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हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने हिन्दू उत्तराधिकार कानून से जुड़ा बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। इस फैसले में लैंगिक समानता पर बल देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया गया कि हिन्दू परिवार में संपत्ति पर बेटियां बेटों के ही बराबर की हकदार हैं। कोर्ट के इस फैसले से इस कानून से जुड़ी वे सारी भ्रामक दलीलें साफ हो गई जिनकी वजह से आज तक बेटियां संपत्ति में हिस्सेदारी पाने के लिए संघर्ष करती आ रही थी। आपको बता दें कि, दानम्मा बनाम अमर (2018) के मामले में सुप्रीम कोर्ट की ओर से हिन्दू उत्तराधिकार कानून से जुड़ा फैसला आया है।

सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा है कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 2005 में संशोधन कर बेटियों को पैतृक संपत्ति में समान हक देने की जो व्यवस्था की गई है, वह हर स्थिति में बेटियों पर लागू होता है। अपने इस नए फैसले के साथ कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम 2005 के लागू होने के पहले भी अगर पिता का देहांत हो गया है तब भी बेटियों को संपत्ति में बराबरी का अधिकार मिलेगा। इस फैसले के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि, “बेटियां हमेशा बेटियां ही होती हैं।”

अपने इस नए फैसले के साथ कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम 2005 के लागू होने के पहले भी अगर पिता का देहांत हो गया है तब भी बेटियों को संपत्ति में बराबरी का अधिकार मिलेगा।

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साल 1956 में बने हिन्दू उतराधिकार कानून में लैंगिक समानता का तत्व मौजूद नहीं था, इसकी यह खामी संविधान के आदर्शों के विपरीत नज़र आ रही थी। इसलिए साल 2005 में इस कानून को संविधान के अनुकूल बनाने के लिए समानता का भाव जोड़ा गया और हिन्दू परिवारों में बेटियों को पैतृक संपत्ति में बराबरी का अधिकार दिया गया। इस फैसले के बाद पितृसत्तात्मक समाज ने कई प्रयास किए जिससे लड़कियों को संपत्ति न दी जाए और अटकलें लगाई जाने लगी कि साल 2005 से पहले के केस में यह कानून लागू नहीं होता। इसी बात का स्पष्टीकरण देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह बड़ा फैसला सुनाया है। पारंपरिक मिताक्षारा कानून में बेटी को पिंडदान का अधिकार नहीं था जिस कारण उन्हें न तो गोद लिया जा सकता था और न ही संपत्ति में हकदार माना जाता था। इसलिए समाज में लैंगिक समानता का अभाव था।

हिंदू कानून में संपत्ति को दो भागों में बांटा गया है- पैतृक और स्वअर्जित यानी खुद के द्वारा अर्जित संपत्ति। पैतृक संपत्ति की बात करें तो इसमें चार पीढ़ी पहले तक पुरुषों की वे अर्जित संपत्तियां आती हैं जिनका कभी बंटवारा नहीं हुआ है। ऐसी संपत्तियों पर वह बेटा हो या बेटी उनका जन्मसिद्ध अधिकार होता है। पर साल 2005 से पहले ऐसी संपत्तियों पर सिर्फ बेटों को अधिकार हासिल था। लेकिन साल 2005 के संशोधन के बाद, पिता ऐसी संपत्तियों का बंटवारा अपनी मर्जी से नहीं कर सकता। इसका मतलब यह है कि वह बेटी को हिस्सा देने से इनकार नहीं कर सकता। कानून के अनुसार बेटी के जन्म लेते ही, उसका पैतृक संपत्ति पर अधिकार अपने आप हो जाता है।

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खुद से अर्जित कि गई संपत्ति के मामले में बेटी का पक्ष बहुत कमजोर होता है। यदि पिता ने अपने पैसे से कोई जमीन खरीदी है तो वह जिसे चाहे अपनी संपत्ति दे सकता है। खुद से अर्जित संपत्ति को अपनी मर्जी से किसी को भी देना पिता का एक कानूनी अधिकार है। यानी अगर पिता ने अपनी बेटी को खुद की संपत्ति में हिस्सा देने से मना कर दिया तो बेटी कुछ नहीं कर सकती है।

अगर अपनी वसीयत लिखने से पहले ही किसी कारणवश पिता की मौत हो जाती है तो उन सभी कानूनी उत्तराधिकारियों को उनकी संपत्ति पर समान अधिकार होगा जिसका उल्लेख अधिनियम में किया गया है। हिंदू उत्तराधिकार कानून में पुरुष उत्तराधिकारियों का चार भागों में बांटा गया है और पिता की संपत्ति पर पहला हक पहले भाग में शामिल उत्तराधिकारियों का होता है। इनमें विधवा, बेटियां और बेटों के साथ-साथ और लोग आते हैं, जिनका उत्तराधिकारी संपत्ति पर समान अधिकार होता है। इसका अर्थ है कि बेटी के रूप में आपको अपने पिता की संपत्ति पर पूरा हक है। इसी बात को सुप्रीम कोर्ट के द्वारा स्पष्ट कर सभी भ्रामक बातों को नकार दिया गया है जिसका खामियाज़ा हिन्दू समाज की बेटियां काफी समय से उठा रही थी।

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तस्वीर साभार : indiatvnews

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