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साल 2020 में एक चीज़ तो एक रंग से जमी रही वो था कोरोना वायरस और उसके पर प्रभाव से जगह जगह लगा लॉकडाउन और उसका असर। शुरू-शुरू में लोगों को उम्मीद थी कि सब ठीक होगा। लॉकडाउन के महीने जैसे जैसे बढ़ने लगे लोगों के बीच सुकून कमने लगा। ख़ासकर सामाजिक व्यवस्था में किसी भी मायने से निचले पायदान पर खड़े लोगों को सबसे ज़्यादा दिक्क़तें हुई हैं। वे परिवार जो आर्थिक रूप से भरे पूरे नहीं थे, बिना रोज़ काम पर गए उनका गुजरा सम्भव नहीं था। या जिन महिलाओं को अपने घरों में रहते हुए भी सुरक्षित महसूस नहीं होता था। या वे कई लोग जो हज़ारों किलोमीटर दूर से अपने राज्य-गांव को याद करते हुए वापस लौटने की सुविधा न होने पर पैदल निकल गए थे। 2020 के साल ने ऐसे कई कारणों से वैश्विक स्तर पर महिलाओं के जीवन को खासा प्रभावित किया।

1. पूर्णतः महिलाओं द्वारा चलाये जा रहे व्यवसाय प्रभावित हुए। यू एन के एक रिपोर्ट के मुताबिक दक्षिणी सूडान में अखरोट और बीन्स का व्यवसाय करने वाली मार्गरेट रमन की कमाई लॉकडाउन म दौरान आधी हो गयी। वे लोकल बाज़र में ये सामान बिक्री के लिए ले जाती थीं। महामारी के शुरू होने से अबतक यूरोप और एशिया के कई हिस्सों में 25 फ़ीसद आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर महिलाओं का व्यापार ठप्प पड़ गया। अंतराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार महिलाओं के रोज़गार पुरुषों के मुकाबले 19 फ़ीसद ज़्यादा ख़तरे में है।बिज़नस स्टेंडर्ड के रिपोर्ट के मुताबिक 2020 अंत तक ज्यादातर पुरुष काम पर लौट आये लेकिन महिलाओं द्वारा अपने व्यवसाय या कार्यस्थल पर वापसी आधी से भी कम रही।

2. लॉकडाउन के समय स्कूल, कॉलेज, कार्यालय बन्द होने के कारण लोग घर पर रहे। घरेलू काम और अवैतनिक देखभाल का भार बढ़ गया। कोविड के पहले भी अवैतनिक देखभाल में महिलाएं पुरुषों की तुलना में तीन गुना ज्यादा समय देतीं थीं। एमिटी एनजीओ की संस्थापक नाडा सिट्रिक कहती हैं, ‘घर पर बच्चों, बूढ़े-बुजुर्गों की देखभाल बिना बाहरी मदद के करते हुए महिलाओं के अक्सर खुद को खाना पकाने, घर संभालने के अतिरिक्त बोझ तले दबा पाया।’ बिज़नस स्टेंडर्ड के एक रिपोर्ट के अनुसार, महानगरीय भारत के बहुत छोटे हिस्से की महिलाओं को घर से ऑफिस का काम करना सुविधाजनक लगा। हालांकि ऐसे उदाहरण केवल शहरी अर्थव्यवस्था में देखने मिले और वो भी बहुत कम संख्या में। इन्ही शहरों में घरेलू सहायक का काम करने वाली हज़ारों महिलाओं का आर्थिक सहारा ख़त्म हो गया। 

