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केंद्र सरकार द्वारा पारित किए गए तीन कषि क़ानूनों के विरोध में बीते नवंबर से अभी तक किसान पहले पंजाब अब दिल्ली के अलग-अलग बॉर्डर पर धरना दिए बैठे हैं। केंद्र सरकार और किसान संगठनों के बीच लगभग 10 से भी ज़्यादा बैठकें हो गई हैं लेक़िन अभी तक किसानों की मांग पर केंद्र सरकार राज़ी नही हुई है। सरकार के इसी रवैये से नाराज़ होकर किसानों ने गणतंत्र दिवस के मौके पर राजधानी दिल्ली में ट्रैक्टर मार्च भी निकाला। अभी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इन कानूनों के लागू होने पर स्टे आर्डर लगाया है। हालांकि किसान न्यायपालिका की दख़ल से संतुष्ट नहीं हैं। उनकी एकमात्र मांग है कि केंद्र सरकार इस क़ानून को वापस ले। किसान सरकार के बहकावे में नहीं आना चाहते, वे अपनी मांगों को लेकर स्प्ष्ट हैं। जनवरी के पहले हफ़्ते जब हमने सिंघु बॉर्डर पर दिल्ली में ठंड और बारिश का सामना कर रहे किसानों से बात की थी उनकी चिंताएं साफ़ दिखीं।

हमारी पिछली ग्राउंड रिपोर्ट में हरियाणा सरकार के स्वास्थ्य विभाग से सिंघु बॉर्डर प्रदर्शन स्थल पर रह रहे अनील कुमार ने भी अपने अनुभव से इन मौतों का कारण अटैक बताया था। बॉर्डर पर मिले हरियाणा से आये बलकार सिंह ने विनती के स्वर में प्रधानमंत्री से किसानों की मांग सुनने की अपील की थी। बॉर्डर पर प्रदर्शनकारी किसान इन क़ानून के रद्द होते ही अपने अपने घरों को लौटने के लिए तैयार थे। लेकिन उस ग्राउंड रिपोर्ट में हमारी किसानों से हुई बातचीत के 20 दिन पूरे हो चुके हैं। इसी बीच इस कृषि क़ानून पर सुनवाई के दौरान जस्टिस बोबड़े ने प्रदर्शन में महिलाओं और बुजुर्गों के शामिल होने पर प्रश्न किया था। सिंघु बॉर्डर प्रदर्शन में शामिल 78 वर्षीय बलकार सिंह के शब्दों में इसका जवाब था। “ऐसे भी हमारी जमीनें जब हमारी नहीं रहेंगी तो यहां ठंड में बैठे रहने के अलावा क्या रास्ता है। मोदीजी राजा हैं, अपनी प्रजा की बात सुने।” एक लोकतांत्रिक देश का निर्वाचित प्रधानमंत्री देश का राजा नहीं होता लेकिन इस कानून के बनने की प्रक्रिया से लेकर प्रदर्शन को संबोधित करने को लेकर किसानों के प्रति सरकार जो रवैया अपना रही वह एक लोकतंत्र की व्यवस्था में फिट नहीं बैठता। ऐसे में किसानों के पास 26 जनवरी को ट्रक्टर मार्च निकालने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।

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ट्रैक्टर रैली को लेकर जनवरी के पहले हफ़्ते में हमसे हुई बातचीत में एक महिला कृषक ने कहा था, “हमारा भी देश है। अपने देश में परेड करना ग़लत है क्या।” गौर करने वाली बात है कि देश की राजधानी दिल्ली ने आंदोलन के शुरुआती समय में किसानों के लिए अपनी सीमाएं बंद कर दी थी। नवंबर के महीने में दिल्ली पुलिस ने दिल्ली सरकार से नौ स्टेडियम को अस्थायी हिरासत केंद्र में परिवर्तित करने की अनुमति मांगी थी। यह सब इसलिए था ताकि हरियाणा से दिल्ली आ रहे किसानों को दिल्ली के अंदर अपनी आवाज़ बुलंद करने से रोका जा सके। सिंघु बॉर्डर पर दिल्ली पुलिस द्वारा आंसू गैस छोड़े गए थे, वाटर कैनन चलाया गया था।

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प्रदर्शनकारी किसान

आज इतने महीनों बाद जानना ज़रूरी है कि दिल्ली के सीमाओं के अंदर रह रही जनता दिल्ली बॉर्डर पर हो रहे किसान आंदोलन के बारे में क्या राय रखती है। दिल्ली विश्वविद्यालय के हडसन लेन की लाल बत्ती पर कुछ दिनों से युवाओं का एक समूह किसानों क़ानून और किसानों से जुड़े कुछ वाक्य लिखी तख्तियां लेकर खड़ा दिखता है। इस समूह में से कोई एक व्यक्ति सड़क पर बने डिवाइडर और लाल बत्ती के खम्भे के साथ बची जगह पर हमेशा मौजूद होता है। हडसन लेन विश्वविद्यालय इलाक़े में होने के कारण और जीटीबी नगर मेट्रो जाने के रास्ते में पड़ने की वजह से पार्टी ज़ोन जैसा इलाका है। अलग-अलग तरह के बनावट वाले लुभावने कैफ़े, बार, रेस्तरां इस लेन के दोनों तरफ देखें जा सकते हैं। फिलहाल कॉलेजों की क्लास ऑनलाइन चला रही है, हॉस्टल्स बन्द हैं, इसलिए विश्वविद्यालय का इलाका विद्यार्थियों के न होने से सुनसान पड़ा है। हालांकि हडसन लेन में पहले की तुलना में कम लेकिन ठीकठाक संख्या में ग्राहक इन कैफ़े, रेस्तरां इत्यादि में जाते हुए देखे जा सकते हैं। यहां देखे जा रहे ज्यादातर लोग उच्च-मध्यवर्गीय परिवारों से सम्बंध रखते हैं।

