संस्कृतिसिनेमा मैरिटल रेप सर्वाइवर की ‘क्रिमिनल जस्टिस’| नारीवादी चश्मा

मैरिटल रेप सर्वाइवर की ‘क्रिमिनल जस्टिस’| नारीवादी चश्मा

मेरिटल रेप के संवेदनशील मुद्दे पर केंद्रित है वेब सीरीज़ ‘क्रिमिनल जस्टिस।‘ ये एक ज़रूरी वेब सीरीज़ है, जिसे देखा जाना चाहिए।

मालती (बदला हुआ नाम) की शादी काफ़ी अमीर घर में हुई थी। घर में किसी चीज़ की कोई कमी नहीं थी, पति भी मालती पर जान छिड़कता था, लेकिन इसके बावजूद मालती के चेहरे पर हमेशा उदासी और डर का भाव रहता था। मालती के इस स्वभाव को लेकर सभी उसकी बुराई करते नहीं थकते थे। धीरे-धीरे मालती डिप्रेशन का शिकार होती गयी, उसका इलाज शुरू हुआ और फिर एकदिन अचानक उसने सुसाइड कर लिया। बाद में पता चला कि मालती का पति उसके साथ बलात्कार करता था, जिसकी वजह से वो मानसिक और शारीरिक से टूट चुकी थी।

मालती अकेली नहीं है। हम अपने आसपास ऐसी कई महिलाओं को देख सकते हैं जो मेरिटल रेप का शिकार होती है। कई इसे ‘शादी’, ‘इज़्ज़त’ और ‘रिश्ते’ के नामपर झेलती है और कई अपने घुटने टेक देती है। यों तो हमारे भारतीय समाज में शादी को इंसान की मानसिक, शारीरिक और सामाजिक ज़रूरतों को पूरा करने में मदद करने वाली संस्था बताया गया है, लेकिन वास्तव में बदलते स्वरूप के साथ शादी का स्वरूप भी घरेलू और यौन हिंसा का वैध बनाने वाला होता जा रहा है। शादी के बाद एक तरफ़ हर लड़की को यही सीख दी जाती है कि ‘पति कुछ भी कहे या करे विरोध मत करना। सहना, तभी रिश्ते चलते है।‘ वहीं दूसरी तरफ़, हमारे समाज में शादी पुरुष को महिला पर अपना मालिकाना हक़ जताने और निभाने का अवसर देती है। इसीलिए पुरुष को शादी के बाद ‘पति’ कहा जाता है, पति यानी कि मालिक। ज़ाहिर है जब किसी रिश्ते में एक मालिक होगा तो दूसरे की भूमिका नौकर की होगी। इसी मालिक-नौकर के संबंध का वीभत्स और हिंसात्मक रूप है ‘मेरिटल रेप।‘

यों तो हमारे क़ानून में मेरिटल रेप को अपराध नहीं माना गया है और हमारी सामाजिक संरचना भी इसे स्वीकार करती है, इसलिए ‘मेरिटल रेप’ न तो लोगों को दिखाई देता है और न पल्ले पड़ता है। पर बदलते दौर में अब समाज को आईना दिखाने का काम कर रही है कुछ चुनिंदा फ़िल्में और वेब सीरीज़। ये फ़िल्में बंद दरवाज़ों के पीछे की कहानियाँ कहने लगी है। अब वे खुशहाल परिवार की सड़ी परतों को उजागर कर रही है और अपने पीछे सवाल छोड़ रही है – ‘आख़िर कब तक?’

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इन्हीं फ़िल्मों से प्रमुख है हाल ही में रिलीज़ हुई ‘क्रिमिनल जस्टिस : बिहाइंड द क्लोज़्ड डोर्स’। डिज़्नी प्लस हॉटस्टार में रिलीज़ हुई ‘क्रिमिनल जस्टिस’ एक वेब सीरीज़ है। हो सकता है वेब सीरीज़ के नाम ‘क्रिमिनल जस्टिस‘ से आपको लगे कि इसमें किसी अपराधी या उसके अपराध का महिमामंडन किया गया होगा, तो आपको बता दें ये वेबसीरीज़ किसी अपराध या अपराधी का महिमामंडन नहीं बल्कि बेहद ज़हीन सवाल उठाती है, वो सवाल जिसके मायने दहलीज़ बदलते ही बदल जाते है और ये किसी धर्म, जाति, वर्ग या उम्र से नहीं बल्कि हर इंसान के जीवन से जुड़े है।

