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अक्सर ऐसा देखा गया है कि कोई नारीवादी व्यक्ति या संस्थान अगर किसी ऐसे सामाजिक मुद्दे पर बात करें जिसका नारी सशक्तिकरण या लैंगिक समानता के साथ कोई सीधा संबंध न हो तो उन्हें चुप कराने की कोशिश की जाती है या किसी राजनीतिक दल या विचारधारा का समर्थक मान लिया जाता है। आलोचकों की तरफ़ से “इस चीज़ का नारीवाद से कोई संबंध नहीं है। आप राजनैतिक एजेंडा चला रहे हैं” या “नारीवादी हैं तो औरतों की बात कीजिए, इस तरह के मुद्दों पर बोलने की क्या ज़रूरत है?” जैसी टिप्पणियां आना कोई नई बात नहीं है। नारीवादी कार्यकर्ताओं और संगठनों पर तरह-तरह के आरोप लगाए जाते हैं सिर्फ़ इसलिए कि वे समकालीन सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर मुखर हैं और ज़रूरत पड़ने पर सरकारी नीतियों की आलोचना करने से कतराते नहीं हैं।  

लोगों के मन में जैसे यह धारणा बनी हुई है कि नारीवादी और उनके समर्थकों को सिर्फ़ महिलाओं के हित में बोलना चाहिए। अगर कोई मुद्दा महिलाओं से न जुड़ा हो तो उस पर मुंह ही नहीं खोलना चाहिए। इस मानसिकता का सामना कई नारीवादियों को करना पड़ा है जब उन्होंने कश्मीर की बात की हो, सीएए-एनआरसी जैसी नीतियों का विरोध किया हो, दक्षिणपंथी राजनीतिक विचारधारा और उसके सामाजिक प्रभाव की आलोचना की हो या किसी उत्पीड़ित सामाजिक वर्ग से आनेवाले व्यक्ति के लिए समर्थन जताया हो। क्या यह धारणा सही है? नारीवादी जब राजनीतिक मुद्दों पर बोलते या लिखते हैं, क्या सचमुच वे किसी खतरनाक एजेंडा या षड्यंत्र में शामिल हो जाते हैं? क्या ये मुद्दे उन्हें भी उतना ही प्रभावित नहीं करते जितना समाज के बाकी लोगों को करते हैं? 

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सबसे पहले तो हमें यह बात समझने की ज़रूरत है कि समकालीन राजनीतिक गतिविधियां आम समाज से परे नहीं हैं। सरकारी नीतियां, राजनीतिक विचारधाराएं और सत्ता के बदलते समीकरण सबसे ज़्यादा आम जनता को ही प्रभावित करते हैं। चाहे हम खुद को राजनीति और उसकी गतिविधियों से कितना ही दूर रखने की कोशिश कर लें। ऐसे में एक ज़िम्मेदार नागरिक होने के नाते हम सभी को इन मुद्दों के बारे में जागरूक रहना चाहिए और इनकी आलोचना करते रहना चाहिए क्योंकि नारीवादी कार्यकर्ता भी साधारण समाज का ही हिस्सा हैं। इन मुद्दों पर आवाज़ उठाना उनका अधिकार ही नहीं, कर्तव्य है। सरकार से सवाल पूछने और नीतियों की आलोचना करने का मतलब किसी एजेंडा से जुड़ना नहीं बल्कि एक जागरूक नागरिक के तौर पर अपना फ़र्ज़ निभाना और अपना संवैधानिक अधिकार जताना ही है। 