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3. शिक्षा व्यवस्था महामारी के प्रभाव में आई। यूएन रिपोर्ट के आंकलन के अनुसार 11 मिलियन लड़कियां कोविड काल के अंत तक स्कूली पढ़ाई छोड़ चुकी होंगी। आर्थिक असुरक्षा में शिक्षा पूरी नहीं कर पाना जेंडर गैप को सामाजिक और आर्थिक स्तर पर विस्तृत करता है। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भारत के ज़्यादातर केंद्रीय विश्वविद्यालय ऑनलाइन पध्दति अपना चुके हैं। भारत सरकार के तरफ से इंटेरनेट, लैपटॉप, ई-स्त्रोत जैसी बुनियादी चीजें उपलब्ध करवाए बिना विद्यार्थियों का अकादमिक सत्र शुरू कर दिया गया। आर्थिक रूप से अशक्त, भौगोलिक-राजनीतिक कारणों की वजह से इंटरनेट विहीन इलाकों, राज्यों में रहने वाले विद्यार्थियों के लिए शिक्षा व्यवस्था ने कोई सहायता नीति नहीं जारी की। ऐसे में दुष्प्रभाव महिलाओं की शिक्षा दर पर सबसे अधिक पड़ेगा।

2020 के साल ने कोरोना और लॉकडाउन जैसे ऐसे कई कारणों से वैश्विक स्तर पर महिलाओं के जीवन को खासा प्रभावित किया।

4. 2011 से पहले तक ग्रामीण भारत से काम की तलाश में महानगर और शहरों में प्रवासी बनकर रहने में 80 फ़ीसद आंकड़ा पुरुषों के नाम था। 2011 के बाद रोजगार की तलाश करती महिला प्रवासियों की संख्या में दुगुने दर से वृद्धि हुई थी। ये महिलाएं अपार्टमेंट, सड़क इत्यादि के निर्माण स्थल पर मजदूरी करने से लेकर शहरी घरों में घरेलू सहायक का काम करती थीं। लॉकडाउन के बाद पैसे का स्त्रोत बन्द होने के साथ-साथ उनके घर वापसी के भी सारे रास्ते बंद थे। रेल की भीड़ में या हराज़ों मिल पैदल चलकर लौटते हुए महिला मजदूरों के मौत की कई दुर्घटनाएं घटित हुई। चूँकि संख्या के पैमाने पर मजदूरी के लिए महिलाओं की तुलना में पुरुषों की उपलब्धता अधिक है, बिना सरकारी मदद के महामारी के बाद भी श्रमिक महिलाओं की हालत लम्बे समय तक बेहतर होने की उम्मीद नहीं नज़र आएगी।

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5. भारत में मार्च 25 से मई 31 के बीच घरेलू हिंसा की कुल 1477 शिकायतें दर्ज की गई। राष्ट्रीय महिला आयोग, भारत, के अनुसार मार्च से अप्रैल तक में घरेलू हिंसा के उनके पास आये मालमे दुगुने से अधिक रहे। लॉकडाउन के दौरान महिलाओं पर की गई घरेलू हिंसा में भयानक वृद्धि आयी है। द हिन्दू के रिपोर्ट के मुताबिक घरेलू हिंसा की शिकार 86 फ़ीसद महिलाओं ने औपचाकारिक शिकायत दर्ज नहीं करवाया, कानूनी मदद नहीं लीं, 77 फ़ीसद ने घटना का ज़िक्र किसी दोस्त या मददगार के सामने करना नहीं चाहा। घरेलू हिंसा, भावनात्मक हिंसा, मौखिल हिंसा से पीड़ित घर पर रह रहीं महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य की बात करते हुए महामारी का एक सबसे भयावह प्रभाव समझ आता है।

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तस्वीर साभार : abcnews

मेरा नाम ऐश्वर्य अमृत विजय राज है, मिरांडा हाउस से 2021 में दर्शनशास्त्र से स्नातक है। जन्म और शुरुआती पढ़ाई लिखाई बिहार में हुई। इसलिए बिहार के कस्बों और गांव का अनुभव रहा है। दिल्ली आने के बाद समझ आया कि महानगर से मेरे लोग मीलों नहीं बल्कि सालों पीछे हैं। नारीवाद को ख़ासकर भारतीय संदर्भ में उसकी बारीकियों के साथ थ्योरी में और ज़मीनी स्तर पर समझना, जाति और वर्ग के दख़ल के साथ समझना व्यक्तिगत रुचि और संघर्ष दोनों ही है। मुझे आसपास की घटनाएं डॉक्यूमेंट करना पसंद है, कविताओं या विज़ुअल के माध्यम से। लेकिन कभी कभी/हमेशा लगता है "I am too tired to exist".

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