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बंगाल की चुनावी राजनीति में एक पारिवारिक घटनाचक्र तब सामने आया जब बीजेपी नेता सौमित्र खान ने अपनी पत्नी सुजाता मंडल खान को तृणमूल कांग्रेस में शामिल होने के एक दिन बाद तलाक का नोटिस भेज दिया। सुजाता बीते 21 दिसम्बर 2020 को तृणमूल कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गई थी। सौमित्र खान ने सुजाता मंडल को हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(बी) के तहत आपसी सहमति से तलाक लेने के लिए नोटिस भेजा है। सौमित्र खान ने यह तर्क दिया कि पिछले छह महीने से वह और उनकी पत्नी सौहार्द्रपूर्ण रूप से एक साथ नहीं रह रहे थे। इस घटनाचक्र को समझने के लिए देखते हैं कि हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(बी) तहत विवाहित दंपत्ति किस आधार पर विवाह विच्छेद की याचिका दे सकता है।

1. जब दोनों विवाहित दंपत्ति एक साल (365 दिनों) से या दूर रह रहे हैं।

2. जब वे एक दूसरे के साथ रहने में सक्षम ना हो।

3. जब दोनों विवाहित दंपति विवाह विच्छेद करने के लिए राजी हो जाएं।

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इन आधारों पर कोई भी विवाहित दंपति हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 की घारा 13(बी) के तहत विवाह विच्छेद की अर्जी दे सकता है; पर क्या कोई विवाहित दंपति राजनीतिक विचारधारा अलग होने की वजह से हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत विवाह विच्छेद यानि तलाक की याचिका दे सकता? बॉम्बे हाईकोर्ट ने प्रकाश अलुमल कलंदरी बनाम जाह्नवी प्रकाश कलंदरी मामले में फैसला सुनाया, और कहा था कि अगर विवाहित दंपति आपसी सहमति से तलाक करने के लिए हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 की घारा 13(बी) तहत याचिका दायर करेंगे तो अदालत को खुद को संतुष्ट करना पड़ता है कि विवाहित दंपति द्वारा दी गई तलाक की अर्ज़ी आपसी सहमति से है और वह डिक्री पारित होने तक रहेगी। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने सुरेशता देवी बनाम ओम प्रकाश मामले में यह स्पष्ट किया कि जरूरी नहीं है कि अलग-अलग रहने का मतलब अलग-अलग स्थानों पर रहना हो; दोनों पक्ष एक साथ रह तो सकते हैं लेकिन जीवनसाथी की तरह नहीं। फिर सुमन बनाम सुरेंद्र कुमार मामले में कोर्ट ने यह कहा कि, हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 की घारा 13(बी) दी गई 6 से 18 महीनों की अवधि एक अंतराल है जिसका अहम उद्देश्य दोंनो पक्षों को उनके लिए गए कदम पर विचार करने के लिए अवसर और समय देता है, इस समय में पार्टियां या उनमें से एक पक्ष के पास दूसरा विचार हो सकता है; और अपनी अर्ज़ी वापस ले सकती हैं।

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अनुच्छेद 21 भारत के संविधान का अहम हिस्सा है। यह सबको अपनी मर्ज़ी से जीने का अधिकार देता है और सबकी स्वतंत्रता का संरक्षण करता है। इसके अंतर्गत हमें कई अधिकार मिले हैं जैसे कि चिकित्सा, शिक्षा, पर्यावरण, निजता, आदि के अधिकार। अनुच्छेद 21 का एक पहलू यह भी है कि हैं कोई भी व्यक्ति किसी भी राजनीतिक विचारधारा को अपना सकता है।  हमारा संविधान हमें यह अधिकार देता है कि हम अपने फैसले खुद ले सकें, किसी भी राजनीतिक पार्टी में शामिल होना या ना होना‌ हमारा निजी फैसला होता है और किसी को यह करने से रोकना उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने खड़क सिंह बनाम यू.पी. मामले में यह कहा था कि भारतीय संविधान में दिया गया व्यक्तिगत स्वतंत्रता का‌ अधिकार सभी ‌व्यक्तियों के लिए है, वह सारे प्रतिबंध से मुक्त होता है, चाहे वह प्रतिबंध प्रत्यक्ष रूप से या अप्रत्यक्ष रूप से लगाएं गए हो। सी मसिलामणि मुदलियार बनाम आइडल आफ श्री स्वामी नाथस्वामी थ्रूकोल मामले में न्यायालय ने कहा कि भारतीय संविधान में अनुच्छेद २१ इस बात की पुष्टि करता है कि गरिमा, समानता, और विकास का अधिकार सभी ‌व्यक्तियों के लिए हैअनुच्छेद 21 अपने विस्तारित क्षितिज में जीवन में सबकुछ शामिल करता है, जो किसी मनुष्य के जीवन को अर्थ देता है जिसमें मनुष्य की गरिमा, संस्कृति, विरासत, विचारधारा और परंपरा भी शामिल है। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह पूरी तरह से एक व्यक्ति का अधिकार है कि वह किसी भी समूह या संगठन का सदस्य बने और यह उसके अपने मर्ज़ी पर छोड़ दिया जाता है। किसी के रादनीतिक विचारधारा के आधार पर अलग होना उसके मौलिक अधिकारों के उल्लंघन जैसा ही है।

