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एडिटर्स नोट : यह लेख फेमिनिस्ट अप्रोच टू टेक्नॉलजी के प्रशिक्षण कार्यक्रम से जुड़ी लड़कियों द्वारा लिखे गए लेखों में से एक है। इन लेखों के ज़रिये बिहार और झारखंड के अलग-अलग इलाकों में रहने वाली लड़कियों ने कोविड-19 के दौरान अपने अनुभवों को दर्शाया है। फेमिनिज़म इन इंडिया और फेमिनिस्ट अप्रोच टू टेक्नॉलजी साथ मिलकर इन लेखों को आपसे सामने लेकर आए हैं अपने अभियान #LockdownKeKisse के तहत। इस अभियान के अंतर्गत यह लेख बिहार के बक्सर ज़िले की प्रिया ने लिखा है, जिन्होंने सरकारी स्कूलों के बच्चों को ऑनलाइन क्लास के जंजाल से निकालकर लॉकडाउन में पढ़ाया।

मेरे गांव बगही में बच्चे-बच्चियों की पढ़ाई रुक गई है। कोविड -19 महामारी के फैलने के डर से सरकार ने तालाबंदी कर दी और मार्च महीने से ही गांव के सारे स्कूल बंद कर दिए गए। इस लॉकडाउन में सबकी हालत अजीब हो गई है। बच्चों का तो कहना ही क्या! स्कूल नहीं खुले हैं तो सारे बच्चे भटक रहे हैं। उनके पास समय बहुत है। ऐसे में वे क्या करेंगे? न उनके पास कहीं जाने का विकल्प है, न कोई उनके घर कोई आ सकता है। यही कारण है कि बच्चे यहां-वहां घूम रहे हैं। एक- दूसरे के साथ खेल रहे हैं। कोई रोक ना कोई टोक, वे सामाजिक दूरी का पालन भी नहीं कर रहे हैं। कोरोना वायरस का खतरा बढ़ता जा रहा है। बच्चों को यह भी नहीं पता होता कि इस वायरस से बचने के लिए क्या सावधानियां बरतनी हैं। बच्चों के मां-बाप भी पढ़े-लिखे नहीं हैं कि वे खुद अपने बच्चों को पढ़ा पाएं और अभी तक जो पढ़ा था बच्चे वह पढ़ाई भी भूल रहे हैं।

मैं सोचती हूं कि सरकार ने क्या सोचकर तालाबंदी की है। स्कूल-कॉलेज सब बंद कर दिए हैं। समूह में रहना मना कर दिया गया है जो कि हमारे लिए बहुत ज़रूरी है। सरकार चाहती है कि हम इन नियमों को मानें, लेकिन ये सारी बातें बच्चों को कौन बताएगा। तालाबंदी के पहले स्कूल जाने से बहुत कुछ सीखने को मिलता था। सर मारें नहीं, इस डर से बच्चे नहाकर साफ-सुथरा होकर स्कूल जाते थे। अब तो यह नहीं हो रहा है। बच्चों के मां-बाप के पास महामारी से बचने की सही जानकारी नहीं है, कोई स्रोत नहीं है। बारिश के पानी में बच्चे खेल-कूद रहे हैं। उन्हें सर्दी-खांसी, बुखार हो सकता है। यही सब कोरोना वायरस के भी लक्षण हैं। अब इस कोविड-19 महामारी में क्या सावधानियां बरतनी हैं, इसे बताने कौन आएगा ?

