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भारत में कुछ सालों पहले तक भी आमतौर पर रेप या बलात्कार जैसे शब्दों का इस्तेमाल या घटनाओं की चर्चा घर के ड्रॉइंग रूम में करना माना था पर आज हम उस मानसिकता को पीछे छोड़ इतना आगे बढ़ चुके हैं कि अब रेप जैसे अपराधों पर जोक्स बनने लगे हैं। भारत-पाकिस्तान का क्रिकेट मैच हो या ब्राजील और जर्मनी का फीफा वर्ल्ड कप का मैच, बॉलीवुड सिनेमा हो या सलमान खान जैसे अभिनेता का बयान, लोगों का रेप जैसे अपराध का सामान्यीकरण और मज़ाक में बदलना, इस गंभीर समस्या को हल्के में लेना, इस पर चुटकुला बनाना और उसका प्रचार करना, संवेदनहीन, गैरजिम्मेदार और संकीर्ण मानसिकता को दर्शाता है। ऐसे रेप जोक्स में ‘रेप’ शब्द को कभी किसी की जीत तो कभी किसी का प्रभुत्व, कभी विरोधी को मजा चखाने, कभी अपनी मानसिक और शारीरिक अवस्था बताने या कभी सिर्फ मन बहलाने के लिए महिलाओं पर सीधा-सादा मज़ाक के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है।      

साल 2009 में बनाई गई फिल्म थ्री ईडियट्स के चतुर के कॉलेज समारोह में दिए गए भाषण को याद कीजिए। यहां बलात्कार शब्द से ऐसे वाक्य बनाए और प्रस्तुत किए गए जो एक बढ़िया हास्य दृश्य बन गया। यहां ध्यान देने वाली बात है कि शब्दों का हेरफेर उस जमात के सबसे होनहार छात्र और फिल्म के मुख्य नायक करते हैं। फिल्म में सभी को इस बात का मजा लेते हुए दिखाया गया था। महिलाओं की गरिमा पर चोट करना और उन्हें एक वस्तु के रूप में प्रस्तुत करना हमारे समाज के लिए आसान, सुविधाजनक और हास्य दृश्य रचने का ब्रह्मास्त्र है। यह दुख की बात है कि ऐसे चुटकुलों का सिर्फ इस तर्ज पर विरोध नहीं किया जाता कि ये सिर्फ मजाक ही तो है। किसी भी रेप सर्वाइवर का उस घटना से आजीवन मानसिक और भावनात्मक घाव रह जाते हैं। अक्सर सर्वाइवर का उस हादसे को भूलकर आगे बढ़ना बहुत कठिन होता है। बॉलीवुड ने हमेशा से ही रेप जैसे विषय को कभी प्यार, कभी मज़ाक और कभी प्रतिशोध से जोड़ा है। जिस समाज ने पहले से ही पुरुषों को सिर्फ उनके जेंडर के आधार पर श्रेष्ठ घोषित कर दिया हो, वहां ऐसे चुटकुलों का चलन बन जाना, पितृसत्ता को बढ़ावा और महत्व देना है। भारतीय सभ्यता और संस्कृति की डींग हांकने वाले लोगों को रेप जोक्स के प्रचलन से कोई नुकसान नज़र नहीं आता। समाज में इन्हें विशेषाधिकार अनिवार्य रूप से प्राप्त है और अपना सत्ता और प्रभुत्व को त्यागना इन्हें मंजूर नहीं। 