मेरिटल रेप को अब तक भले ही भारतीय क़ानून में अपराध नहीं माना गया है, लेकिन वास्तव में ये हमारे तथाकथित अच्छे समाज के सुखी परिवार की कड़वी सच्चाई है।

बलात्कार की किसी भी घटना या इसके प्रयास पर अक्सर हम ये सलाह देते है कि ऐसा करने वालों सजा मिलनी चाहिए। ऐसे लोगों को मौक़े पर ही मौत के घाट उतार देना चाहिए। वग़ैरह-वग़ैरह। लेकिन जैसे ही ये बलात्कार घर की दहलीज़ के भीतर हो तो इसके मायने ही बदल जाते है। हम ये नहीं स्वीकारते कि शादी के बाद भी एक महिला को ‘ना’ कहने का उतना ही अधिकार है जितना घर की दहलीज़ के बाहर, राह चलते हुए है। उसे अपनी सुरक्षा और आत्मसम्मान के लिए आवाज़ उठाने का उतना ही अधिकार है जितना घर की दहलीज़ के बाहर है। इसलिए न केवल हमें ये अधिकार समझना चाहिए, बल्कि इसे स्वीकार भी करना चाहिए।

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मेरिटल रेप के संवेदनशील मुद्दे पर केंद्रित है वेब सीरीज़ ‘क्रिमिनल जस्टिस।‘ ये एक ज़रूरी वेब सीरीज़ है, जिसे देखा जाना चाहिए। आठ एपिसोड की इस वेबसीरीज़ का हर एपिसोड बहुत कुछ कहता है और कई बार कीर्ति कुल्हारी के रूप में मुख्य किरदार ‘अनु’ की चुप्पी में घर के बेडरूम और उसके बंद दरवाज़ों के पीछे दर्दनाक चीखें भी बयाँ करता है। बिना किसी मनोरंजन-मसाले के इस वेब सीरीज़ ने मेरिटल रेप जैसे ज़रूरी और संवेदनशील विषय को बेहद संजीदगी से उठाया है। इसकी कहानी न केवल मेरिटल रेप से पीड़ित एक महिला के दर्द को बयाँ करती है, बल्कि बाहर से अच्छे-भले तथाकथित सुखी परिवार की अंधेरी परतों को भी उजागर करती है। ये बतलाती है कि कितना मुश्किल होता है, ‘सब कुछ अच्छा समझे जाने वाले सुखी परिवार के ख़िलाफ़ जाकर ये बोलना कि कुछ ठीक नहीं है। ये बोलना कि इस सुखी परिवार में मेरा बलात्कार किया जाता है।‘ ‘कितना मुश्किल होता है बच्चों के सामने उनके पिता को बलात्कारी बताना।‘ ठीक उसी वक्त में ये वेब सीरीज़ महिला की मर्ज़ी के बनाए गये शारीरिक संबंध और उससे जन्में बच्चे को ‘नाजायज़’ कह देने वाली अपने समाज के दोहरेपन को भी बखूबी उठाती है।

‘जायज़’ और ‘नाजायज़’ के दो छोर के बीच महिला की धुरी की स्थिति को बतलाती क्रिमिनल जस्टिस मुद्दे के जस्टिस करती है। मेरिटल रेप को अब तक भले ही भारतीय क़ानून में अपराध नहीं माना गया है, लेकिन वास्तव में ये हमारे तथाकथित अच्छे समाज के सुखी परिवार की कड़वी सच्चाई है। ये उन बंद दरवाज़ों के पीछे की सच्चाई है जिसके अंदर होने वाली हर गतिविधि को तब तक सही माना जाता है जब तक कोई गंभीर घटना न हो जाए। इसलिए समय रहते हमें इस गंभीर समस्या की गंभीरता को समझना होगा और इसपर मुँह चुराने की बजाय सोचना-समझना होगा।    

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तस्वीर साभार : mashable

About the author(s)

Swati lives in Varanasi and has completed her B.A. in Sociology and M.A in Mass Communication and Journalism from Banaras Hindu University. She has completed her Post-Graduate Diploma course in Human Rights from the Indian Institute of Human Rights, New Delhi. She has also written her first Hindi book named 'Control Z'. She likes reading books, writing and blogging.

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