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समय गुजर रहा था, लेकिन यह बीमारी खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी। लॉकडाउन बढ़ता जा रहा था, फिर कुछ दिनों के बाद खबर आई कि बहुत सारे स्कूलों में मई महीने से ऑनलाइन क्लास शुरू हो जाएंगे। ऑनलाइन क्लास मतलब कंप्यूटर और मोबाइल फोन से पढ़ाई होगी। मैंने टीवी पर सुना, अखबार में भी पढ़ा। सब लोग आपस में चर्चा करने लगे कि कैसे होगा यह। पता चला कि सिर्फ प्राइवेट स्कूलों में ही ऑनलाइन क्लास संभव है, जो सरकारी स्कूल है उसमें तो सुविधाएं ही बहुत कम हैं। लैपटॉप तो मेरे गांव बगही में अभी तक किसी बच्चे के पास नहीं हैं। मोबाइल भी है तो बच्चों के पास नहीं है, उनके माता-पिता या भाई का है। ऑनलाइन क्लास के लिए किसी तरह 2 घंटे उन्हें मोबाइल दे दिया जाता है। बच्चों की ऑनलाइन क्लास एक बहुक बड़ी समस्या थी। मैं उनके झमेले में उलझी हुई थी। इसके साथ मई महीने में फैट संस्था का अभियान कोरोना नहीं, करूणा शुरू हो गया था। जैसे-जैसे हम हालत को समझते जा रहे थे, वैसे-वैसे मेरी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। आखिर हम गरीबों के साथ ऐसा क्यों होता है। मैं खुद एक गरीब परिवार से हूं। बहुत कठिनाई से यहां तक पढ़ पाई हूं। मेरा सपना है अपनी पढ़ाई पूरी करके नौकरी करना, यही वजह है कि मुझसे इन सारे बच्चों का दुख देखा नहीं जा रहा था।

बगही का प्राइवेट स्कूल बहुत बड़ा है। वहां ऑनलाइन पढ़ाई शुरू हुई थी। उसमें सभी जाति के बच्चे-बच्चियां पढ़ने जाते थे। मेरे गांव में कई दलित समुदाय के बच्चे जिनके मां-बाप आर्थिक रूप से थोड़े-बहुत संपन्न हैं, उनके बच्चे प्राइवेट स्कूल में पढ़ते हैं। वैसे बात गरीब और धनी की भी उतनी नहीं है। मेरे गांव में बस खाने भर ही जो कमा सकता है, वह भी अपने बच्चों को प्राइवेट में पढ़ाना चाहता है। होता यह है कि जो थोड़े गरीब हैं उनके अगर उनका एक लड़का और एक लड़की है तो वे अपने बेटे को प्राइवेट स्कूल में भेज देते हैं। वे एक बच्चे को पढ़ाने ही पैसा जुटा पाते हैं तो बेटी को सरकारी स्कूल में भेजते हैं। हालांकि, ऐसा नहीं है कि मेरे गांव में प्राइवेट स्कूल में लड़कियां नहीं पढ़ती हैं। पढ़ती हैं, धनी लोगों की लड़कियां। वहीं, लड़का चाहे वह धनी हो या गरीब सब ज्यादातर प्राइवेट स्कूल में ही पढ़ते हैं।

लैपटॉप तो मेरे गांव बगही में अभी तक किसी बच्चे के पास नहीं हैं। मोबाइल भी है तो बच्चों के पास नहीं है, उनके माता-पिता या भाई का है। ऑनलाइन क्लास के लिए किसी तरह 2 घंटे उन्हें मोबाइल दे दिया जाता है।

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लेकिन इस लॉकडाउन में प्राइवेट स्कूल में पढ़नेवाले गरीब घर के बच्चे अधिक परेशान हैं। बच्चों के पास फोन और इंटरनेट न होने के कारण उनकी ऑनलाइन क्लास छूट रही है। उनकी हाज़िरी नहीं बन रही है। बाकी गरीब घर के काफी बच्चे जो सरकारी स्कूल में पढ़ते थे उनके हाल के बारे में सोचिए। प्राइमरी स्कूल की छोड़िए, सरकारी मध्य विद्यालय बगही में भी ऑनलाइन पढ़ाई नहीं हो रही थी। इस समस्या से बच्चों के परिवार वाले बहुत ज्यादा चिंतित थे। वे सोच रहे थे कि अब उनके बच्चे कैसे पढ़ेंगे। इनमें से अधिकतर लोग बक्सर जाकर दिहाड़ी पर मजदूरी करते हैं। लॉकडाउन में उस पर भी आफत आ गई है। वे खेतों में भी काम करते हैं, मगर अभी वह भी नहीं मिल रहा है। उन्होंने सपना देखा था कि उनके बच्चे पढ़-लिख कर अच्छी ज़िंदगी जी सकेंगे। अभी बच्चों के लिए ऑनलाइन क्लास का इंतज़ाम नहीं हो पा रहा है तो कैसे क्या होगा!

