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देश में सदियों से न्याय के नाम पर सर्वाइवर पर सवाल उठाने और दोष मढ़ने की प्रथा चली आ रही है। भारत में आज भी बलात्कार की सर्वाइवर महिलाओं के लिए अकसर न्याय के पहले उनकी शादी की चिंता की जाती है। पितृसत्तात्मक सोच में जकड़े समाज में आरोपी को गुनहगार ठहराने के बजाय सर्वाइवर को ही कलंकित का चलन है। पिछले दिनों मीडिया में मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच का एक अभियुक्त सरकारी कर्मचारी को उस महिला से शादी के लिए पूछना जिसने उस पर नाबालिग अवस्था में बार-बार बलात्कार करने का आरोप लगाया था, की खबरें सुर्खियों में रही। हालांकि, मुख्य न्यायाधीश बोबडे के नए बयान के अनुसार मीडिया में आई अभियुक्त को पीड़ित से शादी करने के प्रस्ताव की खबरें सही नहीं थी। उन्होंने अपने बयान में कहा कि अभियुक्त से सवाल किया गया था कि क्या वे शादी करने वाले हैं। उन्होंने आगे कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने हमेशा नारीत्व को सर्वोच्च सम्मान दिया है। हालांकि न्यायालय का अभियुक्त से ये पूछना असल मुद्दे से भटकना और महिलाओं के पक्ष को नजरंदाज करना और उनके सम्मान को ठेस पहुंचना ही है। चीफ जस्टिस के इस बयान के बाग 4000 से अधिक महिला अधिकार कार्यकर्ताओं, विभिन्न समूहों और नागरिकों ने भारत के मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे को एक पत्र के माध्यम से उनके सुप्रीम कोर्ट में दो अलग-अलग मामलों की सुनवाई करते हुए हाल ही में दिए गए बयानों के लिए इस्तीफे की मांग की। इसमें एक बलात्कारी को नाबालिग पीड़िता से शादी करने और वैवाहिक बलात्कार से जुड़े मामले शामिल हैं।

दरअसल, महाराष्ट्र स्टेट इलेक्ट्रिक प्रोडक्शन कंपनी में काम कर रहे एक तकनीशियन पर पॉक्सो एक्ट के तहत बलात्कार का आरोप लगा था। मुख्य न्यायाधीश ने मामले की सुनवाई करते हुए आरोपी से कहा कि उन्हें नाबालिग लड़की के साथ यौन हिंसा और बलात्कार करने से पहले सोचना चाहिए था क्योंकि वह एक ‘सरकारी कर्मचारी’ है। उन्होंने आरोपी को पीड़िता से शादी करने का प्रस्ताव देते हुए कहा कि अगर वे शादी के लिए तैयार हैं, तो न्यायालय उनकी मदद कर सकता है। अन्यथा वह अपनी नौकरी खो देगा और सजा भी हो सकती है।

जिस न्यायिक व्यवस्था ने सर्वाइवर महिलाओं को आगे आने के लिए प्रोत्साहन के बजाए हीन दिखाने का जिम्मा ले लिया हो और यह साबित हो जाए कि उनके आरोप ‘असंभव’ हैं, वहां लैंगिक असमानता में ही नहीं, महिलाओं के अपराधों में भी वृद्धि हो सकती है।

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दुर्भाग्यवश, मुख्य न्यायाधीश का यह बयान समाज के उस बड़े तबके का प्रतिनिधित्व करता है जहां बलात्कार के बाद समझौते की बात होती है। ऐसी मानसिकता हमें अक्सर ग्रामीण भारत के खाप पंचायतों में नजर आती है जहां फैसले संवैधानिक नहीं पितृसत्ता की उपज होती है। भारत में बलात्कार के मौजूदा कानून में क्रमागत सुधार सरवाईवर्स और कार्यकर्ताओं के सालों के संघर्ष और बलिदान का नतीजा है। चाहे वह रमीज़ा बी की बलात्कार की घटना हो या दिल्ली में हुए साल 2012 की हिंसा। इतिहास में जाएं तो, 1972 का मथुरा बलात्कार केस जैसी घटनाएं पितृसत्तात्मक समाज की उस थोथी और संकीर्ण मानसिकता को उजागर करती है जिसकी सीख हमारे सामाजिक, राजनीतिक और भौगोलिक दायरे में घरों और स्कूलों से ही शुरू हो जाती है।  

