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शादी को हमारे भारतीय समाज में हर इंसान के जीवन का अहम फ़ैसला बताया जाता है। यही मानकर हर परिवार बच्चे के जन्म के साथ ही उसकी शादी के सपने सजाने लगता है और जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते हैं उनपर परिवार वाले अपने शादी के सपने तोपते जाते हैं और उसी के हिसाब से उन्हें बड़ा करते हैं। वे चाहते हैं कि उनके बच्चे अच्छे इंसान की बजाय शादी के लिए एक अच्छे और परफेक्ट ‘मेटेरियल’ बने। अगर लड़का है तो वह समाज की बनाई ‘मर्द’ की परिभाषा में खरा उतरे। अच्छे पैसे कमाए और अपनी बीवी को अपने क़ब्ज़े में रखे। वहीं, दूसरी तरफ़ लड़की से यह उम्मीद की जाती है कि वह आदर्श बहु बनने के लिए तैयार हो, कम बोले, सबकी सुने, दूसरे के बताए अनुसार अपनी ज़िंदगी जीती रहे, सब सहती रहे, अपने अस्तित्व को भूलकर समाज के बताए किरदार को जीए और अपनी कोई इच्छा कभी ज़ाहिर न होने दे, वग़ैरह-वग़ैरह।

करधना गांव की नीतू (बदला हुआ नाम) ऐसी बिल्कुल नहीं थी। बीए की पढ़ाई पूरी होने के बाद जब उसने अपनी मर्ज़ी से शादी की इच्छा ज़ाहिर की तो उसके परिवार में मानो हड़कंप मच गया। उस पर कड़ी पाबंदी और मारपीट का दौर शुरू हो गया। बड़े भाई ने पिता की भूमिका ले ली और नीतू की शादी उसकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ कहीं और तय कर दी। हालांकि, नीतू इस शादी के लिए तैयार नहीं थी, नतीजतन वह शादी के एक दिन पहले घर छोड़कर चली गई और अपने मनपसंद साथी से मंदिर में शादी कर ली। इसके बाद नीतू की ज़िंदगी की मुश्किलें और बढ़ गई, उसके ससुराल और मायके वालों ने उससे अपना रिश्ता ख़त्म कर लिया। इतना ही नहीं, नीतू के पति को उसके माता-पिता ने अपनी जायदाद से भी बेदख़ल कर दिया। गांव में नीतू का रहना काफ़ी मुश्किल हो गया।

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नीतू अकेली नहीं है, ऐसे तमाम लड़कियां है जिन्हें आज भी अपनी ज़िंदगी का फ़ैसला ख़ुद लेने में समाज के बहिष्कार की सजा भुगतनी पड़ती है। और हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि ऐसे में सिर्फ़ ये लड़कियाँ ही नहीं इनके आसपास की लड़कियों की ज़िंदगी भी बुरी तरह प्रभावित होती है। ऐसा ही हुआ हरसोस की ममता (बदला हुआ नाम) के साथ, जब बारहवीं में पढ़ने वाली उसकी बहन अपने साथी के साथ घर छोड़कर चली गई, तब उसकी छोटी बहन ममता को इसका परिणाम भुगतना पड़ा। उसके कहीं आने-जाने, पढ़ाई-लिखाई हर काम में सख़्त पाबंदी लगाई जाने लगी और सालभर के अंदर उसकी पढ़ाई छुड़वाकर उसकी शादी कर दी गई। लड़कियां घरों-परिवारों में इंसान की बजाय एक बड़ी ज़िम्मेदारी समझी जाती है और उनकी शादी करवाना उस ज़िम्मेदारी को अच्छे तरह से निभाना माना जाता है। यही वजह है कि परिवार शुरू से ही अपनी ज़िंदगी भर की ताक़त लड़की की शादी में झोंक देता है। अब समय थोड़ा बदला है, लड़कियों को पढ़ाई और रोज़गार की दिशा में आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। लेकिन इन तमाम आज़ादियों के बीच शादी जैसे ज़िंदगी के बड़े फ़ैसले का अधिकार अभी भी लड़कियों से काफ़ी दूर है।

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ग़ौर करने वाली बात ये भी है कि जिस तरह एक लड़की के लिए ख़ुद की मर्ज़ी से शादी करना बेहद मुश्किल ठीक उसी तरह किसी शादी से बाहर आना भी उसके लिए उतना ही मुश्किल होता है।

