इंटरसेक्शनलजेंडर गरीब महिलाओं के लिए आज भी कोसों दूर है विकास की व्यवस्थाएँ

गरीब महिलाओं के लिए आज भी कोसों दूर है विकास की व्यवस्थाएँ

जब तक महिलाओं को लेकर समाज का नज़रिया और परवरिश के तरीक़े पर काम नहीं किया जाएगा तब तक हर सुविधाओं और व्यवस्थाओं से उनकी दूरी कोसों की होगी।

महिलाओं को लेकर अक्सर लोग कहते है कि अब महिलाएँ बहुत सशक्त हो गयी हैं। उन्हें हर क्षेत्र में अवसर दिया जा रहा है और सरकार की तरफ़ से भी महिलाओं को आगे बढ़ाया जा रहा है। बेशक अब अलग-अलग माध्यमों में महिला-उत्थान के लिए काम किए जा रहे हैं, लेकिन अभी भी महिलाओं की इन अवसरों तक पहुँच का रास्ता उनके लिए बेहद दूर है। ख़ासकर वो महिलाएँ जो ग्रामीण क्षेत्रों में गरीब परिवारों से ताल्लुक़ रखती है, जिनके लिए गाँव के पास के स्कूलों तक जाने की दूरी भी मीलों से कम नहीं है और जहां वो आज तक पहुँच नहीं पायी। क्योंकि यहाँ समस्या व्यवस्था की नहीं बल्कि सोच की है। वो सोच जो महिलाओं को सिर्फ़ बोझ मानती है और उनको बेहतर जीवन के लिए तैयार करने हेतु शिक्षा और रोज़गार के अवसर से जोड़ने की कल्पना अभी भी कोसों दूर है।

मैं तब एक साल की थी जब मेरे परिवारवालों ने ग़रीबी के चलते मुझे मेरे मामा के घर भेज दिया गया। मामा के घर ही स्कूल तक मेरी पढ़ाई पूरी हुई। पाँच बेटियों के परिवारवाले गरीब परिवार में बेटियाँ सिर्फ़ बोझ मानी जाती है, जिनको परिवार किसी भी हाल में किसी तरह से टालना चाहता है। मेरे साथ भी समाज के उसी दस्तूर के अनुसार बचपन से दूसरे के घर में टाल दिया गया और उस घर में बारहवीं तक पढ़ाई करवाकर मेरी शादी करवा दी गयी। ससुराल जाने के बाद उसी आर्थिक तंगी और अभाव का सामना करना पड़ा। तीन भाइयों के परिवार में समय के साथ तनाव बढ़ता चला गया और एकदिन तीनों भाई अलग हो गए। मेरे पति ने मुंबई में रिक्शा चलाना शुरू किया, लेकिन उस कमाई से दो बच्चों की पढ़ाई और उनके पालन पोषण का काम एक बड़ी चुनौती बनता गया।

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बचपन से लेकर अब तक हर संघर्ष में मैंने इन दिक़्क़तों से निकलने की कोशिश की, लेकिन हर बार मेरे बढ़ते कदम कभी परिवार तो कभी इज़्ज़त, ग़रीबी और परिवार दबाव से चलते रोके गये। कोरोना महामारी ने मेरे परिवार को जैसे एक सदी और पीछे धकेल दिया। इस दौरान पूरे परिवार ने आर्थिक तंगी का भयानक रूप देखा, जब शिक्षा-सुविधा तो दूर दो वक्त की रोटी भी हमलोगों के लिए बड़ी चुनौती बन गयी। आख़िरकार मैंने काम करने का फ़ैसला किया और एक स्वयंसेवी संस्था के साथ जुड़कर धीरे-धीरे काम की शुरुआत की।

वो सोच जो महिलाओं को सिर्फ़ बोझ मानती है और उनको बेहतर जीवन के लिए तैयार करने हेतु शिक्षा और रोज़गार के अवसर से जोड़ने की कल्पना अभी भी कोसों दूर है।

आज मैं गाँव-गाँव जाकर अपनी जैसी महिलाओं को आगे बढ़ाने, पैसों की बचत करने और रोज़गार की दिशा में अपने कदम बढ़ाने के लिए प्रेरित कर रही हूँ। क्योंकि वास्तविकता यही है कि आज भी गाँव में रहने वाले गरीब-मज़दूर परिवार में बच्चे खासकर लड़कियों का पालन-पोषण इस तरह किया जाता है कि वो अपना अस्तित्व रसोई, बिस्तर और विकट स्थिति में मज़दूरी के काम से ज़्यादा न देख सके। आज जब मैं अलग-अलग गाँव की किशोरियों के मिलती हूँ तो उनकी सोच भी वैसी ही पाती है, जैसी मेरी उस उम्र में हुआ करती थी। न ज़िंदगी से कोई चाह और न परिवार से। उनका दिमाग़ रसोई में चूल्हे की जगह के जैसा सेट कर दिया जाता है, जिन्हें किसी दिशा की तरफ़ बढ़ने के प्रेरित करने से पहले उन्हें ये एहसास दिलाना होता है कि वो ज़िंदा इंसान है और उन्हें भी बेहतर ज़िंदगी जीने का समान अधिकार है।

कुल मिलाकर कहने का मतलब ये है कि तमाम संस्थाएँ, योजनाएँ या सरकार लोगों के घर की दहलीज़ तक महिला-उत्थान या सशक्तिकरण का कार्यक्रम लेकर पहुँच जाएँ, जब तक महिलाओं को लेकर समाज का नज़रिया, उनकी सोच और परवरिश के तरीक़े पर काम नहीं किया जाएगा तब तक हर सुविधाओं और व्यवस्थाओं से उनकी दूरी मीलों की होगी। मैंने खुद इस सोच को जिया है, जिसके चलते मैं कभी आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं कर पायी। ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा मैंने उसी तरह घसीटा, जैसे अपने परिवार की औरतों को घसीटते देखा। लेकिन तमाम दिक़्क़तों के बाद आज जब बाहर काम के लिए निकली हूँ तो सशक्त होने मायने धीरे-धीरे समझ आने लगे है। अब किसी की बेटी, बहु या पत्नी के नाम की बजाय जब लोग मुझे मेरे नाम से जानते और पुकारते हैं तो ये मुझे बेहद ताक़त देता है और हर पल, हर बार मेरे अपने अस्तित्व की याद दिलाता है, जिसका एहसास मुझे इससे पहले कभी नहीं हुआ। पर ऐसा नहीं कि घर की दहलीज़ से बाहर कदम निकालना मेरे लिए आसान रहा, वो मेरे लिए दोहरा संघर्ष है जो आज भी लगातार जारी है, लेकिन उसकी बात अगले लेख में साझा करूँगीं।

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तस्वीर साभार : qz.com

About the author(s)

रेनू वाराणसी ज़िले के रूपापुर गाँव की रहने वाली है। ग्रामीण महिलाओं और किशोरियों के साथ समुदाय स्तर पर रेनू बतौर सामाजिक कार्यकर्ता काम भी करती हैं और अपने अनुभवों व गाँव में हाशिएबद्ध समुदाय से जुड़ी समस्याओं को लेखन के ज़रिए उजागर करना इन्हें बेहद पसंद है।

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