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स्कूलों में जब कभी भी हमलोग हिंदी में भारत देश पर निबंध लिखा करते थे तो उस निबंध की पहली लाइन हुआ करती थी कि ‘भारत एक कृषि प्रधान देश है।‘ बचपन से ही भले ही पूरे निबंध का अर्थ समझे बिना रटकर लिखती, लेकिन ‘कृषि प्रधान’ वाली बात बखूबी समझ में आती थी। क्योंकि मैंने अपने गाँव के लोगों, अपने पिता, दादा और चाचा को खेती करते हुए देखा था और ये कोई शौक़िया खेती नहीं बल्कि घर की अर्थव्यवस्था का आधार भी थी। आज भी कुछ नहीं बदला। खेती करने के तरीक़े आधुनिक हुए लेकिन अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार आज भी खेती है। अर्थव्यवस्था ‘घर’, ‘गाँव’ और पूरे ‘देश’ की।

लेकिन मौजूदा सरकार ने खेती की व्यवस्था और किसान के भविष्य को अपने तीन नए कृषि कानूनों के इस कदर जोखिम में डाल दिया है कि हमेशा अपनी खेती में व्यस्त रहने वाले किसान को खेती छोड़कर अपने घरों में ताला लगाकर सड़कों पर उतरना पड़ रहा है। आज नए कृषि क़ानून के खिलाफ किसानों के विरोध-प्रदर्शन को चार दिन से ज़्यादा हो चुके हैं। आंदोलनरत किसान हरियाणा-दिल्ली की सीमा सिंघु बॉर्डर, टिकरी बॉर्डर और कुछ बुराडी के निरंकारी ग्राउंड में पर लगातार अपनी माँगों के साथ डटे हुए हैं। वे सरकार से इस काले क़ानून को वापस लेने की माँग कर रहे हैं। दिल्ली से लगते गाजीपुर बॉर्डर पर भी किसान डटे हैं। उन्हें बिना ट्रैक्टर प्रवेश की इजाजत दी गई है। हरियाणा के जींद, पानीपत से बड़ी संख्या में किसान दिल्ली की ओर आ रहे हैं। वहीं, बुराड़ी पहुंचे किसानों के लिए टेंट, खाने-पीने का इंतजाम किया गया है।  

दरअसल, देशभर में कुल किसानों की आबादी में छोटे किसानों का हिस्सा 86 फ़ीसद से अधिक है और वो इतने कमज़ोर हैं कि प्राइवेट व्यापारी उनका शोषण आसानी से कर सकते हैं। देश के किसानों की औसत मासिक आय 6,400 रुपये के क़रीब है। किसान कहते हैं नए क़ानूनों में उनकी आर्थिक सुरक्षा तोड़ दी गयी हैं और उन्हें कॉर्पोरेट के हवाले कर दिया गया है। इस क़ानून से किसानों को अपनी खेती और अपना भविष्य अंधेरे में दिखाई पड़ रहा है। वही दूसरी तरफ़, प्रशासन लगातार किसानों को रोकने के लिए वाटर कैनन और आंसू गैस का इस्तेमाल कर रही। दिल्ली तक पहुँचने के लिए हर बॉर्डर किसानों के लिए प्रशासन के सख़्त पहरे वाला पड़ाव बन गया है। लेकिन पानी तेज बौछारें और आंसू गैस की जलन किसानों के इरादों न तो कमजोर कर पा रही है और न उनके बढ़ते कदमों को रोक पा रही है।

रेल की पटरी पर लेटे देश के किसानों को मीडिया से कवरेज की उम्मीद क्यों होगी ?

केंद्र ने फिर कहा है कि सरकार किसान संघों से 3 दिसंबर को बातचीत के लिए तैयार है। सूत्रों ने बताया कि किसानों को बुराड़ी पहुंचाने के लिए अमित शाह समेत कई केंद्रीय मंत्रियों ने किसान नेताओं से बात की है, लेकिन किसान हिलने को तैयार नहीं हैं। उन्हें लगता है कि हाइवे छोड़ने पर उनकी स्थिति कमजोर होगी। वे चाहते हैं कि मंत्री बॉर्डर पर आकर बात करें। अब जनता जब अपने प्रतिनिधियों से आमने-सामने बात करना चाहे तो इसमें हर्ज क्या है? ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि जनता के चुने प्रतिनिधि अब उन्हीं से शर्तों के साथ मिलने की शर्त क्यों रख रहे हैं। किसान गृह मंत्री अमित शाह की अपील के बाद भी शनिवार को नाराज नजर आए। भारतीय किसान यूनियन- पंजाब के अध्यक्ष जगजीत सिंह ने कहा कि अमित शाह जी ने सशर्त जल्दी मिलने की बात कही है जो कि ठीक नहीं है। उन्हें बिना शर्त खुले दिल से बातचीत की पेशकश करनी चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि हम रविवार को बैठक करेंगे और उसके बाद अपनी आगे की योजना बनाएंगे। भारतीय किसान यूनियन (राजेवाला) के अध्यक्ष बलबीर सिंह राजेवाला ने बताया, ‘हमने अभी तक बुराड़ी मैदान में जाने का निर्णय नहीं किया है। शाम में हम बैठक करेंगे जिसमें आगे की रूपरेखा तय की जाएगी।’

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कोरोना महामारी का दौर कृषि और किसान की महत्ता और उनकी ताक़त देखने, दिखाने और समझने का सबसे बेहतरीन व जीवंत उदाहरण है। जब पूरे शहरों के कारख़ाने बंद थे तो प्रवासी मज़दूरों का हुजूम वापस अपने गाँव की तरफ़ उमड़ा और ये खेती और किसान ही थे जिन्होंने महामारी के इस दौर को भूखमरी में तब्दील नहीं होने दिया। ऐसे में सरकार का नए कृषि विधेयक के माध्यम खेती को कोरपोरेट के हाथों देने की सोच पूरे देश को अंधकार में डाल देगी, जिसका अंधेरा तुरंत नहीं बल्कि बदलते समय के साथ दिखाई देगा।

दूसरी तरफ़, इस किसान आंदोलन ने एक़बार फिर मौजूदा सरकार की मंशा पर सवाल खड़े किए है। वो मंशा जो लोकतंत्र का दमन कर रही है, जो सुधार तो दूर सवाल करने के अधिकार पर वाटर क़ैनन और आंसू गैस के गोले दाग रही है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि आंदोलनरत किसान सिर्फ़ अपने नहीं बल्कि देश के लिए एकजुट हुए है। इसलिए ज़रूरी है कि हम सभी मिलकर किसान आंदोलन के सवालों, माँगों और उनकी आवाज़ को अपना साथ देकर और मज़बूत बनाए। वरना अभी नहीं तो कभी नहीं। बाक़ी सोचिएगा, जब खेती-किसानी ही नहीं बचेगी तो कोई तकनीक काम नहीं आएगी।

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तस्वीर साभार : thehindu

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