बुधा जैसी औरतों के घर तक अब तक क्यों नहीं पहुंच पा रही 'हर घर नल जल योजना'
तस्वीर साभार: रेणु गुप्ता
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गर्मी का मौसम शुरू होते ही अधिक से अधिक पानी पीने की सलाह दी जाती है, क्योंकि गर्मियों में शरीर को पानी की ज़्यादा ज़रूरत होती है। पानी न केवल हमारे जीवन के लिए बल्कि शरीर में ऊर्जा बनाए रखने और बीमारियों से बचाने के लिए बेहद ज़रूरी होता है। इसलिए हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि हम लोगों के शरीर में पानी की कमी न हो। ये काफी सामान्य बातें लग रही होंगी, क्योंकि पानी की ज़रूरत से हम सभी वाक़िफ़ है और ये हमारे लिए आसानी से उपलब्ध है। पर क्या आप जानते हैं आज़ादी के इतने सालों बाद भी विकास के तथाकथित रास्ते पर आगे बढ़ते अपने देश में साफ़ पीने का पानी किसी विशेषाधिकार से कम नहीं है, जिससे आज भी ग्रामीण क्षेत्रों से आनेवाले लोग बड़ी संख्या में दूर हैं।

उत्तर भारत में इन दिनों अप्रैल के महीने में ही मई-जून जैसी तपती गर्मी शुरू हो चुकी है और पारा 40 डिग्री के ऊपर जाने लगा है। ऐसी तपती गर्मी में पानी की ज़रूरत और भी ज़्यादा बढ़ जाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत में आज भी 23 फीसदी ग्रामीण आबादी को पीने का साफ पानी नहीं मिल रहा है। डाउन टू अर्थ में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक इसकी जानकारी जल शक्ति मंत्रालय के राज्य मंत्री रतन लाल कटारिया द्वारा एक प्रश्न (संख्या 2488) के जवाब में लोकसभा में दी है।

उन्होंने अपने ज़वाब में बताया कि अगर इसे जनसंख्या के लिहाज से देखें तो यह आंकड़ा 21 करोड़ है। अगर सरकारी आंकड़ों पर गौर करें तो उसके हिसाब से देश में करीब 71 करोड़ ग्रामीणों को प्रतिदिन 40 लीटर पानी मिल रहा है। 18 करोड़ को प्रतिदिन 40 लीटर से कम पानी मिल रहा है। जबकि 3 करोड़ ग्रामीणों के लिए जो पानी उपलब्ध है, उसकी गुणवत्ता खराब है।

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सेवापुरी ब्लॉक के राने गाँव की मुसहर बस्ती में रहने वाली बुधा बताती हैं कि उनकी बस्ती में पीने के पानी का कोई साधन नहीं है। वह दूसरों के घरों में जाकर पीने का पानी मांगकर लाती थी, जिसके लिए उनके आए दिन गाली सुननी पड़ती थी और कई बार लोग बाल्टी उठाकर फेंक देते थे। इसलिए एक दिन उन्होंने सरकारी नल से जाने वाली टूटी हुई पाइप को बीच में तोड़कर उसमें अपने लिए एक नल जोड़ा।

आंकड़ों से समस्या की जटिलता को समझना कई बार हम लोगों के लिए मुश्किल हो जाता है। जब आप ज़मीन पर इन समस्याओं को अपने सामने देखते और जीते हैं तो आपको इसका एहसास होता है। बनारस शहर से क़रीब तीस किलोमीटर दूर स्थित सेवापुरी ब्लॉक (जिस ब्लॉक को साल २०२० में नीति आयोग ने मॉडल ब्लॉक बनाने के लिए गोद लिया है) के कई गाँव की मुसहर बस्ती में लोग पीने के पानी के लिए तरस रहे हैं।

सेवापुरी ब्लॉक के राने गाँव की मुसहर बस्ती में रहने वाली बुधा बताती हैं कि उनकी बस्ती में पीने के पानी का कोई साधन नहीं है। वह दूसरों के घरों में जाकर पीने का पानी मांगकर लाती थीं, जिसके लिए उन्हें आए दिन गाली सुननी पड़ती थी और कई बार लोग बाल्टी उठाकर फेंक देते थे। इसलिए एक दिन उन्होंने सरकारी नल से जाने वाली टूटी हुई पाइप को बीच में तोड़कर उसमें अपने लिए एक नल जोड़ा। वह कहती हैं, “अब जब सरकार आएगी सजा देने तो देखा जाएगा, लेकिन हम अपने बच्चों को पानी के लिए बिलखते नहीं देख सकते हैं। हम लोगों को पानी का कोई साधन नहीं दिया गया।”

