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एडिटर्स नोट : यह लेख फेमिनिस्ट अप्रोच टू टेक्नॉलजी के प्रशिक्षण कार्यक्रम से जुड़ी लड़कियों द्वारा लिखे गए लेखों में से एक है। इन लेखों के ज़रिये बिहार और झारखंड के अलग-अलग इलाकों में रहने वाली लड़कियों ने कोविड-19 के दौरान अपने अनुभवों को दर्शाया है। फेमिनिज़म इन इंडिया और फेमिनिस्ट अप्रोच टू टेक्नॉलजी साथ मिलकर इन लेखों को आपसे सामने लेकर आए हैं अपने अभियान #LockdownKeKisse के तहत। इस अभियान के अंतर्गत यह लेख बक्सर ज़िले की रिंकू ने लिखा है जिसमें वह बता रही हैं सरिता की कहानी।

सरिता 25 साल की है। वह पटना जिले के एक छोटे से गांव में रहती है। वह अपने दो भाइयों की वह इकलौती बहन है। उसकी मम्मी आशा (सरकारी स्वास्थ्यकर्मी) के रूप में कार्यरत हैं। उसके पापा पहले प्राइवेट स्कूल में पढ़ाते थे, लेकिन अब वह सिर्फ अपने खेत में काम करते हैं। लॉकडाउन में सरिता के पापा का एक पैर टूट गया। उसके घर में चल रहे बंटवारे के चक्कर में। सरिता के पापा तीन भाई हैं। उसके चाचा सरिता के परिवार को घर में चापाकल, बाथरूम और छत का इस्तेमाल नहीं करने देते हैं। उन्हें सिर्फ एक कमरा दिया गया है। उन्हें पानी दूसरे के नल से लाना पड़ता है और बाथरूम के लिए खेत में जाना होता है।

लॉकडाउन की शुरुआत में ही सरिता के घर का आटा खत्म हो गया था। उसकी मां ने गेहूं धोकर दूसरे की छत पर सुखाने के लिए डाला था। बारिश जैसा मौसम होते देख उन्होंने सरिता के पापा को गेहूं छत से उतारने के लिए कहा। वह गेहूं का कनस्तर सिर पर रख कर सीढ़ियों से उतर रहे थे। अंतिम सीढ़ी से उनका पैर फिसल गया और वह गिर गए। उस समय ज्यादा दर्द नहीं हुआ था, लेकिन उनको चलने में परेशानी होने लगी। दर्द की दवाई और मरहम से कुछ ठीक नहीं हुआ। पूरी रात ऐसे ही गुजरी क्योंकि वह शाम को गिरे थे। गांव में आस-पास में कोई बड़ा अस्पताल नहीं है। दूसरे दिन सुबह सरिता के पापा बोले कि वह पैर मड़वाने जा रहे हैं क्योंकि उन्हें लग रहा है कि उनके पैर में मोच आ गई है। यह सुनकर सरिता ने कहा कि वह पहले एक्सरे करवा लें नहीं तो माड़ने के दौरान पैर को खींचना पड़ता है और तब परेशानी बढ़ जाएगी।

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सरिता की बात मानकर उसके पापा अस्पताल गए। वहां उनका एक्सरे हुआ तो पता चला उनके पैर में फ्रैक्चर हैं। वहां से वह सरकारी अस्पताल पहुंचे, पहुंचने के बाद पता चला कि वहां पर प्लास्टर करने की व्यवस्था नहीं थी। आखिर में वह पटना के एक प्राइवेट हॉस्पिटल में गए। हड्डी के डॉक्टर ने उनके पैर का प्लास्टर किया। उन्हें 45-50 दिन के लिए आराम करने को कहा गया। सरिता खुश है कि अब उसके पिता का प्लास्टर दो दिन में कटने वाला है। लेकिन वह अपने पापा को थोड़ा चिंतित ही देख रही है। सरिता बारहवीं क्लास में पढ़ती थी। उसे कब्बडी खेलना पसंद था लेकिन साल 2012 में अचानक से उसे दांए हाथ में दर्द होने लगा और वह हाथ पतला होने लगा। पटना के एक अस्पताल में कुछ दिनों तक उसका इलाज चला, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। यह देखकर डॉक्टर ने उसे दिल्ली रेफर कर दिया। दिल्ली में जांच के बाद FSHD  नामक जेनेटिक बीमारी का पता चला। इस बीमारी में मांसपेशियां धीरे-धीरे काम करना बंद कर देती हैं। डॉक्टर ने कह दिया कि इस बीमारी की कोई दवा भी नहीं है। सरिता को सिर्फ व्यायाम करना है। 

