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हम आए दिन अखबारों में, न्यूज़ में बालिग युवकों या पुरुषों द्वारा की जाने वाली यौन हिंसा की खबरें पढ़ते रहते हैं। हमने कई ऐसी खबरें पढ़ी हैं, जहां आरोपी रेप करने की अलग-अलग वजहें गिनाते हैं। अक्सर लड़की का ‘ना’ कहना या फिर आरोपी की कही बात न मानना भी रेप का कारण बनता है। जब आरोपी सर्वाइवर का नज़दीकी या जान-पहचान वाला होता है, तब रेप का कारण, अक्सर उसका लड़की होना मात्र ही होता है। कुल मिलाकर हम यह कह सकते हैं कि इस पितृसत्तात्मक समाज में पुरुषों द्वारा महिलाओं के साथ की गई हिंसा के पीछे कोई न कोई ‘कारण’ होता है, फिर वह कारण चाहे जितना आधारहीन हो। मगर आपने अक्सर नाबालिग लड़कों द्वारा महज़ 1 साल या 2 साल की बच्चियों का रेप या यौन उत्पीड़न करने की खबरें भी ज़रूर पढ़ी या सुनी होंगी। क्या उसके पीछे भी सर्वाइवर का ‘ना’ कहना या फिर उसका लड़की मात्र होना वजह होती होगी? बिलकुल नहीं। मैं यहां पर अपनी निजी ज़िंदगी से एक उदाहरण देकर अपना मुद्दा समझाने की कोशिश करूंगी।

मैं तब बहुत छोटी थी, शायद दूसरी या तीसरी क्लास में। तब चूंकि हम बच्चे हुआ करते थे, स्कूल में हमें हमारे टीचर्स लड़कों के साथ बैठाते थे। उस रोज़ भी मैं एक लड़के के साथ ही बैठी थी। हमारी टीचर ने उस दिन पढ़ाने से मना कर दिया था और हमें सिर नीचे करने की हिदायत मिली हुई थी। मैंने और उस लड़के ने अपना सिर नीचे करके टेबल पर रखा ही हुआ था कि तभी अचानक उसने अपनी शर्ट की बटनें खोलनी शुरू कर दी। मुझे पहले तो कुछ समझ नहीं आया कि वह क्या कर रहा है मगर फिर अपनी पूरी शर्ट खोलने के बाद उसने जब अपनी पैंट भी धीरे-धीरे खोलनी शुरू करी तब मुझे कुछ अजीब लगा और मैंने तुरंत उठकर टीचर से उसकी शिकायत की। मैडम ने उसे डांट-डपटकर पूरा समय खड़ा रखा। बस, बात वहीं पर ख़त्म हो गई।

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यह वाकया मेरे ज़ेहन से आज तक नहीं निकला है और न ही शायद कभी निकलेगा। आज जब उस वाकये को याद करती हूं तो कभी-कभी लगता है कि एक दर्दनाक अनुभव के बेहद करीब से होकर निकल आई हूं। लेकिन कभी-कभी मन उसके पीछे की वजह भी ढूंढने की कोशिश करता है। उस लड़के को मुझसे कोई दिक्कत नहीं थी। ना तो वह मुझे पसंद करता था। ना ही उसने मुझसे कभी कुछ ऐसा करने को कहा था जिसे करने से मैंने इनकार कर दिया हो, जिस कारण हम यह मान सकें कि उस लड़के के अंदर मेरे लिए जो द्वेष था उस वजह से उसने मुझे नुकसान पहुंचाने के इरादे से वैसा किया था। मैं जब नाबालिग लड़कों द्वारा बच्चियों के साथ दुष्कर्म की ख़बरों को सुनती हूं, तो मेरे दिमाग में जो सबसे पहली वजह आती है वह है बच्चों में मौजूद एक दूसरे के शरीर को जानने का कौतूहल। इस कौतूहल के बारे में बात करते हुए, बाल विकास के सिद्धांतों पर केन्द्रित तमाम मनोवैज्ञानिकों की कही बातें दिमाग में आती हैं।