दूसरी बात, इंटरसेक्शनल नारीवादी आंदोलन का लक्ष्य सिर्फ़ महिलाओं के लिए ही नहीं, समाज के हर वंचित, शोषित और पीड़ित तबके के अधिकारों के लिए खड़ा होना है। न्याय और समानता की लड़ाई ‘सिलेक्टिव’ नहीं हो सकती, इसीलिए अगर बात महिलाओं के सामाजिक अधिकारों की हो रही हो तो एलजीबीटीक्यू+ समुदाय, अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों, कश्मीरियों के हक़ के लिए लड़ना और उन्हें अपनी बात कहने के लिए मंच प्रदान करना भी नारीवादियों का कर्तव्य हो जाता है। क्योंकि सरकार की नीतियां और गतिविधियां सबसे ज़्यादा इन्हीं वंचित वर्गों को प्रभावित करती हैं, इन पर विवाद होना और कई क्षेत्रों में इनके ख़िलाफ़ विरोध जताना भी स्वाभाविक है।

इंटरसेक्शनल नारीवादी आंदोलन का लक्ष्य सिर्फ़ महिलाओं के लिए ही नहीं, समाज के हर वंचित, शोषित और पीड़ित तबके के अधिकारों के लिए खड़ा होना है।

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तीसरी और सबसे ज़रूरी बात, कई राजनीतिक गतिविधियों ‌का संबंध सीधे तौर पर महिलाओं से न रहते हुए भी इनका प्रभाव उन पर पड़ता है। क्योंकि हमारा समाज पितृसत्तात्मक है, किसी भी मुद्दे से पैदा होनेवाली समस्याओं की दोहरी मार महिलाओं को झेलनी पड़ती है। अगर कोई राजनीतिक निर्णय या प्रक्रिया गरीबों, अल्पसंख्यकों या दलितों के ख़िलाफ़ है तो इसका असर इन वर्गों से ताल्लुक रखने वाली महिलाओं पर कहीं ज़्यादा होता है। नारीवाद का उद्देश्य है इन महिलाओं को भी अपनी समस्याएं व्यक्त करने का मौका देना और अपना जीवन बेहतर बनाने में उनकी सहायता करना क्योंकि नारीवादी आंदोलन सिर्फ़ उच्च-वर्गीय, विशेषाधिकार-प्राप्त, संभ्रांत महिलाओं के जीवन और अनुभवों तक सीमित नहीं रह सकता। 

समाज की वर्तमान स्थिति और सरकार के कदमों के बारे में बात किए बिना नारीवाद पर बात करना असंभव है। नारीवादी आंदोलन समाज का ही हिस्सा है और नारीवादी दृष्टिकोण से समाज और राजनीति का विश्लेषण अपेक्षित ही नहीं, ज़रूरी है। मकसद सिर्फ़ व्यक्तिगत तौर पर महिलाओं को सशक्त करने का नहीं है बल्कि ऐसे सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था की स्थापना करने का है जिसमें हर वंचित तबके के लिए समान अधिकार हो और जहां वर्तमान व्यवस्था में मौजूद समस्याएं नहीं होंगी। समाज को बदलने की बात किए बिना सिर्फ़ महिलाओं की व्यक्तिगत सफलताओं पर केंद्रित आंदोलन किसी काम का नहीं है।

राजनीति पर बात करना इसलिए ज़रूरी है। महिला सशक्तिकरण के साथ-साथ समाज के बाकी वर्गों के मुद्दों पर बात करना और सरकार से उनके अधिकारों की मांग करना इसलिए ज़रूरी है। यह सब भी नारीवादी आंदोलन का ही हिस्सा है और इन मुद्दों पर बात करने से यह साबित नहीं हो जाता कि आंदोलन किसी ख़ास एजेंडा पर चल रहा है। समान अधिकार की मांग समाज में रहनेवाले हर इंसान के लिए है और आंदोलन तब तक ख़त्म नहीं हो सकता जब तक हर वंचित इंसान को सम्मान और अधिकार न मिलें। हमें यह समझना होगा कि नारीवादी आंदोलन सिर्फ़ एक ख़ास वर्ग तक सीमित आंदोलन आंदोलन नहीं है।

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तस्वीर साभार : New York Post

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