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पीरियड पोवर्टी यानी पीरियड के दौरान इस्तेमाल होने वाले प्रोडक्ट्स जैसे सैनिटरी पैड्स, टैंपोन आदि का पहुंच से दूर होना। लेकिन बहुत बार हम इस तरह के शब्दों का सही अर्थ समझने में असमर्थ रहते हैं। इस लेख में “पीरियड पोवर्टी” से संबंधित विभिन्न पहलुओं को छुआ गया है, जैसे आखिर ‘पीरियड पोवर्टी’ क्या है, यह कैसे उन लोगों को प्रभावित करती है जिन्हें पीरियड्स होते हैं। कोरोना के समय में तो इसके और भी गंभीर परिणाम सामने आए हैं। भारत में पीरियड पोवर्टी की स्थिति क्या है? आखिर में हम जानेंगे कि पीरियड पोवर्टी का कैसे एक राज्य या देश समाधान कर सकता है अगर उसकी राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो।

“पीरियड पोवर्टी” शब्द का प्रयोग तब किया जाता है जब किसी क्षेत्र में वित्तीय बाधाओं के कारण सेनेटरी उत्पादों जैसे साफ सूती कपड़ा, पैड, टेम्पून, मेंस्ट्रुअल कप आदि की कमी हो। पीरियड पोवर्टी का आसान शब्दों में मतलब है जब पीरियड्स प्रॉडक्ट्स खरीदना किसी के लिए महंगा सौदा बन जाए। साथ ही स्वच्छ पानी और शौचालय जैसी अन्य आवश्यक चीजों का भी अभाव हो। किसी भी महिला या लड़की का इन चीजों पर पहुंच न होने पर वह गंदे कपड़े, कागज, प्लास्टिक, रेत, घास, उपले, ईंट का  इस्तेमाल करने के लिए मजबूर हो जाती है। पीरियड पोवर्टी दुनिया भर की महिलाओं और लड़कियों को प्रभावित कर रहा है। सुरक्षित सेनेटरी उत्पादों और स्वच्छ पानी, किफायती कीमत, बिना शर्म, कलंक के महावारी के समय महिलाओं की एक ज़रूरत है। इसीलिए बड़ी संख्या में लड़कियां और महिलाएं पीरियड में बहुत सहमी सी, अकेले रहना, शर्म व दर्द में रहने के लिए मजबूर हैं।

कोरोना वायरस महामारी के दौरान पीरियड पोवर्टी से दुनिया के गरीब देश और विकासशील देश ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं जहां पहले से ही बुनियादी सुविधाओं जैसे रोटी कपड़ा, मकानका अभाव हो वहां पीरियड पोवर्टी को दूर करना और भी कठिन हो जाता है। कभी-कभी इसके बहुत गंभीर परिणाम भी सामने आते हैं जैसे भारत और दक्षिण एशियाई देशों में अधिकतर गरीब लड़कियां की पीरियड पोवर्टी से जूझती हैं या जूझ रही हैं जिसका सीधा प्रभाव लड़कियों और महिलाओं की शिक्षा पर और उनके विकास पर पड़ता है। कई बहुत बार तो उनकी पूरी जिंदगी भी प्रभावित हो जाती है।

पीरियड पोवर्टी यानी पीरियड के दौरान इस्तेमाल होने वाले प्रोडक्ट्स जैसे सैनिटरी पैड्स, टैंपन आदि का पहुंच से दूर होना।

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भारत में 60 फ़ीसद किशोरियों अपने पीरियड्स के दौरान स्कूल नहीं जा पाती हैं जिसका मुख्य कारण स्कूल में शौचालय और पैडस की कमी है। साथ ही पीरियड्स के बारे में सही शिक्षा का भी अभाव है। भारत में 71 फ़ीसद लड़कियों को अपना पहला पीरियड आने से पहले उसके बारे में कुछ पता ही नहीं होता है। हालांकि संयुक्त राष्ट्र ने पीरियड्स स्वच्छता को एक वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य और मानव अधिकार के मुद्दे के रूप में मान्यता दी है। फिर भी हम देखते हैं कि बहुत से देशों में खासकर भारत में अभी तक “पीरियड पोवर्टी” समस्या का हल दिखाई नहीं देता। हालांकि भारत में पैडमैन और यस आई ब्लीड अभियान जैसी फिल्मों ने देश में कुछ हलचल तो ज़रूर पैदा की है। फिर भी वास्तविक स्थिति बहुत खराब है 80 फ़ीसद किशोरियां अभी भी घर में बने पैड का प्रयोग करते हैं।

बहुत कम देश ऐसे हैं जो अपने स्वास्थ्य नीति और अपनी रणनीतियों में महावारी स्वच्छता प्रबंध को शामिल करते हैं जिससे पीरियड पोवर्टी समस्या का समाधान किया जा सके। स्कॉटलैंड दुनिया का ऐसा ही प्रथम देश है जहां सभी आयु वर्ग की महिलाओं के लिए सैनेटरी उत्पादों की मुफ्त और सार्वजनिक पहुंच प्रदान की गई है। वहां काफी लंबे समय से “पीरियड पोवर्टी” को समाप्त करने का अभियान चल रहा था जिसका लक्ष्य था कि सभी को बुनियादी सुविधाओं पर पहुंच प्राप्त हो सके। साथ ही न्यूजीलैंड ने भी अपनी नीतियों में लिंग सुधारवादी विचारों को स्थान दिया है वहां स्कूल जाने वाली लड़कियों के लिए नि:शुल्क पीरियड उत्पादों की आपूर्ति की है।

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तस्वीर साभार : youthkiawaaz

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