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दिल्ली, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, बिहार, असम, त्रिपुरा, पंजाब, राजस्थान, पश्चिम बंगाल राज्यों की यह लिस्ट बढ़ती चली जा रही है जहां के नागरिक नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ सड़कों पर हैं। एक ऐसे कानून के खिलाफ जो भारत की धर्मनिरपेक्ष आत्मा को मज़हब के नामपर बांटने की कोशिश है। एक ऐसा कानून जो भारत के संविधान के खिलाफ है। जिस संविधान ने भारत के हर नागरिक को बराबरी का हक दिया उस बराबरी के हक के खिलाफ सत्ताधारी पार्टी बीजेपी नागरिकता संशोधन कानून लेकर आई है। भारत के इतिहास में यह पहली बार है जब धर्म के आधार पर नागरिकता देने का कानून सरकार लेकर आई है।

देशभर में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं। इन प्रदर्शनों में अब तक कई सारे  लोगों की मौत हो चुकी है लेकिन केंद्र सरकार लोगों से बात करने की जगह विरोध-प्रदर्शनों को दबाने के लिए पुलिसिया दमन का सहारा ले रही है। शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के दौरान भी प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया जा रहा है, उन पर पुलिस बल प्रयोग कर रही है। जहां-जहां प्रदर्शन हो रहे हैं सरकार वहां-वहां धारा 144 लगा रही है, इंटरनेट बंद कर दे रही है लेकिन फिर भी इस असंवैधानिक कानून के खिलाफ लोग सड़कों पर आ रहे हैं।

अंदरखाने से उठती विरोध की आवाज़

पंजाब, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, केरल जैसे राज्य पहले ही कह चुके हैं कि वे नागरिकता संशोधन कानून अपने राज्य में लागू नहीं करेंगे। हालांकि यहां बताना जरूरी है कि नागरिकता केंद्र के अधीन आती है इसलिए राज्यों के लिए यह कानून लागू करना अनिवार्य हो जाएगा। वहीं दूसरी तरफ नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ जारी प्रदर्शन के बीच बीजेपी की सहयोगी पार्टियों के बीच से भी विरोध की आवाज़ उठने लगी है।

पंजाब में बीजेपी की सहयोगी पार्टी शिरोमणि अकाली दल जिसने संसद में नागरिकता संशोधन कानून का समर्थन किया था, अब अकाली दल ने मांग की है कि नागरिकता संशोधन कानून में मुसलमानों को भी शामिल किया जाना चाहिए। इसके पीछे अकाली दल ने तर्क दिया है कि हमारा देश और उसका संविधान धर्मनिरपेक्ष है और धर्म के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए।

बिहार में बीजेपी की सहयोगी पार्टी जनता दल युनाइटेड ने भी एआरसी के खिलाफ बागी तेवर अपना लिए हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा है कि वो बिहार में एनआरसी लागू नहीं होने देंगे। जेडीयू ने भी संसद में नागरिकता संशोधन कानून के पक्ष में वोट दिया था।

नागरिकता संशोधन कानून जब से अस्तित्व में आया है तब से सबसे ज़्यादा जो राज्य उबल रहा है वह है असम। असम में नागरिकता संशोधन कानून का विरोध करने की अपनी वजह है। असम का विरोध सांप्रदायिक नहीं है बल्कि घुसपैठियों के खिलाफ है। चाहे हिंदू हो या मुसलमान असम के लिए घुसपैठिए का मज़हब नहीं बल्कि उसका घुसपैठिया होना मायने रखता है।

वास्तविकता यह है कि अगर इन पार्टियों ने कम से कम राज्यसभा में ही बिल का विरोध किया होता तो आज सूरत कुछ और होती।

असम में बीजेपी की सहयोगी पार्टी असम गण परिषद ने भी नागरिकता संशोधन कानून के पक्ष में वोट दिया था लेकिन एब असम गण परिषद के सुर बदलने लगे हैं। नागरिकता कानून के खिलाफ बढ़ते विरोध को देखते हुए असम गण परिषद के कई नेता इस कानून की मुखालफत करने लगे। यहां तक कि असम गण परिषद इस कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दाखिल कर चुकी है।

ओडिशा में बीजू जनता दल की सरकार है। बीजू जनता दल बीजेपी की सहयोगी पार्टी तो नहीं है लेकिन संसद में उसने लगभग बीजेपी की तरफ से लाए ज़्यादातर कानून का समर्थन किया है। बीजेडी ने संसद में नागिरकता संशोधन कानून के समर्थन में वोट किया था लेकिन अब बीजेडी ने एआरसी का विरोध किया है। ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने यह साफ-साफ कह दिया है कि वो अपने राज्य में एनआरसी नहीं लागू होने देंगे।

लेकिन इन सभी पार्टियों पर एक सवाल जरूर खड़ा होता है कि जब इनके पास मौका था बिल का विरोध करने का तब इन्होंने बिल के समर्थन में वोट किया। अब जब वह बिल कानून बनकर हमारे सामने आ चुका है और देशभर में लोग सड़कों पर हैं तब इस कानून का विरोध करना- Politics of Convinience की श्रेणी में ही गिना जाएगा। चाहे वह जेडीयू हो या असम गण परिषद इन सभी पार्टियों को नागरिकता संशोधन कानून का विरोध करना तभी याद आया जब इनके राज्यों में जनता सड़कों पर आ गई और इन्हें अपने वोट बैंक की चिंता सताने लगी।