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जातिवादी व्यवस्था के तहत गाँव के बाहरी हिस्सों में हमेशा से मुसहर जातियों को बसाया जाता रहा है और इस बाहर बसाने की परंपरा का असर ये रहा है कि मुसहर समुदाय के लोग मुख्यधारा और बुनियादी सुविधाओं से बाहर होते चले गए। उनके सामने से विकास की कई योजनाएं गुज़र जाती हैं, पर उन तक बुनियादी सुविधाएं तक नहीं पहुंच पाती हैं। ऐसी कई मुसहर बस्तियां जहां पीने के पानी का संकट आज भी क़ायम है, जिसकी वजह क्षेत्रों का भूगोल नहीं सिस्टम की वरीयता है, जिसने सुविधाओं और विकास के प्लान को एक दिशा में भेजना ही सीख़ा है।

सरकार ने इस जलसंकट को दूर करने के लिए साल 2024 तक ‘हर घर नल से जल’ योजना का लक्ष्य रखा है। केंद्र सरकार ने पानी के गहराए संकट से निपटने के लिए राज्यों के साथ मिलकर अगस्त 2019 में ‘जल जीवन मिशन’ की शुरुआत की थी। इस योजना के तहत हर व्यक्ति को 55 लीटर साफ पीने का पानी उपलब्ध कराने की बात कही गई है, जिसके लिए अगले पांच सालों में करीब 3.6 लाख करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे, जिसका 50 फीसदी हिस्सा केंद्र सरकार द्वारा वहन किया जाएगा जबकि बाकि 50 फीसदी राज्य सरकारों को खर्च करना होगा।

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योजना का ऐलान हुए दो साल पूरे हो चुके हैं, पर ज़मीनी हक़ीक़त यही है कि प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र के इस गाँव में ही इस योजना को पूरी तरह लागू नहीं किया जा सका है। इसी से योजना के पूर्ण होने के लक्ष्य का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। बेशक योजना के लिए तय किए खर्च पेपर में पूरे हो जाए और सांकेतिक रूप में पाइप भी बिछ जाए पर क्या ये पाइप कभी मुसहर बस्तियों तक भी पहुंचेगी, यह अपने आप में बड़ा सवाल है।

चुनाव आते ही सभी राजनीतिक पार्टियां दलितों और वंचित समुदाय के लोगों की समस्याओं पर बातें करने लगती हैं, उनके घरों में जाकर खाना खाने लगती हैं। चुनाव पास आते है सभी पक्ष-विपक्ष दलितों के पक्ष में आ जाते हैं। इसका उदाहरण हाल ही में, उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में देखने को मिला, जब अंतिम चरण के मतदान के दौरान वाराणसी ज़िले के सेवापुरी ब्लॉक में ही चित्रसेनपुर गाँव की मुसहर बस्ती की एक बीमार बच्ची का वीडियो वायरल होते ही एक हफ़्ते के भीतर हैंडपंप लग जाता है। लेकिन उसी गाँव की दूसरी मुसहर बस्ती की कोई सुध लेने वाला नहीं है।

ज़ाहिर है, दलितों के साथ खाना-खाते तस्वीर खिंचवाना और योजनाओं में बड़ी-बड़ी बातें करना एकदम अलग है। सच्चाई यही है कि हम लाख विकास की बात करें पर वास्तव में अपने समाज में लोगों को साफ़ पीने के पानी, भोजन और रोज़गार को सुनिश्चित नहीं कर पाए हैं। साफ़ पीने का पानी हर इंसान का बुनियादी अधिकार है। पानी, जीवन के लिए सबसे ज़रूरी है और इसके बिना हम किसी भी अन्य अधिकार की बात नहीं कर सकते हैं। इसलिए ज़रूरी है कि ऐसे ज़मीनी समस्याओं को उजागर किया जाए, जिससे हाशिएबद्ध समुदाय को मुख्यधारा से जोड़ा जा सकें और उनके मौलिक अधिकारों को सुरक्षित किया जा सके।

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तस्वीर साभार: रेणु गुप्ता

रेनू वाराणसी ज़िले के रूपापुर गाँव की रहने वाली है। ग्रामीण महिलाओं और किशोरियों के साथ समुदाय स्तर पर रेनू बतौर सामाजिक कार्यकर्ता काम भी करती हैं और अपने अनुभवों व गाँव में हाशिएबद्ध समुदाय से जुड़ी समस्याओं को लेखन के ज़रिए उजागर करना इन्हें बेहद पसंद है।

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