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बाल विकास को चार अवस्थाओं में बांटा गया है; शैशवावस्था (जन्म से 5 साल), बाल्यावस्था (6-12 साल), किशोरावस्था (13-18 साल) और युवावस्था (19-25 साल)। बालक- बालिकाओं में इन सभी चरणों में बहुत तरीके के बदलाव होते हैं। शैशवावस्था में जहां उनमें चीज़ों को जानने की जिज्ञासा का विकास होता है, किशोरावस्था में उनमें आन्तरिक और बाहरी शारीरिक परिवर्तन होता है। उनके प्रजनन अंग विकसित होने लगते हैं जो उनकी शारीरिक और मानसिक क्रियाओं में हलचल मचा देते हैं। 13-18 साल की किशोरावस्था वह चरण है जिसमें बच्चे दूसरे जेंडर की तरफ आकर्षण महसूस करते हैं। ऐसे में उन्हें इस अवस्था से जुड़ी सही जानकारी और शिक्षा मिलनी चाहिए ताकि कुछ भी गलत करने से उन्हें न सिर्फ रोका जा सके बल्कि उन्हें इन मुद्दों पर जागरूक भी किया जा सके। अलग-अलग रिसर्च के अनुसार किशोरावस्था बनने-बिगड़ने का समय होता है। इस अवस्था में कुछ शारीरिक और मानसिक परिवर्तन ऐसे होते हैं जिनकी मांगें पूरी न होने पर बच्चों में बुरी आदतें पड़ने लगती हैं। अक्सर जानकारी न होने के कारण किशोर-किशोरियों यौन संबंधी गलत जानकारियों को सही मानने लगते हैं, जो उनके शारीरिक और मानसिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं। यह सभी अवस्थाएं यकीनन बेहद संवेदनशील होती हैं जिनमें सही मार्गदर्शन के लिए सबसे पहली आवश्यकता होती है कि बच्चों को सही शिक्षा दी जाए।

सेक्स एजुकेशन सिर्फ यौन संबंध के बारे में नहीं है बल्कि इसमें सेक्सुअलिटी से जुड़े तमाम मुद्दों जैसे भावनात्मक रिश्ते और जिम्मेदारियां, मनुष्य की सेक्सुअल एनाटोमी, सेक्सुअल एक्ट्स, एज ऑफ़ कंसेंट, गर्भनिरोध, सेक्स करने के सुरक्षित तरीकों आदि के बारे में विस्तार से पढ़ाया जाता है।

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स्कूलों में सेक्स एजुकेशन को अनिवार्य करना सही होगा। महिलाओं और बच्चियों के साथ बढ़ती यौन हिंसा के मामलों को देखते हुए, सेक्स एजुकेशन आज के वक़्त की बेहद बुनियादी मांगों में से एक जान पड़ती है। सेक्स एजुकेशन सिर्फ यौन संबंध के बारे में नहीं है बल्कि इसमें सेक्सुअलिटी से जुड़े तमाम मुद्दों जैसे भावनात्मक रिश्ते और जिम्मेदारियां, मनुष्य की सेक्सुअल एनाटोमी, सेक्सुअल एक्ट्स, एज ऑफ़ कंसेंट, गर्भनिरोध, सेक्स करने के सुरक्षित तरीकों आदि के बारे में विस्तार से पढ़ाया जाता है। सेक्स एजुकेशन में किशोरावस्था के दौरान होने वाले शारीरिक बदलावों के बारे में जानते हुए बच्चों को सही शिक्षा मिल सकेगी और वे सही गलत की पहचान और अच्छे से कर सकने में प्रबल होंगे। न सिर्फ यही, बल्कि बच्चों के सही उम्र के होने पर इन सभी चीज़ों के बारे में पढ़ाने से उनके अंदर मौजूद कौतूहल शांत होगा और हम एक बेहतर समाज की अपेक्षा कर सकेंगे।

