर दुर्भाग्यवश लोगों में ब्रेस्ट कैंसर को लेकर जागरुकता यूँ तो कम थी ही साथ ही कोरोना के विस्तार ने महिलाओं को उनके स्तन की देखभाल करने और मेडिकल सलाह लेने की आदत में कमी ला दी है। महिलाओं के लिए यह सवाल दुविधापूर्ण हो गया है कि वह अपनी नियमित जाँच के लिए अस्पताल जाएँ या फिर कोरोना से बचाव के लिए घरों में रहें।

सर्वाइवर नेट नामक एक संस्था द्वारा हाल में किए एक सर्वे के मुताबिक कोरोना की वजह से महिलाओं के लिए ब्रेस्ट कैंसर के लिए अपने शरीर की देखभाल करना और नियमित डॉक्टर से मिलना प्राथमिकता में नहीं रह गया है। सर्वे के मुताबिक़ प्रत्येक 3 में से 1 महिला ने यह माना है कि वर्तमान में ब्रेस्ट कैंसर से बचाव के बरक्स उसकी प्राथमिकता कोरोना से खुद की रक्षा करना है। चूँकि देशभर में कोरोना के मामलों में तेज़ी से वृद्धि हो रही है ऐसे में अस्पताल जाना कोरोना को निमंत्रित करने जैसा है। 29 प्रतिशत महिलाओं के लिए ब्रेस्ट कैंसर से बचाव दूसरी प्राथमिकता है।

ऐसे समय में जब दुनिया भर में कोरोना ने आतंक मचाया हुआ हो और देश की चिकित्सा व्यवस्था खुद वेंटिलेटर में चली गई हो ऐसे में ‘ब्रेस्ट कैंसर जागरुकता माह’ की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। कोरोना के दौर में एक ओर बीमारी होने के खतरे के कारण लोग अस्पतालों से दूर हैं तो वहीँ दूसरी ओर यातायात के दुर्गम हो जाने के कारण यह दूरी और भी गाढ़ी हो गई है। चूँकि ज़्यादातर अस्पताल प्रदेश की राजधानी या फिर दिल्ली में हैं ऐसे में यातायात का सुचारू परिचालन इन बीमारियों के इलाज के लिए एक अनिवार्यता बन जाता है।

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तस्वीर साभार : DNA

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