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अंजु सिंह

उत्तर प्रदेश के हाथरस मे हुई घटना वाकई दिल दहला देने वाली घटना है जो मानवता को तार-तार कर रही है। जिस तरह से हमारी एक दलित बच्ची का चार ठाकुरों ने बलात्कार किया और फिर मरने के लिए छोड़ दिया। मरने का इंतजार ख़त्म होने के बाद उस बच्ची के शव को परिवार की मर्जी के बिना पेट्रोल डालकर जला डाला। इस तरह का रवैया प्रशासन की मानसिकता को दिखाता है कि आज भी वे दलित महिलाओं के स्वाभिमान का सम्मान नहीं करते हैं। ना ही दलित महिलाओ के ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा को गंभीरता से ले रहे हैं। सरकार और प्रशासन की तरफ से ऐसी कोई कोशिश नहीं होती दिख रही जिससे पीड़ित परिवार को न्याय मिलने में राहत मिल सके और न्याय पाने के रास्ते उनके लिए आसान हो सके। ऐसा करने की जगह वर्तमान सरकार और प्रशासन हाथरस पीड़ित के परिवार वालों को ही डरा-धमका रही है। इस तरह का दबाव पुलिस और प्रशासन के लिए यह पहला प्रकरण नहीं है। हाथरस से पहले भी ऐसे मामले हमारे सामने आ चुके हैं। 

अक्सर यही होता है कि दलित परिवार का मुंह बंद करने के लिए उनके घर की औरतों के ख़िलाफ़ हिंसा की जाती है ताकि दलित परिवार अपनी इज़्ज़त की खातिर चुप रहे। इस तरह चेतावनी और चुनौती के रूप मे उच्च जाति के लोग पूरे दलित समाज को यह संदेश देते हैं कि अगर दलित समाज इस तरह के अपराधियों और लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई करेगा या दलित समाज ने आगे बढ़ने की सोची तो दलित महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा को अंजाम देकर दलितों का मुंह बंद कर देंगे। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इस केस में ठाकुरों की रंजिश पहले से ही इस दलित परिवार के साथ चल रही थी। जिसके चलते इन लोगों ने एक बार पहले भी इस बच्ची के पिता पर भी हमला किया और उनकी ऊंगली तक काट दी थी। पीड़ित परिवार लगातार अपने साथ हुए अन्याय के खिलाफ आवाज उठा रहे थे तो कथित रूप से परिवार की आवाज़ दबाने के लिए इस बच्ची को अपना निशाना बनाया, जैसा की हमेशा दलित महिलाओं के ख़िलाफ़ ऊंची जातियों द्वारा होने वाली हिंसा में देखने को मिलता है।

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इस तरह की हरकतें सदियों से होती आ रही हैं जिन्हें हम आज भी देखने और झेलने को मजबूर हैं। ऐसी स्थिति के बावजूद भी कोई यह बात मानने को तैयार नहीं है कि दलित महिलाओं पर होने वाली हिंसा और अत्याचार का कारण जाति, पितृसत्ता और आर्थिक निर्भरता उच्च जाति के लोगों पर होना ही है। इस सत्य को ना कभी प्रशासन स्वीकार करता है, ना मीडिया और न ही सवर्ण लोग स्वीकार करते हैं। इन सभी ने हमेशा से इस सच्चाई को नकारा है जिसके कारण दलित महिलाओं पर अत्याचार बढ़ते ही रहे हैं जिनका ख़ामियाज़ा दलित महिलाएं अपनी जान गंवाकर चुका रही हैं।