हमारा समाज जो कि एक पुरुष प्रधान समाज रहा है और हमेशा से महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित करता रहा है। 

ऐसा बेहद कम देखा गया है कि अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं के नेता एक दूसरे से शादी करें। इसका एक उदाहरण हैं बीजेपी के शीर्ष नेताओं में शुमार रहीं पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज जिनके पति स्वराज कौशल समाजवादी विचारधारा के थे। ऐसा ही एक अमेरिका के पॉलिटिकल स्ट्रैटजीस्ट मैरी मैटलिन और जेम्स कारविल भी हैं; मैटलिन, एक रिपब्लिकन हैं, और कारविल, एक डेमोक्रेट। इससे यह स्थापित होता है कि राजनीतिक विचारधारा व्यक्तिगत इच्छा होती है, और इस पर किसी भी प्रकार का प्रतिबंध या अतिक्रमण नहीं होना चाहिए। महिलाओं को समाज में शामिल होने, चुनावों में मतदान करने, सरकारी कार्यालय में निर्वाचित होने, बोर्डों पर सेवा करने और किसी भी प्रक्रिया में सुनाई देने वाली अपनी आवाज़ बनने का अधिकार है।

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हमारा समाज जो कि एक पुरुष प्रधान समाज रहा है और हमेशा से महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित करता रहा है।  पुरुष हमेशा से महिलाओं के जीवन से जुड़े हर अहम फैसले जैसे कि क्या पढ़ना है, कहां शादी करनी है, कौन सी नौकरी करनी है, नौकरी करनी भी है या नहीं, राजनीति में जाना है कि नहीं; ऐसे अन्य कई फैसले खुद लेता है, या यूं कहें कि उनपर थोपता रहा है। पुरुष हमेशा से अपना वर्चस्व कायम रखना चाहता है उसे लगता है कि अगर महिलाएं अपने अधिकारों का इस्तेमाल करने लगेंगी तो उनका वर्चस्व खत्म हो जाएगा। इसीलिए उनको ऐसा करने से रोकता है। पुरुष हमेशा से यही चाहता आ रहा है कि महिलाएं उनके अनुसार काम करें औऱ जिस राजनीतिक विचारधारा का वे समर्थन करते हैं महिलाएं भी उसी को मानें और समर्थन करें। जो महिलाएं इसके इतर काम करती हैं या इसका विरोध करती हैं उन्हें अक्सर पारिवारिक और सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है।

पुरुष भूल गया है कि महिलाओं को भी उतना ही संवैधानिक अधिकार मिला है जितना कि उन्हें है। कोई भी फैसला लेने में महिलाएं खुद सक्षम है उन्हें किस राजनीतिक विचारधारा को अपना समर्थन देना है किसको नहीं, वे भली-भांति जानती हैं। पुरुषों को अपनी सोच बदलनी होगी, उनको महिलाओं द्वारा लिए गए फैसलों को महत्व देना चाहिए और उनका सम्मान करना चाहिए, वे फैसले चाहे उन्हें पसंद आए या नहीं। यह उनका मौलिक अधिकार है और उससे उनको वंचित रखना उनके साथ अन्याय करना होगा। कोई समाज तभी आगे बढ़ता है जब उस समाज कि महिलाएं भी उस समाज के निर्माण और विकास में शामिल हो और उन्हें उनका पूर्ण अधिकार मिले। कोई भी समाज बिना महिलाओं के सहयोग के प्रगति नहीं कर सकता। इस तरह का पारिवारिक दबाव उन्हें अपने फैसले स्वंतत्र रूप से लेने में रूकावट बन सकती है। महिलाओं के लिए राजनीतिक, व्यावसायिक क्षेत्र में भाग लेने का मार्ग प्रशस्त करना अधिक न्यायसंगत, और शांतिपूर्ण समाजों में निवेश है। महिलाओं की आवाज़ न केवल मौजूद होनी चाहिए – बल्कि उन्हें प्रभावित करने वाली राजनीतिक प्रक्रियाओं में भी सुनी जानी चाहिए।

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यह लेख मोहम्मद रमीज़ रज़ा और गौरव यादव ने लिखा है जो इंटीग्रल यूनिवर्सिटी में लॉ के छात्र हैंं

तस्वीर साभार: Bengal Daily

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