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उत्तर प्रदेश के हाथरस ज़िले में एक दलित लड़की के गैंगरेप और मौत के बाद पुलिस ने रात में जबरन पीड़िता का अंतिम संस्कार कर दिया। परिवार वालों का आरोप था कि उन्हें घर में बंद करके पीड़िता का ज़बरदस्ती अंतिम संस्कार किया गया। हालांकि पुलिस दावा कर रही थी कि परिवार वालों की मौजूदगी में ही अंतिम संस्कार किया गया। इसके बाद से ही देशभर में लोगों का गुस्सा और भड़क गया है। लोगों का आरोप है कि पुलिस ने ऐसा कर सबूत मिटाने की कोशिश की है। लोग सवाल पूछ रहे हैं कि उत्तर प्रदेश की पुलिस ने अंतिम संस्कार क्यों और किसके इशारे पर किया है?  लोग दलित उत्पीड़न और महिला सुरक्षा पर मोदी सरकार से सीधा सवाल कर रहे हैं और योगी आदित्यनाथ के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। लेकिन इस देश में ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब पुलिस ने परिवार वालों को उनके किसी सदस्य का अंतिम संस्कार ना करने दिया हो। कश्मीर के लिए मानो यह एक आम बात हो गई है।  

इसी साल 5 मई को कुपवाड़ा जिले में हुई मुठभेड़ में एक 14 साल के दिव्यांग बच्चे की गोली लगने से मौत हो गई। बच्चे का नाम था हाजिम शफी भट्ट। द वायर की रिपोर्ट के मुताबिक पुलिस ने हाजिम के परिवार वालों से कहा कि शव को अंतिम संस्कार के लिए नहीं सौंपा जाएगा। इसके अलावा शव को 35 किलोमीटर दूर बारामूला स्थित गैर-स्थानीय शीरी कब्रिस्तान में दफनाया जाएगा। पुलिस ने कहा कि अंतिम संस्कार के दौरान लोग जमा हो सकते हैं और कोविड-19 का संक्रमण फैल सकता है इसीलिए शव उनको नहीं दिया जाएगा। पुलिस ने परिवार के कुछ सदस्यों को अंतिम संस्कार में शामिल होने की इजाज़त दे दी। परिवार वालों ने बताया कि वो शव को दफनाने के लिए पुलिस दल के साथ सुबह लगभग 06:30 बजे रवाना हुए और सुबह 07:00 बजे हाज़िम का अंतिम संस्कार 17 लोगों की मौजूदगी में किया गया।  हाजिम 4 मई की शाम को ‘गोलीबारी’ में मारा गया था। इस मुठभेड़ में तीन अर्धसैनिक बल के जवानों ने भी अपनी जान गंवाई थी। शुरुआत में यह बताया गया कि गोलीबारी में एक उग्रवादी मारा गया लेकिन बाद में उसकी पहचान हाजिम के तौर पर हुई। हाजिम अज्ञात, गैर-स्थानीय और उग्रवादियों के लिए आरक्षित कब्रिस्तान में दफनाया गया पहला नागरिक है। 

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इसी तरह, 17 सितंबर 2020 को उत्तरी कश्मीर के सोपोर इलाके में किराने की दुकान चलाने वाले इरफान अहमद डार को पुलिस ने उनके भाई के साथ उठाया। एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार कथित तौर पर पुलिस हिरासत में इरफान अहमद की मौत हो गई। जम्मू-कश्मीर पुलिस ने यहां भी कोरोना का हवाला देते हुए शव देने से इनकार कर दिया। इरफान के परिवार वालों ने पुलिस पर शव चोरी करने का आरोप लगाते हुए कहा कि पुलिस हिरासत में उसे प्रताड़ित किया गया जिससे उसकी मौत हो गई। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस ने बर्बरता को छिपाने के लिए उन्हें शव सौंपने से इनकार कर दिया।   

लोग सवाल पूछ रहे हैं कि उत्तर प्रदेश की पुलिस ने अंतिम संस्कार क्यों और किसके इशारे पर किया है?  लोग दलित उत्पीड़न और महिला सुरक्षा पर मोदी सरकार से सीधा सवाल कर रहे हैं और योगी आदित्यनाथ के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं।