किसी इंसान की अंतरआत्मा को जगाने के लिए किसी दूसरे इंसान को कितनी बेरहमी से कुचला जाना चाहिए? क्या तभी हमारे अंदर की आत्मा जागती है जब किसी की जान चली जाती है ? जब दिल्ली में दिसंबर 2012 में एक गैंगरेप की घटना हुई तब पूरा देश सड़कों पर निकल आया। इंसाफ की मांग के लिए इस देश के हर एक इंसान की सहानुभूति उस पीड़ित के साथ थी। लेकिन इसी देश मे एक दिन में 10 दलित औरतों और बच्चियों का बलात्कार होता है पर किसी का ध्यान इस तरफ नही जाता और किसी को खबर तक नहीं होती है। यहां तक कि खबर के रूप में मुख्यधारा की मीडिया में इसे दिखाया तक नहीं जाता। जैसे-तैसे मीडिया मे खबर आ भी गई और केस थोड़ा भी हाईलाइट हुआ तो कुछ लोग आएंगे विरोध-प्रदर्शन करेंगे कैंडल मार्च करेंगे। अलग- अलग प्लेटफॉर्म पर दस्तावेज के रूप मे देखेंगे और फिर सब शांत। फ़िर इसके बाद क्या होता है ? यहां तक कि उस पीड़ित परिवार की कोई खैर-खबर तक नहीं लेता कि उस परिवार को न्याय और जीवन चलाने के लिए किन चीज़ों की ज़रूरत है इस बात की खोज़-खबर भी नहीं ली जाती।

कोई यह बात मानने को तैयार नहीं है कि दलित महिलाओं पर होने वाली हिंसा और अत्याचार का कारण जाति, पितृसत्ता और आर्थिक निर्भरता उच्च जाति के लोगों पर होना ही है। इस सत्य को ना कभी प्रशासन स्वीकार करता है, ना मीडिया और न ही सवर्ण लोग स्वीकार करते हैं।

आज भी यही सब देख रही हूं और चिंतित हूं और खुश भी। खुश इसलिए कि हमारी एक दलित बहन को न्याय दिलाने के लिए इतने लोग सड़कों पर आ गए हैं। इस केस को हाईलाइट करने में मदद कर रहे हैं, लेकिन चिंतित इस लिए हूं कि ये भी बाकी प्रकरणों की तरह कुछ समय या कुछ दिनों की कहानी ना बन कर रह जाए और ये केस भी न दब जाए। पिछले 10 सालों के अनुभवों के अनुसार न जाने ऐसे कितने प्रकरण रहे हैं जिनमे न्याय के लिए हर स्तर पर पैरवी की है। इन प्रकरणों के अनुभवों मे यह हाथरस पहला प्रकरण नहीं है जहां एक दलित महिला के साथ बलात्कार कर उसकी हत्या कर दी गई है। पता नहीं कितनी अनगिनत दलित बच्चियों और महिलाओं के साथ इसी तरह जघन्य अपराध किए गए हैं और किए जा रहे हैं।

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ज्यादातर मामलों मे प्रशासन का वही रवैया रहता है कि लड़की का चरित्र ख़राब था, उसका प्रेम-प्रसंग चल रहा था, उसके परिवारवालों ने ही उसको मारा। फिर परिवार का नार्को टेस्ट, या परिवार पर उल्टा केस जैसे अनेक हथियार पीड़ित परिवार को दबाने और न्याय की आवाज़ को चुप करने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। जो आज हमें हाथरस के प्रकरण में भी देखने को मिल रहा है। हर तरह से चाहे सरकार हो पुलिस, प्रशासन, आयोग या अन्य न्याय प्रणाली के तंत्र हो सब के सब दलित महिलाओं को न्याय दिलाने में नाकामयाब नज़र आते हैं। दलित महिलाओं को न न्याय मिल रहा है, ना ये हमें सम्मान से जीने देते हैं और ना ही हमे इंसान समझते हैं।

मुझे डेल्टा का केस आज भी याद है जो स्थिति आज हाथरस वाले केस की है, बिल्कुल यही स्थिति डेल्टा प्रकरण और उसके परिवार के साथ भी हूई थी। उस प्रकरण मे भी कई संगठनों  ने आवाज़ उठाई,कैंडल मार्च हुए, टीवी चैनल पर डिबेट हुई। पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने का हर मुमकिन तरीका अपनाया गया लेकिन आज तक पीड़ित परिवार को न्याय नहीं मिल पाया है। ऐसा ही हरियाणा का एक प्रकरण था जहां एक दलित बच्ची के साथ बलात्कार किया गया और उसके बाद पीड़ित परिवारवालों का ही नार्को टेस्ट कराया गया। सीबीआई जांच हुई और आज तक परिवार को प्रताड़ित किया जा रहा है लेकिन न्याय नहीं दिया जा रहा है।

