संस्कृतिसिनेमा बॉलीवुड के गाने जो यौन हिंसा, रूढ़िवादी सोच और पितृसत्ता को बढ़ावा देते हैं

बॉलीवुड के गाने जो यौन हिंसा, रूढ़िवादी सोच और पितृसत्ता को बढ़ावा देते हैं

बॉलीवुड के गानों के लिरिक्स/बोल आदि का विश्लेषण करने पर तो यही लगता है कि बॉलीवुड खुद ही औरतों के ख़िलाफ़ हो रहे अपराधों को बढ़ावा देने का काम और लोगों को ऐसे अपराधों को करने के लिए प्रेरित करता है।

यूं तो बॉलीवुड नारी सशक्तिकरण की बातें करता है, भारत की कई महान औरतों के जीवन संघर्षों पर फ़िल्म बनाकर हम तक उनकी कहानी पहुंचाता है पर इसके आलावा क्या बॉलीवुड फिल्मों का कंटेंट सेक्सिज़म, स्त्रीद्वेष, महिलाविरोधी बातों को बढ़ावा नहीं देता? बॉलीवुड के गानों के लिरिक्स/बोल आदि का विश्लेषण करने पर तो यही लगता है कि बॉलीवुड खुद ही औरतों के ख़िलाफ़ हो रहे अपराधों को बढ़ावा देने का काम और लोगों को ऐसे अपराधों को करने के लिए प्रेरित करता है। बॉलीवुड के सुपर हिट चमकते-धमकते गानों में स्त्री उत्पीड़न साफ-साफ नज़र आता है। हीरो द्वारा कॉलेज में आई एक नई लड़की को पहली बार देखते ही उसकी ख़ूबसूरती पर लट्टू हो जाना क्योंकि पहली बार देखकर हुआ प्यार तो बेशक़ खूबसूरती से ही होता है। इसके बाद शुरू होता है लड़की का पीछा करना, अपने दोस्तों के साथ रास्ते भर उसके आस-पास मंडराना, उसका दुप्पट्टा खींचना, उसके घर का पता लगाकर आधी रात को उसकी बालकनी से उसके कमरे में घुस जाना आदि। और इन सारी घटनाओं पर गाने बना देना, क्या ये उत्पीड़न, नहीं है? क्या ये सेक्सिज़म, स्त्रीद्वेष को बढ़ावा देना नहीं है?

हमारे देश में आधे से ज़्यादा यौन हिंसा के मामले इसी तरह के होते हैं, जिसमें स्कूल-कॉलेज जाने वाली लड़कियों के साथ सड़क पर लड़के बद्तमीज़ी करते हैं, उनका पीछा करते हैं, उन पर भद्दी टिप्पणियां करते हैं। और यही अपराध जिन्हें फिल्मों और उनके गानों में बेहद सामान्य दिखाया जाता है, वे आगे चलकर बड़ा रूप ले लेते हैं जैसे एसिड अटैक, बलात्कार आदि।

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कुछ साल पहले हरियाणा पुलिस ने महिलाओं की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए एक ऑनलाइन सर्वे करवाया था, जिसके आंकड़े हैरान करने वाले थे। आंकड़ों के मुताबिक करीब 32 प्रतिशत महिलाओं को स्कूल-कॉलेज जाते हुए यौन हिंसा का सामना करना पड़ता है। बाज़ार जाते हुए करीब 27 प्रतिशत, पब्लिक ट्रांसपोर्ट में करीब 20 प्रतिशत। वहीं, पार्क में करीब 16 प्रतिशत और ऑफिस जैसे कार्यक्षेत्र में करीब 4 प्रतिशत महिलाओं को छेड़खानी का सामना करना पड़ता है। सोचकर देखिए क्या इसमें बॉलीवुड गानों और उसके सेक्सिस्ट लिरिक्स का कोई योगदान नहीं? बॉलीवुड के गानों को गौर से सुनने पर हमें इसकी रुढ़ीवादी विचारधारा बेहद साफ नज़र आती है। जिसके कुछ उदाहरण हैं :

फटा पोस्टर निकला हीरो फ़िल्म का एक गाना जिसकी कुछ पंक्तियां कुछ इस प्रकार हैं:  “अच्छी बातें कर ली बहुत, ठंडी आहें भर ली बहुत अब करूंगा तेरे साथ गंदी बात।” क्या इसमें यौन हिंसा की कोशिश या धमकी नज़र नहीं आती? इसी फ़िल्म का एक और गाना भी कुछ इसी तरह है: “तेरा पीछा करूँ तो रोकने का नहीं ।” किसी का पीछा करना उसकी निजी ज़िंदगी में दखल देना जो क़ानूनन अपराध है उसे बॉलीवुड के गानों ने प्यार जताने का तरीका बना दिया है। क्या ये समाज में गलत मानसिकता नहीं फैला रहा?