सरिता को लॉकडाउन में आगे का रास्ता भी नहीं सूझ रहा है। दूर तक नौकरी की उम्मीद नहीं दिख रही है। लेकिन उसने अपनी अंदरूनी शक्ति को पहचाना है। वह खुद से अपना सारा काम करती है और अब वह अपने आपको किसी से कम नहीं मानती।

घबराहट के कारण सरिता के परिवारवाले इस बात को सरिता से छिपाते रहे। कुछ दिन बाद जब उसे मालूम हुआ तो वह कहने लगी कि मैं अब जीकर क्या करूंगी। उसने एक साल तक पढ़ाई भी छोड़ दी थी और कई बार आत्महत्या करने की कोशिश भी की थी। उस समय उसके माता-पिता ने उसे भरोसा दिया कि वह जल्दी ही ठीक हो जाएगी। वे अलग-अलग उदाहरण देकर उसे कहते थे कि तुम्हारे जैसे इस दुनिया में बहुत सारे लोग हैं, तुम सिर्फ अकेली नहीं हो और इसमें उसकी कोई गलती नहीं है।FSHD नाम की यह बीमारी सरिता को 17 साल की उम्र में हुई थी। तब से लोग कहते थे कि अब सरिता की शादी करने में ही सबकी भलाई है नहीं तो बीमारी बढ़ने पर कौन शादी करेगा इससे। परिवारवालों का यह भी कहना था कि सरिता की बीमारी के बारे में लड़केवालों को पहले से नहीं बताना है। इससे सरिता और परेशान हो गई। उसने सोचा कि अगर मेरी शादी हो गई और लड़के वाले स्वीकार नहीं करेंगे तो मैं क्या करूंगी। धीरे-धीरे उसकी बीमारी बढ़ती जा रही है। अब खेलना-कूदना, चढ़ना और लंबा पैदल का सफर भी मुश्किल हो गया है। 

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सरिता के पड़ोस में एक महिला है जो विकलांग है। उसे भी तरह-तरह से परेशान किया जाता है। उसका पति भी उसे हर वक्त कोसता रहता है। वह कुछ नहीं कर पाती है सिर्फ रोने के अलावा। उसने पढा़ई भी नहीं की है। कोई सरकारी सुविधा, जैसे महिला हेल्पलाइन नंबर पर भी संपर्क नहीं कर पाती है। पति-पत्नी का झगड़ा है, यह कहकर मदद करनेवाले दूसरे लोगों को भी चुप करा दिया जाता है। यह सब देखकर सरिता ने ठान लिया कि वह जब तक आत्मनिर्भर नहीं बन जाती तब तक शादी नहीं करेगी। उसने अपना प्रस्ताव परिवार के सामने रखा। पहले तो सब नाराज़ हो गए। सब लोग एक तरफ और सरिता अकेली पड़ गई। आखिरकार उसने अपने पापा से सारी बातें की और वह मान गए। MSc. में सरिता के दाखिला लेते वक्त छोटे भाई ने कहा कि वह अब नहीं पढ़ेगी और अकेले इसको कहीं नहीं जाना है। दाखिले की पहली लिस्ट में ही सरिता का नाम आ गया था, मगर किसी ने कुछ नहीं कहा। सरिता ने फिर अपने पापा से बात की। उन्होंने बेटे को समझाने की कोशिश की। जब भाई ने साफ इनकार कर दिया कि वह नहीं पढ़ेगी तब उन्होंने कहा, “सरिता मेरी बेटी है। मैं जो चाहूंगा, जहां चाहूंगा वहां सरिता पढ़ेगी और इसके सारे खर्चे मैं देता हूं। अंत में सरिता का मगध विश्वविद्यालय में वनस्पति विज्ञान में नामांकन हुआ, लेकिन भाई ने सरिता से बात करना बंद कर दिया।

सरिता ने हार नहीं मानी। पढ़ने के लिए उसे गांव से 35 किलोमीटर दूर पटना जाना पड़ता था। वापस आकर घर का काम भी करना पड़ता था। ऊपर से अकेले पढ़ने जाने और जींस-शर्ट वगैरह पहनने पर दादाजी के ताने सुनने पड़ते हैं। तब फिर सरिता ने अपने पापा से बात की और उन्होंने दादाजी को समझाया कि सरिता पढा़ई में बहुत अच्छी है। हमेशा अच्छे नंबर लाती है और हम चाहते हैं कि उसका भविष्य संवरे। वह टीचर बनना चाहती है। विकलांगता के कारण ज्यादा भाग-दौड़ वाला काम वह नहीं कर पाएगी, इसलिए टीचर बनने के लिए उसको पढ़ना ही है। दादाजी समझ गए। तीन साल पहले सरिता ने एमएससी पास किया। इसके बाद फिर से उस पर शादी को लेकर दबाव पड़ने लगा। 

