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सरोजिनी नायडू का जन्म एक बंगाली परिवार में 13 फरवरी 1879 को हैदराबाद में हुआ था। उनके पिता, अघोर नाथ चट्टोपाध्याय, हैदराबाद कॉलेज के संस्थापक थे। मूल रूप से पूर्व बंगाल के रहने वाले, वे एक वैज्ञानिक होने के साथ-साथ उर्दू और बंगाली कवि भी थे। उनकी मां वरदा सुंदरी एक प्रसिद्ध गायिका थी। वह बंगाली गीत भी लिखती थी। उनके कुल सात भाई – बहन थे। सोरजिनी नायडू ने 12 साल की उम्र में ही हाई स्कूल की पढ़ाई पूरी की। मद्रास प्रेसीडेंसी में उनकी पहली रैंक आई थी। लेकिन कविता के प्रति इतने प्यार की वजह से वे आगे की पढ़ाई पूरी नहीं कर पाई। यहां तक कि उन्हें विदेश जाकर भी पढ़ने का मौका मिला। 19 साल की उम्र में उनकी शादी गोविंदराजुलू नायडू से हुई थी जो कि एक अंतरजातीय विवाह था। गोविंदराजुलू नायडू पेशे से एक डॉक्टर थे। शादी के बाद, वे हैदराबाद में ही रह रही थी। उनके कुल 5 बच्चे थे जिसमे से एक बेटी पद्मजा थी जो आगे चलकर 3 नवंबर 1956 को पश्चिम बंगाल की राज्यपाल बनी। शादी से पहले सरोजिनी की इंग्लैंड में गोपाल कृष्ण गोखले से मुलाकात हुई थी। गोखले से प्रेरित होकर ही वे ब्रिटिश हुकूमत के ख़िलाफ़ भारत के स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में शामिल हुई थी। 

स्वतंत्रता आंदोलन की एक सक्रिय भागीदार, सरोजिनी नायडू ने पूरे देश में उग्र भाषण दिए। उन्होंने महिलाओं के अधिकारों, श्रम अधिकारों की बात की और सब से इस संघर्ष में शामिल होने का आग्रह किया। एनी बेसेंट की मदद से, उन्होंने 1917 में महिला इंडिया एसोसिएशन की स्थापना की और संविधान सभा में, महिलाओं की शिक्षा और बाल विवाह को समाप्त करने पर ध्यान केंद्रित किया। स्वदेशी आंदोलन के दौरान, नायडू ने महिलाओं से विदेशी कपड़े छोड़ने का आग्रह किया। साल 1925 में एनी बेसेंट के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष बनने वाली दूसरी महिला, सरोजिनी नायडू ने कानपुर में पार्टी के वार्षिक सत्र की अध्यक्षता की। नमक के ऊपर लगने वाले टैक्स के खिलाफ सत्याग्रह के दौरान, उन्हें कई बार कैद किया गया।

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कहती थी, “जब तक मेरा जीवन है, जब तक मेरी इस भुजा से रक्त बहता है, मैं स्वतंत्रता के लिए लड़ना नहीं छोडूंगी। मैं केवल एक महिला हूं, केवल एक कवि हूं। लेकिन एक महिला के रूप में, मैं आपको विश्वास, साहस और धैर्य की ढाल देती हूं और एक कवि के रूप में, मैं ध्वनि और गीत के बिगुल से आपको लड़ाई के लिए आह्वान करती हूं। मैं कैसे तुम सब को इस गुलामी से जगाऊं।”

डांडी मार्च के बाद जब महात्मा गांधी को गिरफ्तार कर लिया गया, तब 2500 लोगों का प्रतिनिधत्व करते हुए उन्होंने धरसाना साल्ट वर्क्स पर आक्रमण किया। तब वह बेसुध आवाज में बोली, “गांधी जी का शरीर कैद है, लेकिन उनकी आत्मा हमारे साथ है।” इस हमले के बाद और भी कई लोगों के साथ, उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें 9 महीने के लिए जेल में डाल दिया गया। उन्हें तीसरी बार भारत छोड़ो आंदोलन में कैद किया गया था और गांधी जी के साथ आगा खान पैलेस में रखा गया था। साल 1931 में वह महात्मा गांधी के साथ दूसरी राउंड टेबल कांफ्रेंस के लिए लंदन भी गईं थी।    

