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आज कोरोना महामारी ने हमें अनिश्चितता में जीना सीखा दिया है। इस महामारी ने समाज की असमानताओं को हमारे समक्ष स्पष्ट और गति को तीव्र कर दिया है। सदियों से समाज ने महिलाओं और हाशिए पर रह रहे समुदाय से भेदभाव करने के लिए किसी महामारी का इंतज़ार नहीं किया है। वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम या ऑक्सफैम इंडिया जैसी संस्थाओं की रिपोर्ट को माने तो भारत में हर तरह की असमानताएं नए चरम पर पहुंच रही हैं। आय और धन की असमानता में वृद्धि अमीर और गरीब, पुरुषों और महिलाओं के बीच के अंतर को और बढ़ा रही है। राजनीति, अर्थनीति, शिक्षा या व्यापार जैसे क्षेत्र में महिलाओं का प्रतिनिधित्व ना होना या बराबरी का दर्ज ना मिलना, लैंगिक असमानता को और भी मजबूत कर रहा है। यह उनके अधिकारों की प्रगति को सीमित कर रहा है। ये असमानताएं जहां हमारे समाज को गुटों में बांट देती है, वहीं लोकतंत्र को भी खतरे में ला खड़ा करती है लेकिन ये असमानताएं अनिवार्य नहीं है। यह मूल रूप से सरकारों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों द्वारा बनाई गई नीतिगत फैसलों और हमारी संकीर्ण मानसिकता का सामाजिक और राजनीतिक परिणाम है। इन्हीं असमानताओं में से एक है वेतन में जेंडर के आधार पर होने वाला भेदभाव यानि जेंडर पे गैप।

साल 2020 में ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट के अनुसार भारत साल 2018 के 108वें पायदान से 112वें पर आ गया है। यह रिपोर्ट बताती है कि विश्व में राजनीतिक, आर्थिक, स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में व्याप्त लैंगिक असमानताओं को खत्म करने में 100 साल तक लग सकते हैं। आर्थिक भागीदारी और अवसर के मामले में भी महिलाओं की सहभागिता अपेक्षाकृत कम है। 15-64 साल के 78 प्रतिशत वयस्क पुरुष किसी ना किसी रूप में कार्यरत हैं। वहीं, महिलाएं 55 प्रतिशत पर पिछड़ती नज़र आ रही हैं। महिलाओं के लिए आर्थिक अवसरों की बात करें तो भारत 35.4 प्रतिशत के साथ दुनिया के सबसे पिछड़े देशों में से एक है। समान काम के लिए महिलाओं और पुरुषों में वेतन की समानता की बात करें तो भारत 117वें स्थान पर है। अवैतनिक कामों/ अनपेड केयर वर्क में महिलाओं का पुरुषों की तुलना में हमेशा ही अधिक योगदान रहा है लेकिन वैतनिक कामों में लिंग के आधार पर भेदभाव होने से महिलाओं की आर्थिक स्वाधीनता दायरे में बंध जाती हैं। यह प्रवृत्ति केवल अकुशल श्रमिकों में ही नहीं, बॉलीवुड से लेकर कॉरपोरेट दुनिया और खेल के मैदान तक अपने पांव पसारे हुए है। भारत में लैंगिक असमानता बहुआयामी है। यहां धन, आय, उसकी खपत, सामाजिक और क्षेत्रीय भेदभाव के आधार पर अवसर में भिन्नता और असमानताओं का विकृत रूप देखने को मिलता है।

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भारतीय श्रम बाजार में लिंग आधारित भेदभाव प्रमुख हैं और यह विभिन्न क्षेत्रों में लागू होते हैं। रोजगार के क्षेत्र में शहरी या ग्रामीण, कुशल या अकुशल सभी स्तरों पर समान काम के लिए पुरुषों की तुलना में महिलाओं को कम वेतन दिया जाता है। ऑक्सफैम इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार साल 2011-12 में महिलाओं को औसतन समान कार्य करने के लिए पुरुष श्रमिकों के जैसी योग्यता होने के बावजूद उनकी तुलना में 34 प्रतिशत कम भुगतान किया गया। नैशनल सैंपल सर्वे ऑर्गनाइज़ेशन (एनएसएसओ) की साल 2011-12 के रिपोर्ट अनुसार नियमित कामों के लिए ग्रामीण क्षेत्र में पुरुषों को 324 रुपये मिलते हैं। वहीं, महिलाओं की आय 201 रुपए है। यह अंतर शहरी क्षेत्र के लिए 105 रुपयों का है। यानी जहां पुरुष 470 रुपए कमाते हैं वहीं महिलाएं 365 रुपए कमा पाती हैं। आकस्मिक कामों के लिए शहरी क्षेत्र में यह अंतर 72 रुपए और ग्रामीण इलाकों में 47 रुपए का अंतर पाया गया। लेकिन यह अंतर सिर्फ लिंग आधारित नहीं बल्कि आयु, सामाजिक समूह, धर्म, शिक्षा, उद्योग, उद्योग के प्रकार, शहर और राज्य के सामाजिक और राजनीतिक नीतियों और माहौल से भी प्रभावित होते हैं।