मैं सोचने लगी कि जब मेरा गांव ही स्वस्थ नहीं रहेगा तो मैं या मेरा परिवार कैसे स्वस्थ रह पाएगा। मैं परेशान हो रही थी कि कैसे ये सारे बच्चे घर से निकलना कम करेंगे। लॉकडाउन की शुरुआत में जब बच्चे घूमते रहते थे तो उस समय उनको देखकर मैं उतनी चिंता नहीं करती थी। जबसे फैट संस्था के अभियान की मीटिंग में जुड़ी तो लगा कि साफ-सफाई, सामाजिक दूरी बनाए रखने की सबको ज़रूरत है। खुद तो यह सब करना ही है, लेकिन दूसरों को भी बताना है। उसी समय मेरे दिमाग में यह आया कि महामारी से बचने की सावधानी के बारे में हम बच्चों के के माता-पिता को बता सकते हैं। लेकिन बच्चों तक बात कैसे पहुंचाई जाए? वे कैसे अपनी पढ़ाई जारी रखेंगे? कैसे मेरी बात मानेंगे? ऐसे ही तो कोई बच्चा किसी की बात नहीं मानता या तो वह अपने परिवारवाले की बात मानता है या फिर टीचर की। तभी मेरे मन में ख्याल आया कि मैं बच्चों को पढ़ाना ही शुरू कर देती हूं। बच्चे पढ़ेंगे तो उनको इतना समय ही नहीं मिल पाएगा कि वे बेकार बाहर घूमें। हम महामारी में इधर-उधर आने-जाने के खतरे के बारे में बच्चों को बताएंगे तो उसका भी असर उन पर होगा।

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मैंने फैसला किया कि हाथ पर हाथ रखकर बैठने से कुछ नहीं होगा। कोविड-19 महामारी से जुड़े सारे नियमों को ध्यान में रखते हुए मैं घर से निकली।  सबसे पहले अपने पड़ोस के सभी बच्चों से मैंने बात की। उनके पास मास्क नहीं था तो मैंने उन सबके लिए घर पर ही मास्क  सिला। मास्क सिल लेने के बाद मैंने उन्हें बच्चों में बांट दिया। उनको समझाया कि मास्क लगाकर वे मेरे घर पर आकर पढ़ सकते हैं। सुनने भर की देर थी, सारे बच्चे बहुत खुश हुए और मेरे घर पर बारी बारी से 5-5 बच्चे समूह में आने लगे, एक घंटे की पढ़ाई के लिए। इससे अधिक समय मेरे पास नहीं था क्योंकि मुझे अपनी पढ़ाई भी करनी है, घर का भी काम करना है, मीटिंग भी करनी है।

मेरी एक बड़ी बहन है जिसने दसवीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी। ऐसा इसलिए क्योंकि वह बचपन से ही बहुत बीमार रहती थी। उसका इलाज अभी भी चल रहा है। उसका आगे पढ़ने का भी मन है। एक मेरी छोटी बहन भी है। उसने इस बार दसवीं पास की है। उसकी पढ़ाई अभी जारी है। मैं भी बीए पार्ट-1 मैं पढ़ती हूं। फिर मैंने अपनी दोनों बहनों से बात की और कहा कि वे लोग भी एक-एक घंटे बच्चे को पढ़ाएं जिससे उनका भी मन इस लॉकडाउन में लगेगा और पढ़ाई भी होगी। फिर क्या था! हम तीनों बहनों ने मिलकर बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ कोविड-19 से जुड़ी जानकारी देना शुरू कर दिया। जो मैंने फैट की जूम मीटिंग से सीखा, वह सारा कुछ बच्चों सिखाने लगी।

बच्चों ने लॉकडाउन की ऐसी की तैसी कर रखी थी। कुछ बच्चे मेरी बात मानते थे, और कुछ बच्चे पढ़ाई के बाद भी वही काम करते थे। बाहर बहुत सारे बच्चों से मिलना, खेलना, बारिश में भीगना सब कुछ। फिर हम बहनों ने अपने मोबाइल में कई बच्चों को खबरें भी दिखाई। चारों तरफ से खबर आ रही थी कि कोरोना नाम की बीमारी फैलती जा रही है। उन्हें दिखाया कि कैसे कोरोना संक्रमित लोगों को अलग-थलग रखा जाता है, उनके पास कोई आता-जाता भी नहीं है। बच्चों को समझाया कि अगर उन्हें कोविड का संक्रमण हो जाएगा तो उनके पास भी कोई नहीं रहेगा। बेहतर है कि वे पहले से सावधान रहो। बच्चों को समझाना थोड़ा मुश्किल था, लेकिन असंभव नहीं। कई बार बच्चे बहुत आसानी से बातें मान जाते हैं। हमने उनको डराया कि कि क्या वे लोग भी यही चाहते हैं कि हमारे गांव के लोग या वे भी बीमार हों जाएं हर रोज उन्हें सुई पड़े।