वास्तविकता यह है कि अगर इन पार्टियों ने कम से कम राज्यसभा में ही बिल का विरोध किया होता तो आज सूरत कुछ और होती। सत्ताधारी पार्टी बीजेपी के पास राज्यसभा में बहुमत नहीं है लेकिन फिर भी वह आसानी से राज्यसभा में इस अंसवैधानिक बिल को पास कराने में कामयाब रही। इन पार्टियों ने अपना रुख तभी बदला जब जनता सड़कों पर आ गई, जगह-जगह नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ प्रदर्शन होने लगे।

और पढ़ें : नागरिकता संशोधन कानून : हिंसा और दमन का ये दौर लोकतंत्र का संक्रमणकाल है

क्या बीजेपी शासित राज्यों में प्रदर्शनकारियों पर पुलिस अधिक हावी है?

बीते 15 दिसंबर को जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में छात्रों के साथ जो भी हुआ वो हमारे सामने है। दिल्ली पुलिस और अलीगढ़ पुलिस पर छात्रों के साथ मारपीट करने के आरोप हैं, मामला फिलहाल कोर्ट में है। लेकिन छात्रों के साथ उस रात जो हिंसा हुई उसकी कहानियां किश्तों में हमारे सामने आ रही हैं और पुलिसिया दमन की कहानी बयान कर रही हैं। नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ सबसे ज्यादा हिंसक प्रदर्शन की खबरें उत्तर प्रदेश से आ रही हैं। अकेले उत्तर प्रदेश में इन प्रदर्शनों में अब तक 18 लोगों की मौत हो चुकी है जिसमें एक 8 साल का बच्चा भी शामिल है।

हम यहां याद दिला दें कि जिस दिन उत्तर प्रदेश में प्रदर्शन हिंसक हुए उसी दिन राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रदर्शकारियों से ‘बदला’ लेने की बात कही थी। अलग-अलग सूत्रों से उत्तर प्रदेश में वीभत्स हिंसा की खबरें आ रही हैं। जानी-मानी पत्रकार राणा अयूब ने ट्वीट कर यूपी के कई जिलों में हिंसा होने की बात कही है। संभल,मुजफ्फरनगर जैसे इलाकों से इंटरनेट बंद होने की वजह से किसी खबर की पुष्टि भी नहीं हो पा रही है।

लेकिन हुकूमत को अब यह समझना होगा कि यह संविधान बचाने की लड़ाई है जिसमें जनता आगे है।

वहीं, कर्नाटक के मेंगलुरु में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ प्रदर्शन में दो लोगों की मौत हो गई। लेकिन वहां के गृहमंत्री बोम्मई ने प्रदर्शन में हुई हिंसा के लिए केरल से आए असमाजिक तत्वों को ज़िम्मेदार ठहरा दिया। बात अगर दिल्ली की करें को तो यहां भी जामिया मिलिया इस्लामिया में हुई पुलिसिया कार्रवाई के बाद दरियागंज में हुई पुलिस की कार्रवाई पर भी सवाल उठ रहे हैं। आपको बता दें कि दिल्ली पुलिस केंद्र सरकार के अधीन आती है।

द टेलिग्राफ की रिपोर्ट के मुताबिक दरियागंज में प्रदर्शनकारियों को बूरी तरह पीटा गया और उन्हें पुलिस की तरफ से कोई मेडिकल सुविधा भी नहीं दी गई। पुलिस ने 40 लोगों को हिरासत में लिया था जिसमें 8 नाबालिग भी शामिल थे। वरिष्ठ इतिहासकार इरफान हबीब ने भी कहा है कि कि पुलिस का ऐसा दमन तब भी नहीं देखा गया था जब हमारा देश अंग्रेज़ों का गुलाम था।

सरकार, मीडिया, पुलिस, प्रशासन पूरा का पूरा सिस्टम प्रदर्शनकारियों को रोकने में लगा है, प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया जा रहा है, उन्हें अर्बन नक्सल कहकर खारिज करने की कोशिश की जा रही है, खुद प्रधानमंत्री भी ऐसा कह चुके हैं। लेकिन हुकूमत को अब यह समझना होगा कि यह संविधान बचाने की लड़ाई है जिसमें जनता आगे है। वह कितना भी अपने दमन का इस्तेमाल कर ले लोग सड़कों पर आ चुके हैं और आते रहेंगे।

और पढ़ें : नागरिकता संशोधन क़ानून : विरोधों के इन स्वरों ने लोकतंत्र में नयी जान फूंक दी है…


तस्वीर साभार : seedhibaat

2 COMMENTS

  1. It’s huge attack on indian constitution ,indian unity , democratic structure . In this way they r just cracking the our indian citizen ship.they must understand n never implement this kind of baseless law n rule.they r misusing their political power.we are entirely against this kind of meaningless law n order.

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