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भारत में जातिवाद जैसी सामाजिक कुप्रथा के कारण भी श्रम बाजार में भेदभाव होता देखा गया है। सामाजिक रूप से वंचित समूह जैसे अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों को सदियों से इसका सामना करना पड़ रहा है। साल 2011-12 की एनएसएसओ की रिपोर्ट कहती है कि शहरी क्षेत्र की ओबीसी, एससी, एसटी महिलाएं अन्य जाति की तुलना में 279 रुपए तक कम कमाती हैं। वहीं ग्रामीण ओबीसी, एससी, एसटी महिलाओं के लिए यह अंतर 103 रुपए तक पाया गया। द क्विन्ट की साल 2018 की एक रिपोर्ट के अनुसार भारतीय क्रिकेट खिलाड़ियों की सर्वोच्च श्रेणी ए+ के अनुसार महिला क्रिकेट टीम की कप्तान मिताली राज 50 लाख प्रति वर्ष कमा रही थीं जबकि उसी श्रेणी में पुरुष क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली की वार्षिक आय 7 करोड़ रुपए थी। बोर्ड ऑफ कंट्रोल फॉर क्रिकेट इन इंडिया (बीसीसीआई) ने उस वर्ष पुरुषों के लिए जहां 7, 5, 3 और 1 करोड़ रुपए आय का स्लैब बनाया वहीं महिलाओं के लिए स्लैब को बढ़ाकर मात्र 50, 30 और 10 लाख किया। बॉलीवुड सितारों की बात करें तो यहां भी लिंग आधारित वेतन में अंतर का प्रचलन है। औपचारिक वेतन के अलावा, पुरुष खिलाड़ी और अभिनेता विज्ञापन या अभियानों के माध्यम से महिलाओं की तुलना में कहीं अधिक रोज़गार करते हैं।

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हमारे देश में लिंग आधारित वेतन में अंतर के पीछे कई कारण जिम्मेदार हैं। सामाजिक-सांस्कृतिक कट्टरपंथी के अंतर्गत पुरुषों को नेतृत्व या ऊंचे पदों पर बढ़ावा देने का चलन, पिताओं की गैर-मौजूदगी में कामकाजी महिलाओं का लंबा मातृत्व अवकाश लेना या परिवार के सदस्यों के लिए समर्पित छुट्टी लेना, उच्च शिक्षा में लड़कियों का ड्रॉपआउट, महिलाओं पर नौकरी के समय और स्वरूप की पाबंदी, महिलाओं का अवैतनिक कामों / अनपेड केयर वर्क में कहीं अधिक योगदान जैसे कारण वैतनिक अंतर को बढ़ावा देते हैं और पुरुषों को सहज तरीके से अधिक कमाऊ विकल्प साबित कर देते हैं। मार्च 2019 में प्रकाशित मॉन्स्टर सैलरी इंडेक्स की रिपोर्ट अनुसार, देश में साल 2016 में पुरुषों ने महिलाओं की तुलना में 24.9 प्रतिशत अधिक कमाया। साल 2017 में यह प्रवृत्ति 20 प्रतिशत थी लेकिन साल 2018 में यह फिर से बढ़कर 22.5 प्रतिशत हो गई। साल 2018 में इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइज़ेशन (आईएलओ) पर एनएसएसओ के आंकड़ों पर आधारित रिपोर्ट में इस बात पर प्रकाश डाला गया कि भारत में सभी व्यवसायों में समान काम के लिए महिलाओं और पुरुषों के वेतन में अंतर का चलन है।

आश्चर्य की बात तो यह है कि भारत में समान पारिश्रमिक अधिनियम 1976 के तहत समान कार्य के लिए समान वेतन का कानून मौजूद है। इस कानून के अंतर्गत नियोक्ता का समान कार्य के लिए पुरुष और महिला श्रमिकों को समान पारिश्रमिक का भुगतान करना उसका कर्तव्य है। लेकिन महज कानून के होने भर से उसका लागू होना सुनिश्चित नहीं होता। हालांकि आज सभी विश्व संगठनों और नीति निर्माताओं का मानना है कि इस असमानता को कम करने के लिए ठोस कदम उठाए जा सकते हैं। निश्चित रूप से इस दिशा में प्रगति के लिए ज़रूरी है कि हम हमारी मानसिकता में बदलाव लाएं। राजनीतिक और सामाजिक नीतियों का समावेशी और सुसंचालित होना लैंगिक असमानता को मिटाने में एक अहम भूमिका निभा सकते हैं। महिलाओं के लिए सुरक्षित कार्यस्थल, समान अवसर, कृषक महिलाओं के ज़मीन पर मालिकाना अधिकार, खेतिहर मज़दूर महिलाओं को भारतीय श्रम बाजार में मान्यता, पुरुषों का घरेलू कामों में समान योगदान जैसी शर्तें लैंगिक असमानता और वेतन में अंतर को मिटाने में सहायक बन सकती हैं।

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तस्वीर साभार : Forbes

कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से हिंदी में बी ए और पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद बतौर पत्रकार और शिक्षिका मैंने लम्बे समय तक काम किया है। बिहार और बंगाल के विभिन्न क्षेत्र में पले-बढ़े होने के कारण सामाजिक रूढ़िवाद, धार्मिक कट्टरपन्त, अंधविश्वास, लैंगिक और शैक्षिक असमानता जैसे कई मुद्दों को बारीकी से जान पायी हूँ। समावेशी नारीवादी विचारधारा की समर्थक, लैंगिक एवं शैक्षिक समानता ऐसे मुद्दें हैं जिनके लिए मैं निरंतर प्रयासरत हूँ।

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