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भारत में बलात्कार महिलाओं के खिलाफ न सिर्फ सबसे आम अपराधों में से एक है बल्कि कम रिपोर्ट किया जाने वाला अपराध भी है। पितृसत्ता से जन्मे स्त्रीद्वेष और महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक या भौगोलिक परिस्थितियों के कारण, बलात्कार की घटनाएं विभिन्न सामाजिक ढांचे में होती पाई गई हैं। परिणामस्वरूप, बलात्कार के लिए अलग-अलग वर्गीकरण भी है। लेकिन इनके बावजूद, ‘वैवाहिक बलात्कार’ को अभी तक भारतीय कानून प्रणाली ने मान्यता नहीं दी है। पिछले मामले के साथ, अदालत एक दूसरी महिला द्वारा बलात्कार के आरोपी व्यक्ति के दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए वैवाहिक बलात्कार के मामले को नकार दिया। चीफ जस्टिस बोबडे ने सहमति दी कि शादी के झूठे वादे करना गलत है। उन्होंने आगे कहा कि यदि कोई दंपति एक साथ पति और पत्नी के रूप में रह रहा है, तो पति एक क्रूर पुरुष हो सकता है लेकिन कानूनी तौर पर विवाह कर चुके एक स्त्री और पुरुष के बीच यौन संबंध को क्या बलात्कार कहा जा सकता है।

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एक ओर यह पूरी सुनवाई विवाह को बलात्कार के लाइसेंस के रूप में स्वीकृति देती है। दूसरी ओर, यह महिलाओं को एक व्यक्ति विशेष के रूप में न देख कर, वस्तु के रूप में देखती है जिसकी देखभाल का बोझ उसके पिता या पति पर होता है। साथ ही, यह प्रत्यक्ष तरीके से उसके शारीरिक और मानसिक गरिमा और भावना की अवहेलना करती है। ऐसे फैसले विवाह जैसे सामाजिक संस्थान के दूसरे नकारात्मक पक्षों को भी उजागर करती है जो पहले से ही दहेज-प्रथा या कन्यादान जैसे पितृसत्तात्मक नियमों पर चलती है। पितृसत्ता से जन्मी इस पुरुष अहम और वर्चस्व की जड़ें कितनी व्यापक और गहरी है, इसका अंदाजा हम उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के बलात्कार को लेकर एक रैली में दिए गए ‘लड़कों से गलती हो जाती है’ के बयान से समझ सकते हैं।

पिछले दिनों बॉम्बे हाई कोर्ट की जज जस्टिस पुष्पा गनेदीवाला के फैसले ने भी हमारे कानून व्यवस्था पर कई सवाल उठाए थे। जाहिर है कि जिस समाज में ‘सरवाईवर’ को ही सवालों के घेरे में खड़ा किया जाए, वहाँ ऐसे फैसले महिलाओं की चुप्पी का कारण बन सकते हैं। साथ ही, ये उन महिलाओं के लिए बहुत बड़ी बाधा का कारण बन सकती है, जो न्याय मांगने की हिम्मत जुटा पा रही है। जिस न्यायिक व्यवस्था ने सर्वाइवर महिलाओं को आगे आने के लिए प्रोत्साहन के बजाए हीन दिखाने का जिम्मा ले लिया हो और यह साबित हो जाए कि उनके आरोप ‘असंभव’ हैं, वहां लैंगिक असमानता में ही नहीं, महिलाओं के अपराधों में भी वृद्धि हो सकती है। जरूरी है कि महिलाओं को कानून व्यवस्था से न्याय मिले। उन्हें दूसरे दर्जे का नागरिक न माना जाए और समान अधिकार मिले।  

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तस्वीर साभार : गूगल

कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से हिंदी में बी ए और पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद बतौर पत्रकार और शिक्षिका मैंने लम्बे समय तक काम किया है। बिहार और बंगाल के विभिन्न क्षेत्र में पले-बढ़े होने के कारण सामाजिक रूढ़िवाद, धार्मिक कट्टरपन्त, अंधविश्वास, लैंगिक और शैक्षिक असमानता जैसे कई मुद्दों को बारीकी से जान पायी हूँ। समावेशी नारीवादी विचारधारा की समर्थक, लैंगिक एवं शैक्षिक समानता ऐसे मुद्दें हैं जिनके लिए मैं निरंतर प्रयासरत हूँ।

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