जम्मू-कश्मीर पुलिस ने सिर्फ कोरोना काल में ही शव देने से इनकार नहीं किया है बल्कि इससे पहले भी इस तरह की खबरें कश्मीर से सामने आती रही हैं। बीबीसी की एक रिपोर्ट बताती है कि सितंबर 2019 में श्रीनगर के शौरा में 18 साल के असरार की पेलेट और आंसूगैस के शेल फटने से मौत हो गई थी। पुलिस ने अपने बयान में कहा था कि असरार प्रदर्शन में शामिल था और पत्थर लगने से जख्मी हुआ था जिसकी वजह से उसकी मौत हुई है। लेकिन शेर-ए-कश्मीर इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज की रिपोर्ट के मुताबिक असरार की मौत पेलेट और आंसूगैस के शेल फटने से हुई थी। असरार के दोस्त ने अलज़ज़ीरा को दिए इंटरव्यू में कहा था कि ‘पुलिस यहां जनाजा तक नहीं पढ़ने देती है।’

साल 2019 में 20 दिसंबर को नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ बिजनौर में प्रदर्शन कर रहे लोगों पर यूपी पुलिस द्वारा की गई कार्रवाई में 20 साल के मोहम्मद सुलेमान की कथित रूप से गोली लगने से मौत हो गई। हफिंगटन पोस्ट के मुताबिक पुलिस ने आधी रात को सुलेमान के पिता को अंतिम संस्कार की व्यवस्था करने के लिए बुलाया। परिवार के मुताबिक उन्हें सुलेमान की लाश बिजनौर के नहटौर में एक चौराहे पर मिली थी। पुलिस ने परिवार को बताया कि सुलेमान का पोस्टमार्टम 21 दिसंबर की तड़के किया जाएगा लेकिन उन्हें शव इसी शर्त पर दिया जाएगा जब वो उसे नहटौर से दूर और तुरंत दफना देंगे। रिपोर्ट में बताया गया कि पुलिस ने भी कहा कि अंतिम संस्कार के लिए किसी भी दोस्त या शोकसभा को नहीं बुलाया जाएगा और पूरा आयोजन पुलिस बंदोबस्त के तहत किया जाएगा। 

उसी रात, नहटौर में 21 साल के अनस हुसैन के परिवार को भी पुलिस ने उसका शव देने से इनकार कर दिया था। सीएए के खिलाफ प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की कार्यवाही में अनस की भी गोली लगने से मौत हो गई थी। पुलिस ने शव को तब तक सौंपने से इनकार कर दिया जब तक कि परिवार नहटौर से दूर एक जगह नहीं चुन लेता। आखिरकार, आनन-फानन में पुलिस और परिवार के चंद सदस्यों ने मिलकर मिथन गांव के कब्रिस्तान में अनस के शव को दफना दिया।  

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क्या कहते हैं कानून

2005 में मानवाधिकारों और फोरेंसिक साइंस पर अपनाए गए एक प्रस्ताव में, संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार आयोग ने शव से गरिमापूर्ण व्यवहार करने के महत्व पर ज़ोर दिया। इसमें शव के अंतिम संस्कार के लिए मुनासिब प्रबंधन और निपटान के साथ-साथ परिवारों की ज़रूरतों के लिए सम्मान भी शामिल है। 

यूएस फील्ड मैनुअल कहता है कि ‘शवों के साथ दुर्व्यवहार एक युद्ध अपराध है’।

संविधान के अनुच्छेद 21 की व्याख्या करते हुए कई मामलों में न्यायपालिका ने इसमें एक सभ्य दफन करने का अधिकार शामिल किया है। इसलिए मृत शरीर के लिए गरिमा का अधिकार को बढ़ावा दिया गया है। साल 2001 में सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में कहा था कि सरकार को सड़क पर मिले लावारिस शवों को एक सभ्य दफन देने के लिए सभी मुमकिन कदम उठाने चाहिए। साल 2013 में भी इसी तरह का निर्देश दिया गया था जब रेलवे क्षेत्रों में पाए जाने वाले लावारिस शवों के अंतिम संस्कार का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट में आया था। 

ऐसे में सवाल यह कि अगर कानून लावारिस शवों के सभ्य तरीके से अंतिम संस्कार करने की गारंटी देता है तो लगातार इस अधिकार से लोगों को क्यों वंचित रखा जा रहा है?  हाथरस से पहले भी उत्तर प्रदेश में पुलिस ने लोगों को अंतिम संस्कार के अधिकार महरूम किया है। मृत व्यक्ति के परिवार से कोई भी अंतिम संस्कार करने का अधिकार नहीं छीन सकता है। ऐसी घटनाएं सिर्फ सरकार और प्रशासन की नाकामयाबी ही नहीं दिखाती बल्कि उनकी दलित, मुस्लिम और महिला विरोधी विचारधारा को भी दर्शाती हैं।

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तस्वीर साभार : aljazeera

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