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‘टुकड़े टुकड़े दिन बीता, धज्जी धज्जी रात मिली, जिसका जितना आंचल था, उतनी ही सौगात मिली।’ यह फलसफा दिग्गज अभिनेत्री मीना कुमारी की ही ज़ुबानी है।

मीना कुमारी का जन्म 1 अगस्त को साल 1933 में भारत के महाराष्ट्र राज्य में हुआ था। मीना कुमारी के परिवारवाले बेहद ही गरीब थे जिसके कारण मीना कुमारी के जन्म के कुछ घंटों बाद ही ग़रीबी से जूझ रहे उनके पिता अली बक़्श उन्हें अनाथाश्रम में छोड़ आए थे क्योंकि वे उनके डॉक्टर को उनकी फ़ीस देने में असमर्थ थे। हालांकि अपनी नवजात बेटी से दूर जाते-जाते पिता का दिल भर आया और अली बक़्श अपनी चंद दिनों की बेटी को घर वापस ले आए। जब मीना कुमारी का जन्म हुआ था तो उस वक्त इनके परिवार वालों ने इनका नाम महज़बीन बानो रखा था। लेकिन फिल्मों में आने के बाद इन्होंने अपना ये नाम बदलकर मीना कुमारी रख लिया था। जिसके बाद से इनको इसी नाम से जाना जाने लगा। उनके पिता अली बक्श पारसी रंगमंच के एक मंझे हुए कलाकार थे और उन्होंने फ़िल्म ‘शाही लुटेरे’ में संगीत भी दिया था। उनकी मां इकबाल बानो भी एक मशहूर नृत्यांगना और अदाकारा थी। मीना कुमारी की बड़ी बहन खुर्शीद जूनियर और छोटी बहन मधु (बेबी माधुरी) भी फिल्म अभिनेत्री थी।

मीना कुमारी की नानी हेमसुंदरी मुखर्जी पारसी रंगमंच से जुड़ी हुई थी। बंगाल के प्रतिष्ठित टैगोर परिवार के पुत्र जदुनंदन टैगोर ने परिवार की इच्छा के ख़िलाफ़ हेमसुंदरी से शादी की थी। 1862 में दुर्भाग्य से जदुनंदन का देहांत होने के बाद हेमसुंदरी को बंगाल छोड़कर मेरठ आना पड़ा। यहां अस्पताल में नर्स की नौकरी करते हुए उन्होंने एक उर्दू के पत्रकार प्यारेलाल शंकर मेरठी जो कि ईसाई था, उनसे शादी करके ईसाई धर्म अपना लिया। हेमसुंदरी की दो बेटी हुई जिनमें से एक प्रभावती (इकबाल बानो), मीना कुमारी की मां थी। मीना कुमारी ने बेहद ही छोटी उम्र में फिल्मों में काम करना शुरू कर दिया था जिसके चलते इन्हें कभी भी पढ़ाई करने का मौका नहीं मिल सका। स्कूल ना जाने के कारण मीना कभी भी पढ़ नहीं सकी लेकिन मीना ने एक निजी टीचर रख उनसे शिक्षा हासिल की तथा उन्होंने कई भाषाओं का ज्ञान प्राप्‍त किया था।

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बाल कलाकार के रूप में मीना। तस्वीर साभार: Dareechah

मीना कुमारी ने एक चाइल्ड आर्टिस्ट के रूप में कई फिल्मों में काम किया था। छोटी सी उम्र में ही मीना ने 12 से ज्यादा फिल्मों में अभिनय किया था। मीना के पिता एक अभिनेता थे इसलिए मीना को भी फिल्मों में काम मिल गया था। साल 1946 तक मीना को महज़बीन के नाम से जाना जाता था लेकिन इस साल आई फिल्म ‘बच्चों का खेल’ में इन्होंने अपने असली नाम के साथ काम नहीं किया था और इस फिल्म में अपना नाम बदल लिया था। इस फिल्म के के बाद से इन्हें मीना कुमारी नाम से जाना जाने लगा था। जिस वक्त इन्होंने अपना असली नाम बदला था, उस वक्त इनकी उम्र 13 साल थी। इस फिल्म से पहले इन्होंने अपने असली नाम ‘महजबीन’ के साथ कुल 11 फिल्में की थी। मीना ने चांदनी चौक, आज़ाद, एक ही रस्ता, शारदा, सहारा, कोहिनूर, शरारत जैसी फिल्मों में काम किया था और ये फिल्में लोगों ने काफी पसंद की थी। मीना ने अपने 33 साल के करियर में 90 से ज्यादा फिल्मों में काम किया। उनका सबसे उम्दा काम ‘साहब बीबी और ग़ुलाम’ फिल्म में दिखाई दिया और साथ ही पाकीज़ा फिल्म उनकी सबसे यादगार फिल्मों में से एक है।

