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लड़कियों का सुंदर होना पितृसत्तात्मक समाज और परिवार के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। साथ ही जो ज़रूरी है उनके शरीर के सभी अंगों का ठीक से काम करना। इसमें शामिल है आंखों का बिन चश्मे का होना, दोनों हाथों का बराबर होना, दोनों हाथों के प्रयोग से समस्त काम कर सकना, दोनों पैरों से बराबर चलना, दौड़ सकना, बराबर खड़े हो सकना,नाक का लंबा होना, आंखें बड़ी होना इत्यादि। लड़कियों के शरीर का प्रत्येक अंग ‘सामान्य / ठीक’  से काम करना और उन अंगों का समाज के अनुरूप सुंदर होना- ये परिवार और समाज द्वारा गढ़े गए पितृसत्तात्मक सांचे हैं।

जब कोई लड़की इस पितृसत्तात्मक सांचे में फिट नहीं बैठती तो समाज और लड़की का परिवार उसको कमतर देखता है। मतलब लड़की में अवगुण हैं या लड़की में कमी है। फिर इन कमियों को पूरा करने की भरपूर कोशिश की जाती है क्योंकि इन कमियों के साथ लड़की के लिए योग्य और उचित पति मिल सकना समाज के पितृसत्तात्मक सांचे के हिसाब से असंभव है। इस प्रकार समाज खुद के बनाए हुए पितृसत्तात्मक सांचे के तहत उन लड़कियों और उनके जीवन को हाशिये पर धकेल देता है जिनके अंग समाज और परिवार के अनुरूप ‘ सामान्य /ठीक’ नहीं हैं।  

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यह बहुत सामान्य बात है कि अचानक ही किसी का हाथ काम करना बंद कर दे,कोई दुर्घटना हो और लड़की अपना पैर खो बैठे, या किसी अन्य कारण से बचपन से लड़की देख नहीं सकती हो या फिर चलने में वो समाज की बनाई परिपाटी के हिसाब से ‘सामान्य/ठीक ‘ नहीं हो। ऐसी स्थिति में लड़की को हमेशा यह एहसास दिलाना और बताना कि तुम्हारी शादी होना मुश्किल है क्योंकि तुम ‘सामान्य/ठीक’ लड़कियों से अलग हो। पितृसत्तात्मक सांचे के तहत बचपन से लड़की को शादी के लिए तैयार किया जाता है और यह बताया जाता है कि कि शादी होना सभी लड़कियों के लिए ज़रूरी है। लड़कियों को बताया जाता है कि तुम्हारा ‘फलां’ अंग ठीक से काम न करने की वजह से तुम्हारे लिए अच्छा रिश्ता आना मुश्किल है, इसलिए तुमको अपने चेहरे की खूबसूरती और घर के काम में अव्वल रहना होगा। बार-बार लड़की को यह बताया जाता है कि उसको अपने चेहरे, कद, वजन, बाल, रंग और गुण इन पर ध्यान देने की अधिक ज़रूरत है क्योंकि जीवन का एक मात्र लक्ष्य शादी है और शादी के लिए ज़रूरी है अपने को सुंदर बनाए रखना, शरीर के सभी अंगों का ‘सामान्य/ठीक’ प्रकार काम करना। वास्तव में लड़की को कैसा साथी चाहिए या होने वाला साथी व्यवहार में कैसा है यह सब बातें पीछे ही छूट जाती हैं। परिवार को संतुष्टि होती है कि उन्होंने लड़की की शादी कर दी, उनकी एक बड़ी जिम्मेदारी ख़तम हो गई। शादी के बाद लड़की के जीवन और उसमें आने वाली परेशानियों के विषय में भी लड़कियों को ऐसे ट्रेनिंग दी जाती है कि शादी के बाद पति का घर ही उनका घर है और लड़कियां आराम से समझ लेती है कि अब सुख-दुख सब उनको पति के घर में अकेले ही काटना है। 

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लड़कियों को बताया जाता है कि तुम्हारा ‘फलां’ अंग ठीक से काम न करने की वजह से तुम्हारे लिए अच्छा रिश्ता आना मुश्किल है, इसलिए तुमको अपने चेहरे की खूबसूरती और घर के काम में अव्वल रहना होगा।

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शरीर के किसी भी अंग का ‘ सामान्य/ठीक ‘ से न काम करने के लिए भी अक्सर लड़कियों को ही ज़िम्मेदार मान लिया जाता है। समाज के अनुसार लड़की के किसी अंग के काम न करने का मतलब लड़की का अभागा होना है। साथ ही इस वजह से लड़की की शादी न होना किसी भी परिवार को नहीं भाता। जब परिवार या समाज को लड़की के साथ खड़े रहना चाहिए तब वे खुद ही मात्र शादी के चश्मे से लड़की और उसके शरीर को देखकर एक मानव जीवन, उसके अधिकारों और सम्मान का हनन करते हैं। पितृसत्तात्मक समाज के ढांचे में लड़कियों को सहजता से यह बता दिया जाता है कि उनके जीवन में शादी एक अहम् चरण है। शादी एक ऐसा चरण से जिससे सबको गुज़रना होता है और शादी के बिना जीवन और ख़ुशी की कल्पना को लड़कियों के जीवन से निकाल दिया जाता है। आखिरकर सुंदरता , शरीर , लंबे बाल, कद, ‘सामान्य/ ठीक’ अंगों की जीत होती है। समाज और परिवार ‘सामान्य /ठीक ‘ के अतिरिक्त सबको अस्वीकार कर देता है। साथ ही अस्वीकार कर देते हैं सामान्य लकड़ी और लड़की के जीवन को जो सामान्य है।  

अगर लड़कियों की शिक्षा के विषय में बात की जाए तो यह भी देखने को मिलता है कि शारीरिक अंगों के ‘ सामान्य/ ठीक ‘ न होने की वजह से अधिकतर परिवार लड़की के सामने केवल उसके पास जो नहीं है या कम है उसका ही एहसास दिलाते हैं। बहुत कम परिवार ऐसी स्थिति में लड़कियों की शिक्षा को लेकर गंभीर होते हैं। कुछ सालों में स्थिति कुछ ऐसी हो जाती है कि लड़कियों को हीन भावना से भर दिया जाता है और शिक्षा में सफलता न मिलने के लिए भी उन पर ही दोष लगाया जाता है। परिवार वाले ही लेबलिंग करते हैं और हमेशा लड़की की तुलना अन्य लड़कियों से करते हैं। आखिरकर लड़की को भी लगने लगता है शरीर, रंग, रूप, कद -समाज और परिवार को यही भाते हैं। वैसे भी अपने आस-पास के परिवेश से लड़कियों को यही अनुभव मिलते हैं कि शरीर, शिक्षा से सर्वोपरि है। सुंदर शरीर, रंग, रूप और कद इनसे ऊंचे और अमीर घरों में शादी होने की सम्भावना है। इस प्रकार शिक्षा के अवसर और बेहतर जीवन की परिभाषा जिसमें सोच, समझ और विकास है उसको पितृसत्तात्मक समाज शरीर तक सीमित कर देता है।

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तस्वीर : सुश्रीता भट्टाचार्जी फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए

Ritika Srivastava has completed her M.Phil. in Education from Tata Institute of Social Sciences, Hyderabad. Presently She is pursuing Ph.D. in Education from the same institute. After M.Phil., She worked in the Regional Institute of Education (NCERT) Bhopal as Assistant Professor in Education. She likes to work with children and teachers. She likes to read, write, and discuss contemporary equity and equality issues of education and society.

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