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एडिटर्स नोट : यह लेख फेमिनिस्ट अप्रोच टू टेक्नॉलजी के प्रशिक्षण कार्यक्रम से जुड़ी लड़कियों द्वारा लिखे गए लेखों में से एक है। इन लेखों के ज़रिये बिहार और झारखंड के अलग-अलग इलाकों में रहने वाली लड़कियों ने कोविड-19 के दौरान अपने अनुभवों को दर्शाया है। फेमिनिज़म इन इंडिया और फेमिनिस्ट अप्रोच टू टेक्नॉलजी साथ मिलकर इन लेखों को आपसे सामने लेकर आए हैं अपने अभियान #LockdownKeKisse के तहत। इस अभियान के अंतर्गत यह लेख  झारखंड की गिरिडीह ज़िले की प्रिया ने लिखा है जिसमें वह बता रही हैं शिवानी की कहानी।

निरसा में मेरी मासी का घर है। यह झारखंड का एक छोटा-सा शहर है। जब पूरे देश में लॉकडाउन लगा तो वहां ज़्यादा कुछ नहीं बदला। लोग सामान्य रूप से अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे। मेरी अक्सर मासी फोन पर बात होती थी तो वह अपने आस-पास का किस्सा सुनाती थी। उसी से मुझे उनके पड़ोस में रहनेवाली शिवानी के घर के बारे में पता चला। शिवानी निरसा में ही रहती है। उसके परिवार में 5 लोग हैं, माता-पिता, शिवानी, उसकी छोटी बहन शीनू और उनके दादाजी। उसका परिवार सुखी था पर उसकी स्थिति तब बदली जब उसके दादाजी बिहार गए और लॉकडाउन में वहीं अपने रिश्तेदार के घर अटक गए। वहां उन्हें बहुत दिनों तक रुकना पड़ा। क्या करते? लॉकडाउन में सारी गाड़ियां बंद थी। लॉकडाउन ख़त्म होने का ठिकाना नज़र नहीं आ रहा था। एक-दो महीने बीतने के बाद जब आपातकाल स्थिति में दो पहिया वाहन चलने शुरू हुए तो उनके रिश्तेदार ने बाइक से दादाजी को निरसा पहुंचा दिया। वह रिश्तेदार सरकारी ग्रामीण विकास योजना में नौकरी करते थे और दफ्तर के काम से निरसा आए थे। शिवानी के दादाजी अपने घर निरसा आकर खुश थे। कुछ दिन बीतने के बाद उनकी तबीयत अचानक से बिगड़ गई। उन्हें अस्पताल ले जाया गया और उनका इलाज चलने लगा।

उनके बीमार पड़ने के कई बातें बनने लगी। शिवानी हर दिन सुनती कि बिहार से निरसा आते ही दादाजी की तबीयत अचानक बिगड़ना, उनका अस्पताल जाना कुछ और ही संकेत करता है। लोगों का कहना था कि जरूर यह वह कोरोना के चपेट में आ गए हैं और घर वाले इस बात से जो इनकार कर रहे हैं, वह गलत है। शिवानी के घरवाले जरूर सबसे कुछ न कुछ छिपा रहे हैं। परेशानी तब और बढ़ी जब दादाजी को कोरोना होने के संदेह को कलंक और छूत की तरह देखा जाने लगा। शिवानी और शीनू के साथ बुरा व्यवहार होने लगा। शिवानी दसवीं कक्षा में थी और सीनू आठवीं कक्षा में। वे दोनों अपने घर के बगल में ही पढ़ने के लिए जाती थी। लॉकडॉउन के कुछ दिन बाद से ही वे लोग वहां जाने लगी थी। लेकिन जब उनके घर में कोरोना का शक होने लगा तो लोग उनसे परहेज़ करने लगे। 