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किसी भी कॉलेज या ऑफिस ग्रुप के व्हाट्सअप चैट को अगर देखें तो औरतों के शरीर, पहनावा, उठना-बैठना या किसी अश्लील गाने को औरत के शारीरिक बनावट से जोड़कर कोई मीम या सेक्सिस्ट जोक्स आसानी से मिल जाएगा। यह हमारी तथाकथित नई, आधुनिक और तेज-तर्रार मानसिकता का ही परिणाम है कि ना तो ऐसे चुटकुले लोगों को गलत लगते हैं और ना ही वे इसे प्रचार करने से पीछे हटते हैं। शायद ऐसी मानसिकता से पनपती सहनशीलता के कारण ही पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के पिछले दिनों चोटिल होने के बाद भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष उन्हें पैर की चोट दिखाने के कारण साड़ी छोड़कर ‘बरमूडा’ पहनने जैसी सलाह खुले आम दे पाए। हर तबके का रंगमंच और सिनेमा तक पहुंच और जुड़ाव होने और इनका बलात्कार को महत्वहीन और हास्य सामग्री बनाकर प्रस्तुत किए जाने के करण आम जनता का पितृसत्तात्मक स्वभाव अधिक मज़बूत हुआ है। नेताओं का जब तब महिला विरोधी बयान और रेप के लिए महिलाओं के पहनावे और चाल-चलन को दोष देना भी ऐसी सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश रचे जाने का एक दुष्परिणाम है।

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भारतीय सभ्यता और संस्कृति की डींग हांकने वाले लोगों को रेप जोक्स के प्रचलन से कोई नुकसान नज़र नहीं आता। समाज में इन्हें विशेषाधिकार अनिवार्य रूप से प्राप्त है और अपना सत्ता और प्रभुत्व को त्यागना इन्हें मंजूर नहीं। 

ये कोई पहली बार नहीं कि ऐसे चुटकुलों का प्रचार हो रहा हो। किसी हास्य दृश्य की भूमिका रचने या प्रस्तुत करने के लिए महिला के शारीरिक बनावट और बौद्धिक प्रतिभा पर निशाना साधना पुरानी तरकीब है। यौन हिंसा की बढ़ती घटनाओं पर जनता की नाराजगी के बावजूद यह चौंकाने वाली बात है कि हमारे समाज में बलात्कार पर चुटकुले आम हो चुके हैं। ऐसे कई लोग हैं जो बलात्कार की घटनाओं की निंदा तो करते हैं लेकिन उन्हें दैनिक जीवन में इन चुटकुलों के मज़ाक में लिप्त होने में कोई बुराई नहीं दिखती। साल 2018 कान फिल्म समारोह में अभिनेता जिम सराभ का एक वीडियो सामने आया था जहां वे ऐसी ही एक बेसिरपैर मजाक करते हुए दिखाई दिए थे। हैरानी की बात थी कि अभिनेत्री कंगना रनौत सहित सभी लोग बिना किसी झिझक के इस मजाक में उनका साथ दी। इस घटना के बाद कुछ लोगों ने जमकर कंगना पर अपना गुस्सा निकाला और उन पर नारीवादी होने का ढोंग करने का आरोप लगाया। वहीं जिम के विरुद्ध भी सोशल मीडिया पर नाराजगी दिखाई दी। फर्स्टपोस्ट के रिपोर्ट अनुसार सारभ ने अपने बचाव में यह दलील दी कि उन्होंने यह मजाक किसी दूसरे संदर्भ में किया था जिसे दूसरे परिप्रेक्ष्य से जोड़ा गया। उन्होंने आगे कहा था कि यौन हिंसा एक गंभीर मुद्दा है और वे इसे गंभीरता से लेते हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण था कि उनकी टिप्पणियों को संदर्भ से बाहर समझा गया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया था कि वे यौन हिंसा को बर्दाश्त नहीं करते और यह किसी भी स्थिति में निंदनीय है।

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हालांकि बतौर महिला ये बात आज तक मेरी समझ से परे है कि रेप जोक्स का सामान्यीकरण ना करने के लिए नारीवादी होना अनिवार्य क्यों है। किसी भी सभ्य और प्रगतिशील समाज में व्यक्ति के लिंग को आधार बनाकर, विशेष कर महिलाओं पर भद्दे मज़ाक का विरोध करने के लिए नारीवादी होना आवश्यक नहीं है। किसी भी परिप्रेक्ष्य में रेप जोक्स का मजाक के लिए इस्तेमाल जायज़ नहीं है। ऐसे लोग जो इन चुटकुलों का विरोध करते हैं, उन्हें ‘अन्कूल’ कहा जाना भी निंदनीय है। बात करते हैं क्रिकेट की जो खेल के मैदान की सीमा से निकलकर भारतीयों के लिए सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक मुद्दा बन गई है। साल 2017 की चैम्पियन्स ट्रॉफी में भारत के पाकिस्तान पर जीत के बाद ट्विटर पर ‘इंडिया रेप्ड पाकिस्तान’ का बोलबाला रहा। रेप जोक्स साधारणतः पुरुषत्व और मर्दानगी को इंगित करते हैं और पुरुषों का अपना वर्चस्व दिखाने की मानसिकता भी इन चुटकुलों में उजागर होती है। कुछ दिनों पहले अभिनेता सलमान खान ने फिल्म सुल्तान की शूटिंग में कर रहे मेहनत का ब्योरा देते हुए कहा था कि उन्हें लग रहा है कि किसी ने उनका रेप कर दिया है।   