वहीं, दूसरी तरफ़ अक्सर हमलोग देखते हैं कि जैसे ही कोई लड़का अपनी मर्ज़ी से शादी का फ़ैसला लेता है तो हमारे समाज और परिवार का नियम तुरंत बदल जाता है। शुरू में भले ही परिवार वाले उन्हें न अपनाए लेकिन जल्द लड़के को अपना लिया जाता है। इतना ही नहीं, शादी जैसे बड़े फ़ैसलों में चाहे शहर हो या गाँव लड़कों से उनकी मर्ज़ी पूछी जाती है। पर लड़कियों को इन सभी अधिकारों से दूर रखा जाता है, ये देखकर ऐसा लगता है कि हमारा समाज ये मान ही नहीं पाता कि कोई लड़की अपनी शादी से जुड़ा सही फ़ैसला कर सकती है।

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ग़ौर करने वाली बात ये भी है कि जिस तरह एक लड़की के लिए ख़ुद की मर्ज़ी से शादी करना बेहद मुश्किल ठीक उसी तरह किसी शादी से बाहर आना भी उसके लिए उतना ही मुश्किल होता है। आज देश में महिलाओं के हक़ में ढ़ेरों क़ानून बनाए गए है, उन्हें हिंसा और भेदभाव से बचाने के लिए सरकार ढेरों प्रयास करती है और हमेशा महिलाओं को हिंसा के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के लिए प्रोत्साहित करती है। पर हक़ीक़त एकदम अलग है। गाँव में महिलाएँ घरेलू हिंसा का शिकार होती रहती है, लेकिन उनका परिवार बचा रहे इस नामपर वो पूरी ज़िंदगी घरेलू हिंसा के साथ गुज़ार देती है। जब हम घरेलू हिंसा को सहने वाली महिलाओं से बात करते है तो अक्सर वजह कुछ और ही पाते है, वो ये कि – अगर वो अपने पति को तलाक़ दे दें तो ये समाज और उनका अपना परिवार उन्हें स्वीकार नहीं करेगा। महिलाओं में शादी तोड़ने को लेकर आर्थिक स्वावलंबन से ज़्यादा डर समाज का होता है। उसकी स्वीकृति और उपेक्षा का होता है। उन्हें इसबात का डर होता है, समाज उन्हें नकार देगा। वहीं जैसे ही पुरुष अपनी शादी को ख़त्म करने का फ़ैसला लेता है, उसके समाज हमेशा सही ठहरा देता है। पुरुष को शादी ख़त्म में करने में समाज का डर और दबाव उतना नहीं होता जितना ज़्यादा महिलाओं पर होता है।

कहने का मतलब ये है कि ‘शादी’ लड़की की जिदंगी का जितना अहम फ़ैसला है, उतना ज़्यादा ही इसपर लड़की के खुद से ज़्यादा समाज और परिवार का दख़ल होता है। वो समाज की मर्ज़ी से जब शादी में धकेली जाती है तभी वो जायज़ कहलाती है और जैसी ही इसे लेकर जब वो ख़ुद फ़ैसला करती है तो समाज उसे नाजायज़ करार देता है, जिसका उदाहरण हम आज भी आनर किलिंग के केस के रूप में देख सकते है। ठीक उसी तरह शादी को तोड़ना भी लड़की के लिए बड़ी चुनौती है, जहां लड़कियाँ घरेलू हिंसा और मेरिटल रेप का शिकार होती रहती है लेकिन आवाज़ नहीं उठाती और कितने भी समस्याओं के बाद भी शादी ख़त्म करने के बारे में सोच भी नहीं पाती है। पर हमें समझना होगा कि शादी करनी है या नहीं। या फिर किसके साथ और कब करनी है ये फ़ैसला लड़की को करना चाहिए और उसे समाज को स्वीकार भी करना चाहिए। अगर एक लड़की बालिग़ होने के बाद देश का नेता चुन सकती है तो अपने जीवनसाथी को क्यों नहीं चुन सकती? हमें सोचना होगा। और सिर्फ़ सोचना ही नहीं इस दिशा में काम भी करना होगा, जिससे लड़कियों को शादी के नामपर अलग-लग हिंसा का सामना न करना पड़ा। 

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तस्वीर : श्रेया टिंगल फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए

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