बॉलीवुड के गानों के लिरिक्स/बोल आदि का विश्लेषण करने पर तो यही लगता है कि बॉलीवुड खुद ही औरतों के ख़िलाफ़ हो रहे अपराधों को बढ़ावा देने का काम और लोगों को ऐसे अपराधों को करने के लिए प्रेरित करता है।

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राज़ी फ़िल्म का गाना दिलबरों की लाइन कुछ यह कहती हैठ “मुड़ र ना देखो दिलबरों, फसलें जो काटी जाएं उगती नहीं हैं, बेटियां जो ब्याही जाएं मुड़ती नहीं हैं ।” जहां आज घरेलू हिंसा, वैवाहिक बलात्कार यानी मैरिटल रेप, दहेज़ आदि के खिलाफ आवाज़ उठाने के लिए महिलाओं को प्रेरित किया जा रहा, समाज को यह समझाने का प्रयास किया जा रहा कि एक तलाकशुदा बेटी मरी हुई बेटी से बेहतर होगी, उसमें अभी भी ऐसे रुढ़ीवादी सोच के गाने क्या समाज में कोई गलत संदेष नहीं भेज रहे हैं?बॉलीवुड के गानों की ऐसी पंक्तियां पितृसत्तात्मक रुढ़ीवादी विचारधारा का प्रतिबिम्ब हैं।

बॉलीवुड के कुछ चर्चित आइटम सांग्स जैसे,”मुन्नी बदनाम, कोको कोला, मैं तो तंदूरी मुर्गी” आदि जिसमें लड़की की एक वस्तु से तुलना की गई है। शायद यही कारण है कि आज समाज में औरतों को महज़ यौन वस्तु मान लिया गया है जो कि पुरूषों के मनोरंजन और उनकी संतुष्टि के लिए ही हैं। जल्द ही रिलीज होने वाली वरुण धवन और सारा अली खान की फ़िल्म कुली नंबर 1 के एक गाने की कुछ पंक्तियों पर गौर करें- “अरे ओ मोनालिसा चलेगा ऐसा कैसा, छोडू ना तेरा पीछा, बड़ी माइंडब्लोइंग लड़की फंसाई।” गाने में वही सोच जो हमेशा से चलती आ रही, लड़की का पीछा करना और उसे अपने तरीके से मनाते रहना और यही नहीं बॉलीवुड में तो ये भी दिखाते हैं कि लड़की इन हरकतों के बावजूद लड़के को अपना दिल दे बैठती है या फिर यूं कहे कि लड़के की इन हरकतों से ही प्रभावित होकर वह उशके प्यार में पड़ जाती है। क्या ये गाने समाज में ऐसी मानसिकता नहीं फैला रहा कि ये सब करने से लड़की भी ख़ुश होती है और जबकि यही सोच आगे चलकर उत्पीड़न और बड़े-बड़े अपराधों को जन्म देती है। बॉलीवुड हमेशा यही सिखाता आया है कि लड़की की ना में भी हां छिपी होती है जो सरासर गलत है। बॉलीवुड आज भी कंसेंट यानी सहमति की अवधारणा से परिचित नहीं है।

फ़िल्म,टीवी,रेडियो आदि ये सब ना केवल मनोरंजन का साधन हैं बल्कि समाज में प्रचार एवं प्रसार का साधन भी हैं जो आज के समय में समाज की मानसिकता पर गहरा प्रभाव डालते हैं।इसलिए यह ज़रूरी है कि बॉलीवुड इस बात को समझें और ऐसी फ़िल्म और गाने बनाए जो समाज में जागरूकता फैलाए ना कि अपराधों को बढ़ावा देने वाली मानसिकता।

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About the author(s)

मैं ख़ुशी वर्मा इलाहाबाद स्टेट यूनिवर्सिटी की छात्रा हूं। पढ़ाई के साथ साथ मैं लेखन कार्यों में भी रुचि रखती हूं जैसे कहानियां, गज़ल, कविताएं तथा स्क्रिप्ट राइटिंग । मैं विशेष तौर पर नारीवाद तथा लैंगिक समानता जैसे विषय पर लिखना तथा इनसे जुड़े मुद्दों पर काम करना भी पसंद करती हूँ ।

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