मैं सेक्स एजुकेशन की कवायद इसलिए भी कर रही हूं क्योंकि भारतीय समाज सेक्स और जेंडर पर बात करने से हिचकिचाने वाला देश है। यही कारण है जो मैंने आजतक खुद के साथ बचपन में हुए उस वाकये को अपने घर में किसी भी बड़े को नहीं बताया। इसी तरह बाकी बच्चे भी अक्सर खुद के शरीर में होते बदलावों या फिर खुद के साथ कहीं पर भी हुए अच्छे-बुरे अनुभवों के बारे में घर पर खुलकर बात नहीं कर पाते हैं। हमारा समाज ऐसे बुनियादी और संवेदनशील मामलों पर चुप्पी साधना ज्यादा ठीक समझता है। हम आज अपने समाज में जेंडर और सेक्स से जुड़े किसी भी मुद्दे पर बात करना उचित नहीं समझते। योनि और लिंग पर खुलकर बात नहीं कर सकते। यह इस चुप्पी का असर ही है जो बच्चों को अपने अंदर हो रहे बदलावों के बारे में समझ नहीं आता और वे खुद ही उसका जवाब ढूंढने लगते हैं और यह खोज लगभग हिंसा का रूप ही लेती है। इसीलिए मेरा मानना है कि अगर स्कूलों में सेक्स एजुकेशन दी जाएगी तो हम उनकी जिज्ञासा को शांत कर सकेंगे। उनको उनके शारीरिक परिवर्तनों के बारे में जागरूक कर सकेंगे और यह सिखा सकेंगे कि यौन हिंसा गलत है, एक अपराध है। उन्हें हम सिखा सकेंगे कि एक उम्र के पहले बिना सही जानकारी के सेक्स करना दोनों व्यक्तियों के लिए कितना घातक हो सकता है। साथ ही कंसेंट जैसी बेहद बुनियादी बातें उनके ज़हन में डाल सकने में समर्थ हो सकेंगे।

एक आखिरी वजह जो किशोरों को यौन हिंसा करने के लिए प्रोत्साहित करती है, वह है घरों में महिलाओं के प्रति होने वाला असंवेदनशील व्यवहार। कहते हैं कि एक बच्चे का दिमाग बिलकुल गीली मिट्टी की तरह होता है। उसे हम जिस रूप में ढालेंगे वह बिलकुल उसी तरह हो जाएगा। इसी कारण हम बच्चे और उसके आस-पास के परिवेश को मिट्टी और कुम्हार की तरह देख सकते हैं। ऐसे में महिलाओं के प्रति हर घर में होने वाले रोज़ के दुर्व्यवहार को जब एक बच्चा देखता है तो उसके मन में भी महिलाओं के प्रति वैसी ही भावनाएं विकसित होती हैं। अगर बच्चा अपने घर में हर रोज़ अपनी मां या बहन के साथ हिंसक व्यवहार होते हुए देखेगा तो उसके अंदर भी वही प्रवृत्ति विकसित होगी। जब वह उन्हें एक बेजान चीज़ की तरह प्रयोग होते देखता है, तो उसे भी हर महिला या हर लड़की उसकी सेवा में हर वक़्त मौजूद रहने वाली एक बेजान वस्तु ही लगती है। यही प्रवृत्ति है जिसमें बदलाव न होने पर पितृसत्ता कायम रहती है। कुल मिलाकर हमारे लिए यह ज़रूरी है कि हम बच्चों के आदर्श विकास के लिए एक आदर्श परिवेश की स्थापना करें जिसमें महिला-विरोधी किसी भी चीज़ के लिए कोई जगह न हो। मौजूदा समय में बढ़ते अपराध और न्यायिक व्यवस्था को देखते हुए हमें सेक्स एजुकेशन की भी भरपूर कवायद करनी चाहिए।

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तस्वीर साभार : Change.org

My name is Shreya. I am currently studying at JNU and am pursuing Bachelor's in the Korean language. Gender sensitive issues appeal to me and I love to convey the same through my writings.

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