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एक दिन पढ़ने के लिए बगल के घर में अंदर जाते वक्त शिवानी ठिठक गई। उसकी टीचर की मां ने दूर से ही जोर से कहां, “तुमलोग पढ़ने के लिए मत आओ। तुम्हारे घर में कोरोना वायरस है। आगे से अब यहां नहीं आना।” थोड़ा डरते हुए शिवानी ने कहा, “नहीं आंटी। मेरे दादाजी की तबीयत खराब हुई है, लेकिन कोरोना नहीं है उन्हें।” आंटी ने फिर से चिल्लाते हुए कहा, “घर के बाहर सब झूठ बोल रहा हैं क्या? बस तुमलोग अभी जाओ और कल से पढ़ने मत आना।” उसकी टीचर ने भी कहा “तुमलोग अभी पढ़ाई करने मत आना। अभी बस जाओ।” उसी समय आस-पास के घर के दो बच्चे पढ़ने के लिए अंदर आए। उनमें से एक बच्चे ने भी शिवानी और शीनू से कहा कि इसके दादाजी को कोरोना हो गया है। इन लोगों से दूर रहो। शीनू को बहुत बुरा लगा, वह गुस्से से कहने लगी कि उसके घर में कोरोना नहीं है।

फिर शिवानी ने अपनी बहन को कुछ और कहने से रोक दिया। उसको लगा कि इससे झगड़ा बढ़ जाएगा। इसलिए वहां से वह उसे लेते हुए वह सीधे घर आ गई। घर पहुंचते ही शिवानी रोने लगी। उसको ये सब बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा था। जब उसकी मां ने पूछा तो शीनू ने उन्हें सारी बातें बताई। तब उसकी मां ने दिलासा दिया, कि वह बात करेंगी उसकी टीचर से। शिवानी के पापा ने सुना तो कहा कि अभी किसी को वहां पढ़ने नहीं जाना है और न ही किसी को कुछ कहने की जरूरत है जब तक सारी उलझन सुलझ न जाए। मैं मासी से शिवानी का हालचाल लेती रहती थी। चंद दिनों बाद ही मासी ने बताया कि शिवानी के दादाजी ने इलाज के दौरान ही दम तोड़ दिया। दादाजी की मृत्यु की खबर से शिवानी का पूरा मोहल्ला घबरा गया। बड़े-बूढ़े सभी के मन में कोरोना का डर समा गया था। सब पागल हो रहे थे, घबरा रहे थे। उनसे भी अधिक बुरा प्रभाव शिवानी के घरवालों पर पड़ रहा था। मोहल्ले के लोग कहने लगे थे कि दादाजी की मृत्यु कोरोना के कारण हुई है। इसलिए उनके घरवाले भी पक्का संक्रमित हो गए होंगे। सब तरह तरह की मनगढ़ंत बातें करने लगे थे।        

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धीरे-धीरे सारे लोग शिवानी के घर के सामने जाने से भी कतराने लगे। उनसे दूरी बनाने लगे। बात यहां तक पहुंच गई कि उन लोगों को जरूरी सामान मिलना भी मुश्किल हो गया। लोग उनसे भेदभाव कर रहे थे। एक दिन शिवानी की मां ने उसको घर की जरूरत का कुछ सामान लाने को बाज़ार भेजा तो दुकानदार ने शिवानी को सामान देने से इनकार कर दिया। इतना ही नहीं, उसे जाने को भी कह दिया। शिवानी एकदम तमतमा गई। लौटकर वह अपनी मां पर गुस्सा होने लगी और कहने लगी कि अब से मुझे बाहर मत भेजना। शिवानी के पापा को भी वहां के लोग बाहर निकलने से मना करने लगे। पूरे परिवार को घर में ही रहने को कहा गया क्योंकि लोगों को शक था कि पूरे घर में संक्रमण है। हद तो तब हो गई कि पुलिस को बुलाया गया। कहा गया कि कोरोना संक्रमित इस घर के लोग अगर हम सबके बीच रहते हैं तो हमें खतरा हो सकता है, कहा गया कि एक सदस्य की कोरोना से मृत्यु भी हो चुकी है। ये सब अपने आपको छिपा रहे हैं। अगर घर वाले बाहर आना-जाना करते हैं तो बाकी लोग जोखिम में पड़ सकते हैं। कोई शिवानी के घरवालों की हालत समझने को तैयार नहीं था। पुलिस ने सबसे पहले शिवानी के घर को बाहर से बांस से घेर दिया। ना ही घर के लोग बाहर जा सकते थे और ना ही बाहर के लोग घर के अंदर आ सकते थे। एक तरफ तो शिवानी का घर भर दादाजी के गुजरने से दुखी था और दूसरी तरफ यह हंगामा। चौबीसों घंटे लोगों के ताने सहने पड़ते थे और सबकी नज़र में खुद को दोषी देखना चुभता था।।  