अमरीका और कनाडा जैसे देशों में बहुत पहले से ही स्टैन्डअप कॉमेडी जैसे छोटे मंचों पर, चुटकुलों के नाम पर ‘रेप’ शब्द या ‘रेप के दृश्य’ का मजाक का प्रचलन हो चुका था। स्टैन्ड-अप कॉमेडी का मंच एक ऐसी जगह है जहां आमतौर पर कई टैबू माने जाने वाले मुद्दों को उठाया जाता रहा है। शायद इसलिए ‘रेप’ जैसे गंभीर अपराध को मज़ाक के रूप में पेश करना सामान्य मान लिया गया। साल 2012 में, स्टैंड-अप कॉमेडियन डैनियल तोश ने अपने एक स्टैन्ड-अप एक्ट के दौरान रेप जोक्स के हास्यरस को बताने की कोशिश की थी और कहा था कि रेप को चुटकुलों के एक अवधारणा के रूप में इस्तेमाल करने से वह मजेदार हो सकते हैं। उनके इस कथन पर एक महिला दर्शक ने विरोध करते हुए कहा था कि ‘बलात्कार के चुटकुले कभी मजेदार नहीं होते है!’ कॉमेडियन तोश ने उन्हें इस पर जवाब दिया कि ‘क्या यह मजेदार नहीं होगा अगर इस महिला को अभी इसी वक्त पांच लोग बलात्कार करे।’ गनीमत थी कि उनके इस बयान का भी काफी विरोध हुआ और आखिरकार उन्हें माफी भी मांगनी पड़ी थी।

लेकिन किसी अभिनेता या कलाकार के महज माफी मांग लेने से समस्या का निदान नहीं हो सकता। जिस समाज में सर्वाइवर पर दोषारोप करने की प्रथा हो, वहां रेप जैसे संगीन अपराध को तुच्छ मानना, विषय को गंभीरता से ना लेना, इस पर चुटकुले करना या जो इनका विरोध करते हैं उन्हें नीचा दिखाना अपने आप में एक अपराध है। किसी भी पृष्ठभूमि में रेप जोक्स सिर्फ ‘जोक्स’ नहीं हो सकते। एक ओर जहां आज भी महिलाओं को #MeToo जैसे आंदोलन के माध्यम से अपनी लड़ाई लड़नी रही है। वहीं ऐसे चुटकुलों का हमारे जीवन में जगह बना लेना दुर्भाग्यपूर्ण, खतरनाक और नुकसानदेह है। निश्चित ही पितृसत्तात्मक समाज का अपने मानसिक या शारीरिक स्थिति, मस्ती या मजाक के लिए रेप जोक्स या महिला विरोधी बयानबाजी को रोकना गैर समझौतापूर्ण है।

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तस्वीर : श्रेया टिंगल फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए

कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से हिंदी में बी ए और पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद बतौर पत्रकार और शिक्षिका मैंने लम्बे समय तक काम किया है। बिहार और बंगाल के विभिन्न क्षेत्र में पले-बढ़े होने के कारण सामाजिक रूढ़िवाद, धार्मिक कट्टरपन्त, अंधविश्वास, लैंगिक और शैक्षिक असमानता जैसे कई मुद्दों को बारीकी से जान पायी हूँ। समावेशी नारीवादी विचारधारा की समर्थक, लैंगिक एवं शैक्षिक समानता ऐसे मुद्दें हैं जिनके लिए मैं निरंतर प्रयासरत हूँ।

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