FII Hindi is now on Telegram

LGBTQIA+ समुदाय के अधिकारों और समावेशी समाज के लिए लड़ने वाली ट्रांस कार्यकर्ता समीरा एम जहांगीरदार ने चिकित्सा अध्ययन से जुड़े स्नातक पाठ्यक्रम में एक बड़ा बदलाव लाने की कोशिश में शामिल रही, जो अपने आप में ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए पहली ऐसी पहल थी। महात्मा गांधी मेडिकल कॉलेज एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट में क्रिटिकल केयर मेडीसिन विभाग में एक सहायक प्रोफेसर के तौर पर कार्यरत समीरा, चिकित्सा में फैलोशिप के लिए लंदन जा रही हैं। मीडिया से बात करते हुए, समीरा ने इस बात पर अफसोस जताया कि सेक्सुअलिटी से संबंधित किसी भी विषय को मेडिकल स्कूलों में नहीं पढ़ाया जाता है, इन विषयों को अलग छोड़ दिया जाता है।

समीरा एम जहांगीरदार का जन्म महाराष्ट्र के एक मुस्लिम मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ और वे पुणे में पली बढ़ी, उन्होंने अपनी स्कूली माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक शिक्षा पुणे से ग्रहण की। बचपन से ही उनकी रूचि जीव-विज्ञान विषय में रही है। उनके जीवन के बारे में बात करें तो समीरा ने अपने शरीर, मन, सेक्सुअलिटी और लिंग के बारे में काफी संघर्ष किया था इसलिए वह इसके बारे में जानने के लिए बहुत उत्सुक थी, यही कारण है कि उनकी जीव विज्ञान विषय में रूचि थी। समीरा करीब सात-आठ साल की थी जब उन्हें यह महसूस हुआ कि वह सबसे थोड़ी अलग हैं। यही वजह रही कि उनके अंदर एक गुस्सा रहा, बचपन से ही समीरा को लड़कियों के साथ रहने में ख़ुशी मिलती थी और बाहरी गतिविधियों से ज्यादा इनडोर गतिविधियों में ज्यादा मज़ा आता था।

स्कूली शिक्षा के दौरान उनका लड़कों के स्कूल में दाखिला कराया गया जहाँ क्लास के बच्चे उन्हें धमकाया करते थे, मज़ाक बनाते थे और चिड़िया कहकर एक लड़की जैसा होने के लिए चिढ़ाते थे। बचपन तो जैसे तैसे मानसिक तनाव के साथ गुज़र गया लेकिन उनके लिए किशोरावस्था वाला समय काफी परेशान करने वाला था क्योंकि इस उम्र में बाहरी और अंदरूनी कई सारे शारीरिक बदलाव होते है उस दौरान समीरा लड़कों के प्रति आकर्षित थी लेकिन वह इसकी वजह नहीं समझ पा रही थी। उनके माता पिता ने भी कभी समीरा की हर वक़्त परेशान रहने की वजह पर ध्यान नहीं दिया कि आखिर समीरा की शारीरिक बनावट और झुकाव किस ओर हैं, उन्हें हमेशा ऐसा लगता था कि वे परीक्षा को लेकर तनाव में रहा करती हैं। इसलिए समीरा ने खुद को समझाया और अपने आप को पूरी तरह से पढ़ाई के लिए झोंक दिया आखिरकार 2001 में उन्होंने एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी कर ली।

और पढ़ें : “लड़का हुआ या लड़की?” – इंटरसेक्स इंसान की आपबीती

Become an FII Member

समीरा एम जहांगीरदार का मानना है कि LGBTQI स्वास्थ्य में चिकित्सा से जुड़ा पेशा और इनसे जुड़ी सक्रियता उनके लिए एक संतुलन का कार्य है।

MBBS पाठ्यक्रम में LGBTQI समुदाय का प्रतिनिधित्व करने के तौर तरीकों में बदलाव लाने के लिए प्रयासरत समीरा ने इसमें मौजूद उन खामियों को उजागर किया है जिसकी वजह से LGBTQI समुदाय को कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। वह भारत में सॉलिडैरिटी एंड एक्शन अगेंस्ट HIV संक्रमण (SAATHII) द्वारा शुरू किए गए प्रोजेक्ट में शामिल है, जिसे VISTAARA कहा जाता है। यह तीन क्षेत्रों में काम करता है – शिक्षा, कानून और चिकित्सा। इन तीनों क्षेत्रों में से उन्होंने दवा क्षेत्र के लिए एक चिकित्सा विशेषज्ञ के रूप में काम करना शुरू कर दिया। इस प्रोजेक्ट के तहत, समीरा ने कुछ कदम उठाए – जैसे चिकित्सा पाठ्यपुस्तकों की समीक्षा करना जो एलजीबीटीक्यूआई समुदाय के बारे में गलत जानकारी को चित्रित करते हैं और ऐसी सभी पुस्तकों को उजागर करते हैं; उनपर सबूत-आधारित दवा के अनुसार सही या उचित जानकारी के बारे में सुझाव लिखना और LGBTQI- समावेशी पाठ्यक्रम विकसित करना। अभी फिलहाल इस प्रोजेक्ट का तीसरा चरण चल रहा है और इस तीसरे चरण में – चिकित्सा की विभिन्न धाराओं में LGBTQI पाठ्यक्रम का निर्माण और प्रसार शामिल है। पहली सफलता की कहानी उनकी अपनी होम यूनिवर्सिटी की है जहां वह काम करती हैं, इस यूनिवर्सिटी में नर्सिंग कॉलेज के साथ ट्रांसजेंडर स्वास्थ्य पर बीएससी और एमएससी नर्सिंग पाठ्यक्रम करने के लिए सहयोगात्मक कार्य किया गया था।

