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गर्भनिरोधक के तमाम साधन वर्तमान समय में हमारे सामने मौजूद हैं लेकिन इन साधनों तक पहुंच हमारे देश में बहुत ही कम महिलाओं की ही है। गर्भनिरोधक तक पहुंच की स्थिति को कोविड-19 ने और भी गंभीर बना दिया है। मैरी स्टोप्स इंटरनेशनल (MSI) द्वारा हाल ही में कई गई एक स्टडी के अनुसार कोविड-19 की वजह गर्भनिरोधक और गर्भसमापन की सुविधा देश की 1 करोड़ से अधिक महिलाओं की पहुंच से बाहर हो चुकी है। यह समस्या इसलिए भी गंभीर है क्योंकि गर्भनिरोध की जिम्मेदारी मुख्य तौर पर औरतों पर ही डाल दी जाती है। गांव हो या शहर, अधिकांश युगल यही मानते हैं कि गर्भनिरोध की जिम्मेदारी मुख्य रूप से औरत की ही होती है। एशिया टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2017-18 के बीच कुल 1.47 मिलियन नसबंदी करवाई गई, उसमें से सिर्फ 6.8 फीसद पुरुषों शामिल थे। ऐसे में यह सवाल उठना लाज़मी है कि ऐसे क्यों है और गर्भनिरोधक की जिम्मेदारी मुख्यतौर पर महिलाओं पर ही क्यों पड़ती है?

इस सवाल का जवाब देने के लिए हमें कुछ निम्नलिखित आधारभूत बिंदुओं को समझना होगा। गर्भनिरोधक के तौर पर पुरुषों को कॉन्डम का उपयोग करने या नसबंदी कराने की राय दी जाती है। दूसरी ओर, महिलाओं को गर्भनिरोधक दवाइयां लेने, IUCD, आदि की सलाह दी जाती है। लेकिन आंकड़ों की माने तो, भारतीय पुरुष न सिर्फ खुद इन गर्भनिरोधकों का इस्तेमाल करने में कोई रूचि दिखाते हैं, बल्कि वे गर्भनिरोधक की इस पूरी प्रक्रिया के लिए तैयार और जागरूक ही नहीं है। अधिकतर पुरुषों को यह लगता है कि अगर अनचाहा गर्भ ठहर गया तो गर्भपात का उपाय तो है ही।

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यह समझने की कोशिश करते है कि भारतीय पुरुष गर्भनिरोधक उपायों का उपयोग क्यों नहीं करते? कई रिसर्च और सर्वे में दावा किया गया है कि कई पुरुष इसलिए नसबंदी इसलिए नहीं करवाना चाहते क्योंकि उन्हें लगता है कि ऐसे करवाने से वे अपनी ‘मर्दानगी’ से हाथ धो बैठेंगे। जबकि सच्चाई ये नहीं है, यह महज़ एक मिथ्य है। नसबंदी एक प्रकार से स्थायी गर्भनिरोधक उपचार है। नसबंदी का पुरुषों के सेक्सुअल हॉर्मोन / इच्छाओं पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता। नसबंदी और कैस्ट्रेशन दोनों एक नहीं होते। लेकिन जानकारी और जागरूकता के अभाव में भारतीय पुरुष यही मानते है कि दोनों एक ही हैं। नसबंदी को लोग हमारे देश की संस्कृति के खिलाफ भी समझते हैं। पुरुषों को यह भी लगता है कि नसबंदी करवाने की वजह से वे कठिन काम नहीं कर पाएंगे, भारी सामान नहीं उठा पाएंगे। नसबंदी का 1975 का इतिहास भी इस अनिच्छा के लिए जिम्मेदार है। हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक जहां साल 2008 -09 के बीच में 2,90,000 भारतीय मर्दों ने नसबंदी करवाई, वहीं 2015 -16 में 80,000 से भी कम पुरुषों ने नसबंदी करवाई।   

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गर्भनिरोध की जिम्मेदारी मुख्य तौर पर औरतों पर ही डाल दी जाती है। गांव हो या शहर, अधिकांश युगल यही मानते हैं कि गर्भनिरोध की जिम्मेदारी मुख्य रूप से औरत की ही होती है।

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वहीं कॉन्डम को भी लेकर हमारे समाज में कई तरह के मिथ्य प्रचलित हैं। कॉन्डम के प्रति सबसे बड़ा मिथ्य ये है कि कॉन्डम के इस्तेमाल से वे सेक्स का पूरा आनंद नहीं उठा पाएंगें। याद कीजिए साल 2016 में रीलीज़ हुई लिप्स्टिक अंडर माय बुर्का फिल्म का एक दृश्य जहां शीरीन असलम का किरदार निभा रही कोंकणा सेन शर्मा जब अपने पति के लिए कॉन्डम लेकर आती हैं तो उनका पति किस तरह कॉन्डम को फेंक देता है। मजबूरन शीरीन को इमरजेंसी गर्भनिरोधक दवाइयों का सहारा लेना पड़ता है। फिल्म में दिखाया गया यह सीन हमारे समाज की ही सच्चाई है।

सरकार द्वारा करवाए गए एक सर्वे के मुताबिक भारत में सिर्फ 5.6 फीसद शादीशुदा महिलाएं अपने पार्टनर द्वारा इस्तेमाल किए गए कॉन्डम पर निर्भर रहती हैं। वहीं 41.6 फीसद महिलाएं परिवार नियोजन की ज़िम्मेदारी उठाती हैं, जबकि बाकी 52.8 फीसद के पास किसी तरह के गर्भनिरोधक की सुविधा नहीं होती। नैशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 2015-16 के मुताबिक हर 8 में से 3 मर्दों मे माना कि गर्भनिरोध महिलाओं की ज़िम्मेदारी है। नतीजन, बहुत ही कम संख्या में पुरुष गर्भनिरोधक उपायों का उपयोग करते है। असुरक्षित यौन संबंध बनाने का सीधा नतीजा इस पितृसत्तात्मक समाज में तो औरत को ही भुगतना पड़ता है। अगर बच्चा नहीं चाहिए होगा तो गर्भपात और आई-पिल के रूप में उनके सामने विकल्प रखे जाते हैं। हालांकि ये विकल्प भी भारत में एक बड़ी आबादी के पास मौजूद नहीं है। इसी पितृसत्तात्मक रवैये की वजह से भारतीय पुरुषों को गर्भनिरोधक उपायों का उपयोग करने में कोई रूचि नहीं है।

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तस्वीर साभार : you gov

Sonali is a lawyer practicing in the High Court of Rajasthan at Jaipur. She loves thinking, reading, and writing.

She may be contacted at sonaliandkhatri@gmail.com.

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