जतिंदर सिंह नाम के एक युवा जिनका परिवार दिल्ली में गाड़ियों को ठीक करने के व्यवसाय से संबंध रखता है, कहते हैं, “सैटरडे नाइट पार्टी करने वाले यूथ जो अपनी गाड़ियों से नीचे नहीं उतरते उनतक खबर जाएगी न कि और क्या हो रहा है उनके आसपास।”

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दिल्ली विश्वविद्यालय बीते साल इन दिनों नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध में होने वाले महाविद्यालय और विश्विद्यालय स्तर के प्रदर्शन नारों से गूंजा करता था। आजकल असली क्लासरूम में विद्यार्थियों के ना होने कारण विश्विद्यालय में ऐसी कोई गतिविधि नहीं देखने को मिलती है। ऐसे में हडसन लेन के बीचो-बीच “काले क़ानून वापस लो” ,“शेम ऑन नेशनल मीडिया” जैसे नारे लिखी तख्तियां पढ़ने मिले तो उत्सुकता जाहिर है। इस समूह से बातचीत करने पर पता चलता है कि वे किसी विद्यार्थी संगठन या राजनीतिक संगठन या फिर किसी एनजीओ का हिस्सा नहीं हैं। बीती 22 जनवरी की शाम वहां आठ लोग मौजूद थे।

किसान आंदोलन के प्रति समर्थन जताते दिल्ली के स्थानीय निवासी, हडसन लेन उत्तरी दिल्ली.

वहां मौजूद हरनुर सिंह ने बताया कि कुछ दिन पहले से लेन में एक जगह प्लाकार्ड लेकर खड़े होने की उन्होंने शुरुआत की। इसके बाद उनके कुछ दोस्त उनके साथ आने लगे। इस बातचीत के दौरान वहां मौजूद रविंद्र पाल बताते हैं, “मैं अभी तुरंत आया। मेरे बेटे से मुझे यहां के बारे में बात पता लगी। आज वह नहीं आया उसकी तबियत ख़राब है। मैं चला आया देखने कि उसके दोस्त यहां क्या कर रहे हैं।” इस जगह पर रोज़ कोई न कोई ऐसा व्यक्ति आकर रुकता है जो तख्तियों पर लिखी हुई बातों से सहमति रखता है। इसे शुरू करने वाले हरनुर सिंह कहते हैं, “इस जगह को चुनने का फैसला अचानक लिया था। हर बन्दा यहां से गुज़रता है। इस इलाके का ये मेन लोकेशन है।” जतिंदर सिंह नाम के एक युवा जिनका परिवार दिल्ली में गाड़ियों को ठीक करने के व्यवसाय से संबंध रखता है, कहते हैं, “सैटरडे नाइट पार्टी करने वाले यूथ जो अपनी गाड़ियों से नीचे नहीं उतरते उनतक खबर जाएगी न कि और क्या हो रहा है उनके आसपास।”

इन लोगों के मुताबिक जिन लोगों का इस आंदोलन से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं रखते वे टीवी देखकर अपने दिमाग़ में किसी की एक इमेज़ बनाते हैं। मुख्यधारा मीडिया द्वारा किसान आंदोलन को खालिस्तानियों के साथ जोड़े जाने से लोगों के मन में किसान आंदोलन को लेकर गलत सूचनाओं के आधार पर ग़लत तस्वीर बनती है। हरनुर सिंह बताते हैं कि उनका परिवार अपनी कमाई का दसवां हिस्सा गुरुद्वारे में देता है। दिल्ली के कई गुरुद्वारे, खालसा दल प्रदर्शन स्थल पर लंगर के जरिए भोजन व्यवस्था कर रहे हैं। वे कहते हैं, “जब खालसा दल देश के अन्य राज्यों को आपदा के समय मदद देता है तब कोई उन्हें खालिस्तानी नहीं कहता”। किसी भी व्यक्ति या समूह को लेकर आम जनता के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक नैरेटिव गढ़ने में टीवी चैनल्स का बड़ा योगदान होता है। ये चैनल्स पत्रकारिता के नैतिक मूल्य त्यागकर, ग्राउंड रिपोर्टिंग न करके स्टूडियो से नए-नए भ्रामक शब्द गढ़कर इस आंदोलन की नकारात्मक छवि पेश करने में लगे हैं। इस समूह में से एक व्यक्ति का कहना था कि छोटे स्तर के पंजाबी न्यूज़ चैनल्स इन बड़े मीडिया घरानों से सच्ची और ईमानदार पत्रकारिता कर रहे हैं। वे बिना अपने शब्द जोड़े ज़मीनी हक़ीक़त लोगों तक पहुंचा रहे हैं। लेकिन इन क्षेत्रीय चैनलों की पहुंच उतनी नहीं है और मुख्यधारा मीडिया इसका फ़ायदा उठाता है।