अपने पाठ्यक्रम में बदलाव लाने के भी उन्होंने भरसक प्रयास किये और इसके लिए सबसे पहले अपने विश्वविद्यालय स्तर पर पाठ्यक्रम में बदलाव लाने पर काम करना शुरू किया। समीरा पहली बार नर्सिंग कॉलेज के प्रिंसिपल से मिली और इस बारे में बात की कि विश्वविद्यालय में वर्तमान नर्सिंग पाठ्यक्रम को LGBTQI-समावेशी कैसे बनाया जा सकता है। सबसे पहले कदम के रूप में, उन्होंने अपने सहयोगियों के साथ जेंडर केयर कमेटी, संस्थान के डीन (संकाय और प्रशासन दोनों), सुप्रीम कोर्ट के दो वकीलों, SAATHII, डॉ. एल रामकृष्णन के एक सहयोगी सभी के साथ मिलकर एक पत्र का ड्राफ्ट तैयार किया, जिसे एमसीआई निदेशक मंडल को विचार के लिए पेश किया जाएगा।

और पढ़ें : तमिलनाडु के तूतुकुड़ी में ट्रांस महिलाओं द्वारा संचालित एक डेयरी फार्म

दरअसल इस मसौदे में चिकित्सा पाठ्यक्रम में LGBTQI समुदाय के बारे में गलत जानकारी का उल्लेख किया गया है, जिसमें LGBTQI समुदाय के पक्ष में परिवर्तित कानूनी परिदृश्य का विशेष उल्लेख और आवश्यक कार्रवाई करने का अनुरोध है। उदाहरण के लिए, फोरेंसिक चिकित्सा और मनोचिकित्सा के से जुड़े पाठ्यक्रमों में गंभीर गलतियां थीं जो एलजीबीटीक्यूआई समुदाय और भेदभाव को बढ़ावा देने के खिलाफ थीं। इनमें कुछ खंड ऐसे शामिल है जो एमसीआई को कानूनी रूप से मुसीबत में भी डाल सकते हैं। यौन अपराधों के एक अध्याय में सोडोमी, लेस्बियनवाद, ओरल सेक्स और ट्रांसस्टवाद का उल्लेख किया गया है। समीरा ने यूनिवर्सिटी में सहयोगी स्वास्थ्य विज्ञान टीम के साथ मिलकर 64-घंटे समर्पित LGBTQI समावेशी पाठ्यक्रम बनाने के लिए सहयोगात्मक कार्य भी शुरू किया है।

समीरा एम जहांगीरदार का मानना है कि LGBTQI स्वास्थ्य में चिकित्सा से जुड़ा पेशा और इनसे जुड़ी सक्रियता उनके लिए एक संतुलन का कार्य है। वह ऐसा सोचती हैं कि क्रिटिकल केयर मेडिसिन उनका जुनून है और ट्रांसजेंडर स्वास्थ्य उनके जीवन के बारे में है। अपने दस सालों में, उन्होंने अपना सारा समय और ऊर्जा अपने लिंग की पहचान के साथ अपने शरीर को संरेखित करने के लिए समर्पित कर दी। समीरा खुस को बहुत भाग्यशाली मानती है कि लंदन में उनका संभावित कार्यस्थल लक्ष्यों को पूरा करने के लिए साथ देने जा रहा है। उनका यह भी लक्ष्य है कि उन्होंने अब तक शिक्षण संस्थानों में बहु-विषयक स्वास्थ्य सेवा पेशेवरों की टीमों के निर्माण में जितनी भी कोशिशें की हैं, वे अन्य दक्षिण एशियाई देशों में उनके लिंग संबंधी प्रक्रियाओं में ट्रांसजेंडर लोगों की मदद करें। साथ ही उनका उद्देश्य शिक्षण संस्थानों में बहु-विषयक स्वास्थ्य सेवा पेशेवरों की एक टीम के निर्माण में की गई कोशिशों को लाना है, जो ट्रांसजेंडर लोगों को अन्य दक्षिण एशियाई देशों में उनके लिंग संबंधी प्रक्रियाओं में सहायता कर सकें और इसमें सबसे पहली सफलता की कहानी समीरा के गृह विश्वविद्यालय की है जहां वे काम करती हैं, यहाँ नर्सिंग कॉलेज के साथ ट्रांसजेंडर स्वास्थ्य पर बीएससी और एमएससी नर्सिंग पाठ्यक्रम उपलब्ध है।

और पढ़ें : मोना अहमद : भारत की एक मशहूर ट्रान्स शख़्सियत


तस्वीर साभार : careers360

पंजाब केसरी दिल्ली समूह के साथ कार्यरत श्वेता गार्गी कॉलेज से पॉलिटिकल साइंस ऑनर्स में ग्रेजुएट है तथा जर्नलिज्म में पोस्ट ग्रेजुएशन कर चुकी हैं। घर और समाज में मौजूद विभेद के चलते उनका समावेशी नारीवाद की ओर झुकाव अधिक है। साथ ही उन्हें सामाजिक - आर्थिक - राजनैतिक और लैंगिक समानता से जुड़े विषयों पर लिखना बेहद पसंद है।

Follow FII channels on Youtube and Telegram for latest updates.

नारीवादी मीडिया को ज़रूरत है नारीवादी साथियों की

हमारा प्रीमियम कॉन्टेंट और ख़ास ऑफर्स पाएं और हमारा साथ दें ताकि हम एक स्वतंत्र संस्थान के तौर पर अपना काम जारी रख सकें।

फेमिनिज़म इन इंडिया के सदस्य बनें

अपना प्लान चुनें

Leave a Reply