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फिल्म बच्चों के खेल का एक पोस्टर

साल 1952 में, विजय भट्ट ने उन्हें अपनी फिल्म बैजू बावरा में मुख्य भूमिका दी। फिल्म ने मीना को प्रसिद्धि दिलाई। इस फिल्म के बाद साल 1953 में ‘परिणीता’ नाम की फिल्म में भी इन्होंने बतौर एक लीड कलाकार काम किया था। वह साल 1954 में पहली बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का फिल्मफेयर पुरस्कार विजेता बनीं। साल 1962 में, साहिब बीवी और गुलाम रीलीज़ हुई, जहां उसने एक उपेक्षित पत्नी की भूमिका निभाई, जो अपने पति के प्यार और ध्यान के लिए पूरी तरह से तरसती थी। इस फिल्म ने मीना को एक नए ही मुकाम तक पहुंचा दिया था। पाकीजा फिल्म को कमाल अमरोही ने बनाया था और इस फिल्म में उन्होंने अहम भूमिका निभाई थी। कहा जाता है कि ये फिल्म कमाल अमरोही का ड्रीम प्रोजेक्ट थी। इसी दौरान मीना और कमाल अलग हो गए जबकि फिल्म पाकीजा की शूटिंग अभी भी चल रही थी। मीना कुमारी ने भी पाकीजा फिल्म को बनाने में अपने पति की आर्थिक सहायता की थी। लंबे इंतज़ार के बाद साल 1972 में ये फिल्म रिलीज़ हुई। मीना ने फिर से सफलता का स्वाद चखा। बेहद ही कम उम्र में उन्हें बॉलीवुड में काफी बड़ा मुकाम हासिल कर लिया था।

मीना कुमारी एकमात्र ऐसी अभिनेत्री थी, जिन्होंने लगातार 13 सालों तक सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के फिल्मफेयर ख़िताब को अपने नाम किया था

फिल्म पाकीज़ा का एक दृश्य। तस्वीर साभार: दैनिक भास्कर

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मीना कुमारी को शायरी को भी बहुत शौक था। वह नाज़ नाम से शेरो-शायरी किया करती थी। इन्होंने कई कविताएं भी लिखी थी। जिसे गुलज़ार ने आगे चलकर प्रकाशित भी किया। वहीं, काफी कम लोगों को ये पता है कि इन्होंने बतौर एक गायक भी कई सारी फिल्मों में अपनी आवाज दी थी जिसके बाद उन्होंने कई फिल्मों में गीत गाए। साथ ही उन्होंने उन्होंने “ईद का चांद” फिल्म में संगीतकार का भी काम किया था। साल 1966 में, उन्हें फिल्म काजल में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के रूप में फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। मीना कुमारी को बंगाल फिल्म पत्रकार एसोसिएशन पुरस्कार (बीएफजेए) से भी सम्मानित किया गया। मीना कुमारी एकमात्र ऐसी अभिनेत्री थी, जिन्होंने लगातार 13 सालों तक सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के फिल्मफेयर ख़िताब को अपने नाम किया था, लेकिन साल 1979 में नूतन ने फिल्मफेयर के ख़िताब को अपने नाम कर रिकॉर्ड को तोड़ दिया। फ़िल्म पाक़ीज़ा के रिलीज़ होने के महज़ तीन हफ़्ते बाद मीना कुमारी की तबीयत बिगड़ने लगी। 31 मार्च 1972 में सिर्फ 38 साल की उम्र में मीना कुमारी ने अपनी आखिरी सांस ली। पति कमाल अमरोही की इच्छानुसार उन्हें मुंबई के मज़गांव के रहमताबाद कब्रिस्तान में दफनाया गया। मीना कुमारी इस लेख को अपनी कब्र पर लिखवाना चाहती थी।

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तस्वीर साभार : The Print


मुझे यात्राएं करनी पसंद है क्योंकि उन यात्राओं से हम हमेशा कुछ नया सीखते हैं साथ ही मुझे गढ़े हुए शब्द तथा उनसे जुड़े हुए सामाजिक संदर्भ या जेंडर संबंधों को चुनौती देना पसंद है।

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