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प्रेम एक खूबसूरत एहसास ही नहीं है बल्कि एक महत्वपूर्ण सामाजिक दायित्व और एक रूढ़िवादी समाज में बगावत भी है। प्रेम को लेकर चाहे जितनी जटिलताएं इंसान अपने जीवन में महसूस करता हो लेकिन उसके बारे में कभी ठीक-ठीक समझ नहीं पाता। दुनिया भर में प्रेम पर अनगिनत कला,साहित्य-कविताएं और इतिहास गाथाएं लिखी गई हैं। लेकिन प्रेम एक ऐसी अवधारणा है जिस पर कितना भी लिखा जाए, पढ़ा जाए कम रहेगा। आर्ट ऑफ लविंग ऐसी ही एक किताब है जो हमें प्रेम के उस स्वरूप से अवगत कराती है जिसमें प्रेम के सिद्धांत और अभ्यास के सभी पहलुओं की चर्चा है। उससे जुड़ी अनेक भ्रांतियों को ध्वस्त करके उसके वास्तविक अर्थों से परिचित करवाती है। प्रेम और उससे जुड़ी जटिलताओं को सरल शब्दों में समझानती आर्ट ऑफ लविंग एक अनूठी किताब है जो बताती है प्रेम उसी तरह है जैसे जीवन जीने की एक कला। यह किताब प्रेम करने की कोई आसान कलाएं नहीं बताती जिससे आप प्रेम करना सीख लें या कोई आपसे प्रेम करने लगे। बल्कि यह किताब प्रेम के उस सिद्धांत पर है जो सिखाती है कि जीवन को समझे बगैर प्रेम को नहीं समझा जा सकता।

21 मार्च 1900 को जर्मनी में जन्मे एरिक फ्रॉम अमरीका के अग्रणी मनोवैज्ञानिक और सामजिक समालोचक माने जाते हैं। 1941 में प्रकाशित उनकी किताब ‘एस्केप फ्रॉम फ्रीडम’ उनकी पहली महत्वपूर्ण और संभवत सबसे चर्चित किताब भी मानी जाती है। इसके अलावा ‘मैन फॉर हिमसेल्फ’, ‘द सेन सोसायटी’, ‘द आर्ट ऑफ लविंग’, ‘सिग्मंड फ्रायडज मिशन’,और ‘ टू हैव ऑर टू बी’ अन्य उनकी चर्चित किताब है।

आर्ट ऑफ लविंग ऐसी ही एक किताब है जो हमें प्रेम के उस स्वरूप से अवगत कराती है जिसमें प्रेम के सिद्धांत और अभ्यास के सभी पहलुओं की चर्चा है।

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एरिक फ्रॉम की विश्वविख्यात रचना ‘द आर्ट ऑफ लविंग’ से कुछ निम्नलिखित महत्वपूर्ण पंक्तियां जो प्रेम के स्वरूप पर हमारी समझ को नए आयाम देती हैं।

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1-“जिसे किसी चीज़ का ज्ञान नहीं है, वह किसी चीज़ से प्रेम भी नहीं करता। जो कुछ कर नहीं सकता, वह कुछ समझ भी नहीं सकता। जो कुछ समझ नहीं सकता, वह व्यर्थ है। लेकिन जो समझता है, वह प्रेम भी करता है, ध्यान भी देता है, देखता है, जिस चीज़ में जितना ज्यादा ज्ञान होता है, उसमें उतना ही ज्यादा प्रेम होता है,जो समझते है कि सभी फल उतनी ही देर में पक जाते हैं जितनी देर में शहतूत, वे अंगूरों के बारे में कुछ नहीं जानते।”

2-“प्रेम में, अगर वह सचमुच ‘प्रेम’ है, एक वायदा ज़रूर होता है कि मैं अपने व्यक्तित्व और अस्तित्व की तहों से अपने ‘प्रेमी’ या ‘प्रेमिका’ को उसके व्यक्तित्व और अस्तित्व की तहों तक प्रेम करता हूं। अपने सार-तत्व में सभी मनुष्य एक जैसे ही हैं। हम सभी एक ही इकाई के हिस्से हैं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हम किससे प्रेम करते हैं। प्रेम एक तरह का संकल्प है।”

3-“शायद ही कोई ऐसी गतिविधि हो, दूसरा कोई उद्यम हो, जो प्रेम की तरह बड़ी-बड़ी उम्मीदों और अपेक्षाओं से शुरू होकर इतने ज्यादा मामलों में इतनी बुरी तरह विफल होता हो।”

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4-“प्रेम व्यक्ति के भीतर एक सक्रिय शक्ति का नाम है। यह वह शक्ति है जो व्यक्ति और दुनिया के बीच की दीवारों को तोड़ डालती है, उसे दूसरों से जोड़ देती है।”

5-“अगर मैं किसी एक व्यक्ति से प्रेम करता हूं तो मैं सभी व्यक्तियों से प्रेम करता हूं, किसी से ‘आय लव यू’ कहने का सच्चा अर्थ है कि मैं उसके माध्यम से पूरी दुनिया और जिंदगी से प्रेम करता हूं।’

6-“प्रेम वहीं संभव है जहां दो व्यक्ति अपने अस्तित्व के केंद्र से एक दूसरे के संपर्क करें। जिसके लिए ज़रूरी है कि वे दोनों ही अपने अस्तित्व के केंद्र से महसूस करते हो।”

7-“समाज का गठन इस तरीके से करना होगा कि मनुष्य का आर्थिक उद्यम उसकी स्वाभविक प्रकृति और प्रेम करने की उसकी इच्छा और क्षमता के अनुकूल हो, उससे मेल खाता हुआ हो, उसके विरुद्ध न हो।

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तस्वीर: श्रेया टिंगल फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए

मेरा नाम प्रीति है। मैं दिल्ली से हूँ। मैंने जे.एन.यू. से हिंदी विषय में मास्टर किया है। वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय से 'हिन्दी के नारीवादी उपन्यासों में स्त्री-मुक्ति की अवधारणा: मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यासों के संदर्भ में'' विषय पर शोध कर रही हूं। मैं एक लेखक बनना चाहती हूं। मुझे नारीवादी बहसों और अवधारणाओं के विषयो पर पढ़ना-लिखना पसन्द है।

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