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सरोजिनी नायडू ने संविधान सभा के सदस्यों को झंडे के लिए राजी करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। असेंबली में, उन्होंने एक घटना का ज़िक्र किया जब 42 देशों ने महिलाओं को बर्लिन में एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भेजा और एक फ्लैग परेड शुरू होनी थी, भारत का कोई आधिकारिक झंडा नहीं था। उन्होंने कहा, “यह मेरे लिए पीड़ा का क्षण भी था। लेकिन मेरे सुझाव पर, सुबह-सुबह, कुछ महिला भारतीय प्रतिनिधियों ने तिरंगे झंडे को बनाने के लिए अपनी साड़ियों को फाड़कर हमारे देश का झंडा बनाया, ताकि हमारे देश को राष्ट्रीय बैनर की कमी के लिए अपमानित न किया जाए।” ध्वज के प्रति उसकी दृढ़ता और भावनाओं को देखकर असेंबली ने उन्हें ध्वज को प्रस्तुत करने के लिए पहले व्यक्ति के रूप में चुना गया।  

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सरोजिनी अपने कस्बे की हिंदू-इस्लामिक संस्कृति से बेहद प्रभावित थी और अपनी कविताओं में इसकी अभिव्यक्ति करती थी। गीतों के प्रति उनका उत्साह उन्हें देश के सामाजिक और राजनीतिक जीवन में खींचता चला गया। वे हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच दरार से बहुत परेशान थी। हिंदू संस्कृति के साथ-साथ, वे इस्लामिक संस्कृति और मुस्लिमों के जीवन जीने के तरीके की भी भरपूर प्रशंसा करती थी। INC के लखनऊ सत्र में, उन्होंने लोकमान्य तिलक के मार्गदर्शन में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच सहयोग लाने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। हिंदू-मुस्लिम एकता एक जुनून और सरोजिनी का जीवन मिशन बन गया। सातवें अखिल भारतीय महिला सम्मेलन को संबोधित करते हुए उन्होंने घोषणा की, “जो भी भारतीय संकीर्ण और सांप्रदायिक है, वह कभी भी देश के प्रति वफादार नहीं हो सकता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मंदिर हो या मस्जिद हो, चर्च हो या अग्नि मंदिर हो, हमें हर उस बाधा को पार करना चाहिए जो हमें एक दूसरे से विभाजित करती है।”

सरोजिनी नायडू ने स्वतंत्रता के बाद भी एक प्रमुख पद धारण किया। उन्हें संयुक्त प्रांत, अब उत्तर प्रदेश का पहला राज्यपाल नियुक्त किया गया था। 2 मार्च, 1949 को अपनी आखिरी सांस लेने तक वह अपने पद पर बनी रही। वह कहती थी, “जब तक मेरा जीवन है, जब तक मेरी इस भुजा से रक्त बहता है, मैं स्वतंत्रता के लिए लड़ना नहीं छोडूंगी।  मैं केवल एक महिला हूं, केवल एक कवि हूं। लेकिन एक महिला के रूप में, मैं आपको विश्वास, साहस और धैर्य की ढाल देती हूं और एक कवि के रूप में, मैं ध्वनि और गीत के बिगुल से आपको लड़ाई के लिए आह्वान करती हूं। मैं कैसे तुम सब को इस गुलामी से जगाऊं।”  लखनऊ राज भवन में उन्होंने अपनी अंतिम सांसें ली। उनकी श्रद्धांजलि देते वक्त पंडित जवाहरलाल नेहरू कहते है कि वे बहुत ही प्रतिभाशाली महिला थी। आजादी के संघर्ष में उन्होंने कला और कविता, दोनों से ही योगदान दिया। उन्होंने  भारत की समृद्ध संस्कृति का प्रतिनिधित्व किया, एक ऐसी संस्कृति जिसकी बहुत सारी धाराएं है।     

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