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हाल ही के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश के उच्चतम न्यायालय यानी सुप्रीम कोर्ट के 34 न्यायधीशों में सिर्फ 2 महिला जज शामिल हैं। वहीं, अगर बात करें उच्च न्यायलयों की तो केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने सदन में साझा किए गए आंकड़ों के मुताबिक देश के हाई कोर्ट्स के कुल न्यायधीशों के 1078 पदों में से सिर्फ 78 पदों पर ही महिलाएं है। इसका मतलब है कि देश के सभी हाई कोर्ट के 8 फ़ीसद से भी कम पदों पर महिला जज हैं। यही नहीं, देश के छह उच्च न्यायालयों- मणिपुर, मेघालय, पटना, त्रिपुरा, तेलंगाना और उत्तराखंड में आज की तारीख में कोई महिला जज ही नहीं है। पंजाब व हरियाणा हाई कोर्ट में सबसे ज्यादा महिला जज हैं; कुल 85 में से 11 जज महिलाएं है। इस के बाद मद्रास हाई कोर्ट दूसरे नम्बर पर आता है जहां 75 में से 9 महिला जज हैं। दिल्ली और बॉम्बे हाई कोर्ट इन दोनों में ही कुल 8-8 महिला जज हैं। आज़ादी के बाद से लेकर अब तक हमारे न्यायालयो में महिला जजों की संख्या की हालत कमोबेश यही बनी रही है। 

आपको हम बता दें कि साल 1959 में अन्ना चांडी देश की पहली महिला जज बनी थी। इसके बाद साल 1989 में फातिमा बीबी सर्वोच्च न्यायलय की पहली महिला जज बनी। देखा जाए तो हमारे देश में साफ़ तौर पर एक महिला को उच्चतम न्यायालय में जज/ न्यायधीश बनने में 30 साल लग गए। इसके बाद के अगले तीन दशकों में (1989 – 2019) के बीच, सिर्फ 8 महिलाएं ही उच्चतम न्यायालय की जज बनी। महिलाओं में भी मुख्यतौर पर वही महिलाएं जज बन पाती है जो उच्च जाति से आती हैं। ऐसे में ये सवाल उठना लाज़मी है कि ऐसा क्यों? क्यों हमारे देश की उच्च अदालतों में इतनी कम महिला जज क्यों है? इस सवाल का जवाब देने के लिए हमें कुछ मूलभूत तथ्यों को समझना होगा। साथ ही हमारा यह जानना ज़रूरी है कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में न्यायधीशों/जजों की नियुक्ति कैसे होती है?  

संविधान के प्रावधानों और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के अनुसार किसी भी हाई कोर्ट में जज की नियुक्ति तब तक नहीं हो सकती जब तक की सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम से उस उम्मीदवार के नाम का अनुमोदन (अप्रूवल) नहीं होता। बेशक, सुप्रीम कोर्ट के अप्रूवल के बगैर कोई भी उम्मीदवार हाई कोर्ट/ सुप्रीम कोर्ट का जज नहीं बन सकता। लेकिन ये भी एक सच है कि वही व्यक्ति हाई कोर्ट का जज बन सकता है जिसके नाम की हाई कोर्ट ने सिफारिश की हो। हाई कोर्ट के न्यायधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट शुरू नहीं करता बल्कि यह प्रक्रिया हाई कोर्ट से शुरू होती है। ऐसे में ये बहुत ही मायने रखता है कि हाई कोर्ट से जज के लिए किन लोगों के नाम की सिफ़ारिश की जाती है। 

देश के छह उच्च न्यायालयों- मणिपुर, मेघालय, पटना, त्रिपुरा, तेलंगाना और उत्तराखंड में आज की तारीख में कोई महिला जज ही नहीं है।