हरियाणा का ही एक और प्रकरण था जहां इसी तरह एक दलित बच्ची जो अपने टीचर के साथ परीक्षा देने जा रही थी और उसे रास्ते से उठाकर उसका बलात्कार किया उसके पूरे शरीर को सिगरेट से जलाया गया और फिर उसकी हत्या कर दी गई। उसका पोस्टमार्टम करवाने के लिए हम उसके पार्थिव शरीर को दिल्ली एम्स तक लेकर आए थे। उस केस में भी विरोध-प्रदर्शन, कैंडल मार्च, पुलिस की लाठियां खाई, लेकिन आज दिन तक उसे भी इंसाफ नहीं मिल पाया है। पुलिस प्रशासन ने वही कहा जो वो हमेशा युवा दलित महिलाओं के हर केस में कहते हैं, “लड़की का चक्कर चल रहा था।” आखिर पुलिस प्रशासन कब तक यह वाहियात बयान देकर न्याय की आवाज़ को दबाता रहेगा। यह भी एक बड़ा सच है कि जिस पुलिस प्रशासन के पास दलित महिलाएं न्याय के लिए जाती हैं, वही प्रणाली दलित महिलाओं को इंसाफ से वंचित रखती है। ऐसे में सवाल है कि आखिर कब तक हमारी दलित बहनों और बच्चियों के साथ ऐसा होता रहेगा और वे न्याय से महरूम रहेंगी?

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आज फिर हम हाथरस केस में सीबीआई जांच की मांग कर रहे है, प्रशासन से न्याय की मांग कर रहे है, मुख्यमंत्री के इस्तीफे की मांग कर रहे है। लेकिन ये मांगें पहले भी कई प्रकरणो में की जा चुकी हैं। लेकिन ज्यादातर प्रकरणो में दलित महिलाओं को न्याय नही मिला है। ऐसे में हमारे सामने यह गंभीर स्थिति और सवाल है कि हम ऐसा क्या करें और किससे न्याय की उम्मीद बनी रहे और हमें बिना देरी और परेशानी के न्याय मिल सके। ज्यादातर प्रशासन और सरकार के लोग जातिवादी मानसिकता से ग्रसित हैं जो जाति से प्रभावित होकर इन मामलों की जांच शुरू करके प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से पीड़ित परिवार को न्याय से वंचित रखते हैं। तो ऐसी स्थिति में हमारा अधिकारियों से न्याय की उम्मीद करना भी अपने आप में सबसे बड़ी भूल है। हमारे सामने अब यही सवाल है कि कब तक हमारी बच्चियां इस जातिवादी सोच का सामना करती रहेंगी? कब तक हमारा जीवन गर्त में डूबता रहेगा, क्या दलित महिलाओं को आगे बढ़ने और सपने देखने का अधिकार नहीं है ?

यह जाति व्यवस्था दलित महिलाओं के सपनों को पूरा होने से पहले ही खत्म करती जा रही है। बड़ी संख्या में दलित बच्चियां आज कोई डॉक्टर होती तो कोई टीचर लेकिन इस जातिवादी व्यवस्था और लोगों ने उनको हमेशा-हमेशा के लिए ख़त्म कर दिय। मेरा मानना है कि अब समय है कि हम मिलकर जातिवाद की जड़ों को उखाड़ फेंके, और अपनी बहनों और बच्चियों के लिए नया और सुरक्षित समाज बनाए। आज मेरा अपने सभी साथियों से निवेदन है कि हाथरस के केस में तब तक शांत न बैठे जब तक हमारी बहन को न्याय ना मिल जाए। हमें अपनी न्याय की लड़ाई को मजबूत करना है तो दलित और महिला विरोधी इस सरकारी तंत्र के इस जातिवादी ढांचे पर चोट करनी होगी और न्याय के लिए एक लंबी लड़ाई लड़नी होती ताकि हम इस देश के नागरिक होने के नाते हम गर्व महसूस कर अपनी जिंदगी को जी सके।

जय भीम जय सावित्री।

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(यह लेख अंजु सिंह ने लिखा है जो Dalit Women Fight की सदस्य हैं।)


तस्वीर साभार : aljazeera

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