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‘हमारे भारतीय समाज में अब महिलाएँ हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही है। महिलाओं की स्थिति अब बदल चुकी है। वे सशक्त है। अब महिलाएँ कामक़ाज़ी हो चुकी है। वे घर और ऑफ़िस दोनों ही बखूबी सँभाल रही है, इसलिए ये कहना ग़लत नहीं होगा कि अब भारतीय समाज में लैंगिक समानता आ चुकी है।‘ जैसे ही कार्यक्रम में मुख्य अतिथि ने महिला दिवस के दिन अपने वक्तव्य में ये बात कही पूरा हाल तालियों से गूंज उठा। वहीं आठवीं में पढ़ने वाली प्रीति ने जब ऐसा ही कुछ ‘नारी शक्ति’ पर केंद्रित निबंध प्रतियोगिता में लिखा तो उसे पहला स्थान मिला।

‘नारी शक्ति’ के इस अपडेटेड वर्जन वाले भाषण आजकल अक्सर सुनने मिलते है। पर अगर इन भाषणों में ‘सशक्तिकरण’, ‘शक्ति’, ‘बदलाव’ और ‘लैंगिक समानता’ के मानकों पर चर्चा करेंगें तो ये अपने आप में चर्चा और चिंतन का अलग-अलग विषय होगा। ख़ैर आज हम बात करते है ‘कामकाजी महिलाओं’ की।

मैं मानती हूँ कि हर महिला कामकाजी है। क्योंकि हमारे पितृसत्तात्मक समाज के बनाए जेंडर के ढाँचे में महिलाओं को न चाहते हुए भी उनके ज़िम्मे हर वो बुनियादी काम सौंपा जाता है, जिसके बिना दूसरा कोई काम संभव नहीं। यानी कि रोटी बनाने, कपड़े तैयार करने और परिवार को संभालने का काम। मतलब वो काम जिसका कोई भुगतान नहीं किया जाता और यही वजह है कि ‘कामकाज’ इन कामों को न शामिल करते हुए, सिर्फ़ उन्हीं काम को शामिल किया जाता है जिसमें पैसों का भुगतान किया जाता है।

कामकाजी महिलाओं के संदर्भ में कहें तो जिस दिन उन्हें घर के काम के भार से मुक्त किया जाएगा उस दिन से लैंगिक समानता आएगी।

‘कामकाजी महिलाओं’ के संदर्भ में अक्सर ये कहा जाता है कि वे सशक्त हो गयी है, जिससे लैंगिक समानता आ गयी है। पर वास्तव में आर्थिक स्वावलंबन से महिलाएँ सशक्त तो होती है, लेकिन इससे लैंगिक समानता तब तक नहीं आती जब तक उन्हें अपने काम से आने के बाद घर का काम करना पड़ता है। ख़ुद के लिए और पूरे परिवार के रोटी बनानी पड़ती है। बदलते समय के साथ महिला और पुरुष दोनों ही बाहर जाकर काम कर है, लेकिन जैसे ही घर के काम की बात आती है तुरंत महिलाओं का मुँह ताका जाता है। ऐसे में जब हम लैंगिक समानता की बात करते हैं तो हमें इस बात को अच्छी तरह समझना होगा कि ‘जब पैसे कमाने के काम में महिला-पुरुष समान है तो घर के काम में भेदभाव क्यों? घर के काम सिर्फ़ महिलाओं के नाम ही क्यों? ये सिर्फ़ इसलिए क्योंकि हमारे समाज ने महिला-पुरुष के बीच के जैविक भेद के आधार पर उनके काम, अवसर, व्यवहार और दायरों को बाँटा है, जो सामाजिक भाव है। यही भाव इस बात को समाज में सींचता है कि घर संभालने, खाना बनाने, परिवार संभालने जैसे सभी काम सिर्फ़ महिलाओं को है और पैसे कमाकर परिवार चलाने का काम पुरुष का है।लेकिन अब बदलते समय में जब महिलाएँ भी पितृसत्तात्मक सोच के विरुद्ध पैसे कमाने का काम कर रही हैं तो पुरुषों को भी परिवार संभालने में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी और अगर वे ऐसा नहीं करते तो लैंगिक समानता का विचार सिर्फ़ विचार तक ही सीमित रहेगा। ये सरोकार से नहीं जुड़ सकता है।

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वहीं दूसरी तरफ़ महिलाएँ नौकरी के साथ-साथ घर भी सँभाल रही हैं, ये ‘नारी शक्ति’ के नामपर महिमामंडन का नहीं बल्कि चिंतन का विषय है। चिंतन ‘समाज में महिलाओं के ऊपर बढ़ती दोहरी ज़िम्मेदारी का’ और ‘समाज के दोहरे चरित्र का, जिसने आधुनिकता और पितृसत्ता को ढ़ोने व बनाए रखने के दोनों की काम में महिलाओं को चुना है और इसका महिलाओं पर मानसिक, शारीरिक और सामाजिक तौर पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

अगर हम वास्तव में लैंगिक समानता के पैरोकार है और इसे सरोकार से जोड़ना चाहते है तो हमें ये बात अच्छे से समझनी होगी कि महिला, पुरुष या किसी भी अन्य जेंडर के इंसान में प्रकृति ने कुछ जैविक भेद बनाए है, लेकिन सामाजिक स्वरूप में कोई भी काम किसी लिंग विशेष के लिए नहीं है, क्योंकि महिलाएँ अपनी बच्चेदानी या स्तन से घर नहीं सँभालती और न ही इससे घर के काम करती है। घर के काम के लिए हाथ की ज़रूरत है जो हर इंसान के पास है। इसके साथ ही, कामकाजी महिलाओं के संदर्भ में कहें तो जिस दिन उन्हें घर के काम के भार से मुक्त किया जाएगा उस दिन से लैंगिक समानता आएगी। याद रहे घर के काम को किसी महिला पर ही नहीं घर के सदस्य पर शिफ़्ट किया जाए, फिर वो साथी या बेटा।

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तस्वीर साभार : eco-business

Swati lives in Varanasi and has completed her B.A. in Sociology and M.A in Mass Communication and Journalism from Banaras Hindu University. She has completed her Post-Graduate Diploma course in Human Rights from the Indian Institute of Human Rights, New Delhi. She has also written her first Hindi book named 'Control Z'. She likes reading books, writing and blogging.

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