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आंकड़े बताते है कि किसी भी हाई कोर्ट से अनुशंसित उम्मीदवारों (रेकमेंडेड कैंडिडेट्स) की सूचि में 30% से अधिक महिलाओं के नाम ही नहीं होते है। कई हाई कोर्ट में तो रेकमेंडेड कैंडिडेट्स की सूची में महिलाओ की संख्या 10 फ़ीसद से भी कम होती है। द प्रिंट की एक रिपोर्ट बताती है कि आंकड़ों के अनुसार, अक्टूबर 2017 से अप्रैल 2019 के बीच, हाई कोर्ट के न्यायधीश पदों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने जिस सूचि पर विचार किया, उसमें 87.63 % उम्मीदवार पुरुष ही थे। ऐसे में हम यह कैसे उम्मीद रख सकते है कि ज्यादा से ज्यादा महिलाएं उच्च अदालतों की जज बन पाएंगी? यहां पर ये सवाल उठता है कि न्यायधीशों के पदों के लिए हाई कोर्ट से जो सूचि सुप्रीम कोर्ट तक जाती है, उसमे इतनी कम महिलाओं के नाम क्यों होते है?

पब्लिक डोमेन में जो जानकारी उपलब्ध है उससे इस सवाल का जवाब नहीं मिलता। इसके पीछे एक बहुत बड़ी वजह ये है कि जिन रेसोलुशन्स के ज़रिए एक हाई कोर्ट उम्मीदवाओं के नाम सुप्रीम कोर्ट में भेजता है, वो रेसोलुशन्स पब्लिश नहीं होती। इसी लिए यह आम जनता को पता ही नहीं चल पाता कि किन आधारों पर किसी भी व्यक्ति का नाम जज के लिए सुप्रीम कोर्ट में भेजा गया है। इन रेसोलुशन के प्रकाशित न होने की वजह से ये भी पता नहीं चल पता कि ज्यादा पुरुष उम्मीदवारों के पीछे की वजह क्या है। जब तक इस प्रकार की पारदर्शिता नहीं आएगी, जब तक ये रेसोलुशन्स प्रकाशित नहीं होगी, तब तक बदलाव आना मुश्किल है। आम तौर पर, हाई कोर्ट के जज ही सुप्रीम कोर्ट के जज बनते हैं। हाई कोर्ट का जज बने बिना सुप्रीम कोर्ट का जज बनना लगभग नामुमकिन होता है। मई 2017 तक जितने भी सुप्रीम कोर्ट जज रिटायर हुए थे, उसमे से 98% जज पहले हाई कोर्ट के जज रह चुके थे। ऐसे स्थिति में, जब तक हाई कोर्ट में ज्यादा से ज्यादा महिलाएं जज नहीं बनेंगी, तब तक सुप्रीम कोर्ट में महिला न्यायधीशों का बढ़ना असंभव ही रहेगा।         

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इसी के साथ यह भी देखना उचित होगा कि सुप्रीम कोर्ट जिन उम्मीदवारों का नाम हाई कोर्ट के जज के पद के लिए स्वीकार करता है, उसमें कितनी संख्या महिलाओं की होती है। आंकड़ों के अनुसार, महिला वकीलों की एक्सेप्टेन्स रेट 62.5% है। वहीं, दूसरी ओर पुरुष वकीलों की एक्सेप्टेन्स रेट 56.02% है। ऐसे में ये मानना या कहना कि काबिल महिला जजों की कमी है तो ये गलत होगा। समस्या का पूरा समाधान तो नहीं लेकिन कम से कम एक सही कदम ये जरूर होगा, जब हाई कोर्ट अपनी मीटिंग के रेसोलुशन और मिनट प्रकाशित करना शुरू करेंगे। मात्र यही नहीं, इसके साथ साथ उन्हें ये भी बताना चाहिए कि किन कारणों की वजह से किसी उम्मीदवार को चुना गया और किस कारण की वजह से उसे अस्वीकार किया गया। साथ ही साथ, अगर यह भी बताया जाए कि कौन से उम्मीदवारों केइ बारे में विचार किया गया था। इस प्रकार की जानकारी से जिन लोगों को कंसीडर किया गया उनकी तुलना की जा सकेगी जिन को कंसीडर नहीं किया गया। जब तक हाई कोर्ट के स्तर पर इस प्रकार की पारदर्शिता नहीं आएगी, तब तक समस्या का समाधान होना मुश्किल है। 

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स्रोत : द प्रिंट

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