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इंजेक्शन की ख़ास बात यह है कि सारे बच्चे इससे बहुत डरते हैं। पहले तो हम बहुत परेशान थे कि क्या बच्चे हमारी बात मानेंगे पर हमने हिम्मत नहीं हारी और बच्चों को बहुत समझाया। कुछ दिक्कतें ज़रूर हुई, लेकिन बच्चे मान गए। सारे बच्चे सारी बातें ध्यान से सुनते थे और आपस में ध्यान भी रखते थे। जो बच्चा इन नियमों को नहीं मानता तो जब दूसरे बच्चे पढ़ने आते थे तो मुझसे या मेरी बहनों से उसकी शिकायत करते। तब हम उस बच्चे को दोबारा समझाते थे। कभी-कभी डांटते भी थे। धीरे-धीरे सारे बच्चे साफ-सफाई से रहने लगे। उनकी लापरवाहियां बंद हो गई। यह सब एक दिन में नहीं हुआ, बच्चों को समझाते-समझाते महीना भर बीत हो गया था।

बच्चों के मां-बाप बहुत खुश थे कि हमने उनके बच्चों को पढ़ाया। उनमें से कुछ बच्चों की मांओं ने आकर कुछ पैसे भी दिए। साथ ही यह भी कहा कि मैं भी तो उन बच्चों को पढ़ाने में मेहनत करती हूं तो वे अपनी खुशी से यह पैसे मुझे दे रही हूं। जो बहुत गरीब हैं वे पैसे नहीं दे पाते हैं। फ़िर भी सभी बच्चों को हम तीनों बहनें मिलकर पढ़ाती हैं। दस बच्चों के परिवार वाले हमें 50 रुपए देते हैं। महीने के 50 रूपए, इस हिसाब से मुझे एक महीने में 500 रुपये मिल जाते हैं। इस पैसे से हम अपनी कॉपी, किताब, कलम खरीद कर अपनी पढ़ाई कर पाते हैं, छोटी-मोटी अपनी जरूरतें भी पूरी कर लेते हैं।

लॉकडाउन ख़त्म हुआ लेकिन समय के साथ पढ़ाई की यह समस्या हल नहीं हुई है। मुझे डर है कि जो मेरी बहन और उनकी दोस्त है उनका आगे पढ़ने का सपना अधूरा ना रह जाए। दोनों कॉमर्स लेकर कॉलेज में पढ़ना चाहती थी, बैंक में काम करना उनका सपना था। लेकिन इस कोविड-19 ने सब चौपट कर दिया। कॉमर्स पढ़ने के लिए गांव से 17 किलोमीटर दूर के शहर जाना पड़ता है। लॉकडाउन का असर अब तक सब जगह है, लगभग सारी बसें बंद हो चुकी हैं। कोई सवारी नहीं मिलती है। हमारे पास इतना पैसा नहीं है कि अकेले गाड़ी करके रोज़ कॉलेज जा सकें, उन्हें चिंता है कि अब उनका पूरा साल बर्बाद हो जाएगा। ऐसे में क्या उपाय है? मेरी बहन और उसकी दोस्त आर्ट्स लेकर घर पर ही पढ़ाई कर रही हैं। दोनों दुखी हैं, अपने सपने को पूरा करने के लिए वे छटपटा रही हैं। मैं सोचती हूं कि मेरी बहन और उसकी दोस्त अकेली नहीं हैं, उनके अलावा न जाने कितने बच्चों का सपना टूटा होगा इस कोविड-19 महामारी में। आखिर ऐसा क्यों?

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तस्वीर : फेमिनिज़म इन इंडिया

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