एक सही बात यह हुई कि पुलिस ने शिवानी के घर के हर व्यक्ति को कोरोना टेस्ट करवाने को कहा। तब जाकर सबकी जांच हुई और फिर जो रिपोर्ट आई तो हड़कंप मच गया क्योंकि शिवानी के घर के सभी लोगों की कोरोना रिपोर्ट नेगेटिव आई। अब अचंभित होने की बारी लोगों की थी जिन्होंने हो-हल्ला किया था। वे कहने लगे कि ऐसा कैसे हो गया! नए सिरे से मनगढ़ंत किस्से बनने लगे। लोग कहने लगे कि हो सकता है कि शिवानी के घर वाले संक्रमित नहीं हुए होंगे। फिर आई शिवानी के दादाजी  की रिपोर्ट। उनकी भी कोरोना रिपोर्ट नेगेटिव आई। तब सबके होश उड़ गए। आखिर यह कैसे हो गया? दादाजी की रिपोर्ट में आया कि उनकी मृत्यु कोरोना के कारण नहीं हुई थी। हार्ट अटैक के कारण उनको बचाया नहीं जा सका था। मैंने मासी से पूरा किस्सा सुना तो यही कहा कि जब रिपोर्ट साफ तो सबका मन साफ।

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मोहल्लेवालों ने मिलकर शिवानी के घर के चारों ओर जो बांस लगाया हुआ था जल्दी-जल्दी सबको हटाया। सब पहले जैसा किया गया। लोग शिवानी के घर वालों से व्यवहार भी पहले जैसा करने लगे। ऐसे करने लगे मानो कुछ हुआ ही नहीं था। कुछ ने कहा कि हम सबको सच्चाई नहीं पता थी। अचानक यह सब हो गया ना, इसलिए किसी की बुद्धि ने काम नहीं किया, किसी को समझ नहीं आया। धीरे-धीरे शिवानी के घर की हालत सामान्य होने लगी। एक दिन उसकी टीचर ने खुद से उनको फोन  किया और शिवानी और शीनू को पढ़ने आने को कहा। तब शिवानी की मां ने उसकी टीचर से कहा, “आप लोग बिना कुछ जाने ही बच्चे को कुछ भी कहने लगते हैं। शिवानी आपके यहां से आकर रोने लगी थी। आखिर बच्चों के दिमाग पर कितना बुरा असर पड़ जाता है।”

शिवानी की टीचर ने सफाई देते हुए कहा, कि उसे पता नहीं न था कि ऐसा कुछ होगा। फिर शिवानी के पापा ने दोनों बेटियों को उस टीचर से पढ़ने जाने से ही मना कर दिया। लोगों के पास अपनी गलत हरकत का कोई जवाब नहीं था। उनको कोई अफ़सोस भी नहीं था। खैर,चलो अच्छा हुआ कि किसी की रिपोर्ट पॉजिटिव नहीं आई।  शिवानी को यह सब सुन-सुन कर चिढ़ हो रही थी। मेरी मासी को गुस्सा आ रहा था कि लोगों ने झूठ-मूठ का इतना तमाशा खड़ा किया। उसे शिवानी के परिवार की बड़ी चिंता हो रही थी। जब मैंने मासी से सब सुना तो मुझे यह गाना याद आया; “कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना।” मैं खुद आश्चर्य में पड़ गई थी कि कोरोना का कहर इतना बढ़ गया है कि लोग अंधविश्वासी हो गए हैं। किसी की मृत्यु हुई नहीं कि उसका कारण कोरोना समझ लेते हैं और जब रिपोर्ट आती है तब उनकी आंखों से पर्दा हटता है। शिवानी और शीनू ने पूरे लॉकडाउन में लोगों के अंधविश्वास का जो नतीजा झेला वह भयानक था। मुझे उनकी सूझ बूझ पर नाज़ है।

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तस्वीर : फेमिनिज़म इन इंडिया


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