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ये लोग पास के मोहल्ले, विजयनगर, गुप्ता कॉलोनी के स्थानीय निवासी थे। इनमें से ज्यादातर लोगों के घरों की आमदनी का स्त्रोत मध्यस्तरीय व्यवसाय है। वहां मौजूद समरजीत सिंह बताते हैं, “हमारे दादा-परदादा खेती करते थे फिर सभी यहां आ गए। अब हम खेती नहीं करते। हमारा बिज़नस है।” ये पूछे जाने पर कि वे किसानों के लिए समर्थन इकट्ठा क्यों करना चाहते हैं वे कहते हैं, “रोटी तो सभी खाते हैं। ये सिर्फ किसानों का मामला नहीं है हम यहां किसी दिल्ली विश्वविद्यालय के विद्यार्थी की हैसियत से नहीं बल्कि नागरिक की हैसियत से खड़े हैं। हमें किसी राजनीतिक संगठन से मतलब नहीं है। हमें किसानों की मांगों से मतलब है।” वहां मौजूद लोगों के किसान आंदोलन से जुड़ी जानकारियों का स्त्रोत कोई टीवी चैनल नहीं है। वे खुद बॉर्डर जा चुके हैं। ये लोग उसी दिल्ली के निवासी हैं जो किसानों के लिए अपने दरवाजे बंद करने पर तुली थी।इस बात पर सिंघु बॉर्डर पर दिखे वे लोग याद आते हैं जिनके रोज़मर्रा का जीवन किसानों के वहां होने से आसान हो गया है। कुछ लोग जो रोज़ बॉर्डर पार कर छोटी-मोटी नौकरी या मजदूरी करने जाते हैं उनके लिए आंदोलन स्थल पर हो रहे लंगर भोजन की समस्या का हल बनकर उभरी है। ऐसे ही एक व्यक्ति पवन सिंह ने बताया था, “हमारे चाय-नास्ते का पैसा बचता है। कई लोग रोज़ यहां खाते हैं। मेरे हिसाब से सरकार को किसानों की बात सुन लेनी चाहिए। ये कब से ठंड में ट्रकों पर, तंबुओं में गुजारा कर रहे हैं।”

समरजीत सिंह कहते हैं, “हम शांतिपूर्वक तौर से यहां तख्तियां लेकर खड़े होते हैं। किसी से कुछ कहते नहीं। कई लोग हमें देखते हैं। कुछ मुस्कुराते हैं। हम बस कम्युनिटी स्तर पर इस संवाद को घर-घर तक पहुंचाना चाहते हैं। जागरूकता फैलाना चाहते हैं।” वह एक व्यक्ति के बारे में बताते हैं जो उनसे बहस करने की मंशा से उनके पास आया था। उनके मुताबिक उन्होंने बहस करने की जगह उससे काफ़ी देर तक बातचीत की। वह कहते हैं, “वह बन्दा हमसे कहना चाहता था कि हम तख्तियां लेकर यहां खड़े न रहें।” उसी शाम दिल्ली पुलिस की एक वैन ने इन्हें डिस्ट्रिक कमिश्नर से इजाजत लेकर वहां खड़े होने की बात कही। “उन्होंने कहा परमिशन ले लो फिर खड़े हो। वैसे यहां एक बन्दा खड़ा होता है एक कागज़ के साथ। इसमें परमिशन जैसा तो कुछ नहीं है।” देखने वाली बात है कि कैफ़े, बार वाली पार्क की कारों वाली मुख्य सड़क की एक लेन पर शांतिपूर्ण तरीके से किसानों के समर्थन में खड़े किसी दिल्ली वासी से दिल्ली पुलिस को किस शांति भंग का भय हो सकता है। इसे भीड़भाड़ वाले ‘प्रोटेस्ट’ की श्रेणी में भी नहीं रखा जा सकता। पहले दिन से खड़े एक लड़के के अलावा अन्य लोग, उसके दोस्त, उनके अभिभावक, आने जाने वाले स्थानीय लोग रोज़ अलग-अलग होते हैं। यह किसी योजनाबद्ध तरीक़े से आयोजित कोई प्रदर्शन नहीं है। पुनीत किसान आंदोलन पर कहते हैं, “ये किसी धर्म से जुड़ा आंदोलन नहीं है। सिंघु, टिकरी बॉर्डर पर हरियाणा के किसान हैं। यूपी-दिल्ली बॉर्डर पर यूपी से किसान आए हैं। ये किसानों का आंदोलन है।”

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तस्वीर साभार : सारी तस्वीरें ऐश्वर्या राज द्वारा उपलब्ध करवाई गई हैं

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