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उसी दौरान सरिता फैट संस्था से जुड़ी। उसने कम्प्यूटर और कैमरा चलाना सीखा। जल्द और जबरन शादी पर उसने समझ बना ली थी। उसका मनोबल बढ़ने लगा। उसने प्राइवेट बीएड कॉलेज में नामांकन कराया। फील्डवर्क करके, रुपये इकट्ठा करके और पापा के सहयोग से एक साल की 75000 रुपए फीस उसने जमा कर दी थी। तभी अचानक कोरोना वायरस के कारण लॉकडाउन लग गया। अब आफत का पहाड़ टूट पड़ा है। सरिता के पापा का अभी तक पैर का इलाज चल रहा है। मम्मी की हार्ट की बीमारी की दवाई चल रही है। लॉकडाउन में उनका काम बंद, भाई की पढ़ाई बंद और नौकरी की तलाश भी बंद। घर में राशन को लेकर कोई परेशानी नहीं है, मगर दाल, सब्जी, दूध और दवाई को लेकर चिंता है। पापा की तबीयत खराब होने के बाद सरिता घर का खर्च चला रही थी। तालाबंदी में उसकी ऑनलाइन क्लास होता है और होमवर्क भी मिलता है। घर का काम है ही। सुबह साढ़े 6 बजे से आधी रात तक वह जुटी रहती है। शरीर के साथ अब उसके मन पर बहुत दबाव पड़ने लगा है।  लेकिन वह समय निकालकर फैट के कामों में जुड़ती है। फैट की टीम से उसको हर तरह की मदद मिल रही है। 

सरिता जहां रहती है वहां एक दिन लॉकडाउन के दौरान दो परिवारों के बीच खेत को लेकर झगड़ा हो गया। एक ने दूसरे व्यक्ति के खेत की आरी को काट दिया था। दोनों तरफ से मारपीट हो गई। एक तरफ के लोग कम जख्मी हुए थे, दूसरी तरफ के ज्यादा।  उस समय सरिता भी वहां मौजूद थी। जिस लड़के का सर फटा था वह सरिता के दरवाजे के पास जाकर बैठ गया। तब तक उसके परिवार के लोग भी आ गए और सब रोने लगे। उस समय सरिता ने दुपट्टे से उस लड़के का सर बांध दिया। वह दर्द से चिल्ला रहा था और कह रहा था कि मुझे अस्पताल ले चलो। सरिता ने उसके पापा से कहा कि लड़के को अस्पताल ले जाइए। वह बोले कि उनके पास कोई साधन नहीं है अस्पताल जाने का? यह सुनकर सरिता ने अपनी मम्मी को कहा कि मोटरसाइकिल की चाबी लाकर दे दो। पता नहीं सरिता की मां ने वह बात सुनी या नहीं, वह नहीं लाई।  इसके बाद सरिता ने देर नहीं की और अस्पताल जाने के लिए अपने घर से मोटरसाइकिल की चाबी लाकर दे दी। 

मामला कोर्ट में गया। केस दर्ज हुआ दोनों तरफ से और सबको जेल में बंद कर दिया गया। जिसको चोट लगी थी वह अस्पताल में था। दो दिन बाद कोर्ट से नोटिस आया तो पता चला कि कि जिस पक्ष को झगड़े में ज्यादा चोट नहीं लगी थी उन लोगों ने सरिता के पापा, भाई का भी नाम कोर्ट में दे दिया क्योंकि उस पक्ष को लग रहा था कि ये दूसरे पक्ष की मदद कर रहे हैं। सरिता को वे लोग गालियां दे रहे थे और ‘लंगड़ी’ बोल रहे थे। पुलिस घर पर पापा और भाई को पकड़ने के लिए आ रही है तो सब लोग सरिता को ताना दे रहे हैं। सरिता समझाने की कोशिश कर रही है, लेकिन बोला जा रहा है कि बाकी सब लोग वहीं पर थे तब उसे बोलने की क्या जरूरत थी। उसकी वजह से यह सब देखना पड़ रहा है। तकलीफ होती है सरिता को इन सब से, लॉकडाउन में आगे का रास्ता भी नहीं सूझ रहा है। दूर तक नौकरी की उम्मीद नहीं दिख रही है। लेकिन उसने अपनी अंदरूनी शक्ति को पहचाना है। वह खुद से अपना सारा काम करती है और अब वह अपने आपको किसी से कम नहीं मानती।

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