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ममता बनर्जी और उनकी पार्टी टीएमसी पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में लगातार तीसरी बार विजेता बनकर उभरी है। इससे यही समझ में आता है कि आज राजनीतिक क्षेत्र में महिलाओं का हस्तक्षेप पहले के मुकाबले बेहतर हो चला है। ममता बनर्जी के नेतृत्व में लगातार तीसरी बार पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की सरकार बनने जा रही है। हालांकि, ममता बनर्जी के नेतृत्व में राजनीति के क्षेत्र में महिलाओं के लिए कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है। इस साल भी पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में 40 महिला उम्मीदवारों ने जीत हासिल की है जो साल 2016 जितनी ही है। बहरहाल यह कहना झूठ होगा कि महिलाएं राजनीति में अपनी भागीदारी नहीं दर्ज करवा रही हैं। सच्चाई यह है कि महिलाओं का राजनीति में उतरना समाज को अभी भी एक आश्चर्यजनक कदम लगता है। लैंगिक भेदभाव पितृसत्तात्मक समाज के नसों में दौड़ रहा है जो महिला राजनेताओं के जीवन को कठिन बना देता है।

कई सालों से महिलाओं की तरक्की विश्व के सभी राष्ट्रीय सांसदों में देखी जा रही है लेकिन दुनियाभर की संसदों में महिलाओं का कुल प्रतिनिधित्व आज भी तीस प्रतिशत से भी नीचे है। वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम का मानना है कि राजनीति के क्षेत्र में लैंगिक समानता हासिल करने में अभी 145 साल और लग जाएंगे। कारण है कि लैंगिक समानता को कम करने का मौजूदा दर बहुत धीमा है। इस असमानता को कम से कम पचास प्रतिशत तक लाने के लिए और महिलाओं को सशक्त करने के लिए अनेक कदम उठाए जा रहे हैं, महिलाओं के लिए स्थिति अनुकूल बनाई जा रही है लेकिन ये सब एक दिखावा ही तो है। उदाहरण के तौर पर, जर्मनी की चांसलर एंजेला मरकल ने चार बार जीत हासिल की है, लेकिन वही उनके अलावा क्या हम किसी और जर्मनी की महिला नेता के बारे में कोई चर्चा होती सुनते हैं। इतना ही नहीं, चार बार जीत दर्ज करने के बावजूद आज भी एंजेला मरकल के ‘हील्स’ चर्चा का विषय रहते हैं।

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पूरे विश्व में महिला और पुरुष राजनेताओं के अनुभव अलग होते हैं। महिला राजनेताओं से अपेक्षा की जाती है कि वे घर और राजनीति एक साथ संभालें। मतदाताओं को राजनीति में आनेवाली महिलाओं को अपना ‘नारीत्व’ गंवाते देख बुरा लगता है। याद रखिए कि ये मतदाता भी वही हैं जो पितृसत्ता में विश्वास रखते हैं। जब राजनीति में महिलाएं दिलेर बनती हैं, घोषणाएं करती हैं तो उनके प्रति इन्हीं मतदाताओं का व्यवहार अलग होता है, वहीं राजनीति में पुरुषों का दिलेर होना तारीफ़ के काबिल होता है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तो यहां तक दावा करते हैं कि यदि पुरुष महिलाओं के गुण अपनाते हैं तो वे देवता बन जाते हैं, लेकिन जब महिलाएं पुरुषों की तरह गुणों को अपनाती हैं तो वे राक्षस बन जाती हैं।

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पूरे विश्व में महिला और पुरुष राजनेताओं के अनुभव अलग होते हैं। महिला राजनेताओं से अपेक्षा की जाती है कि वे घर और राजनीति एक साथ संभालें। मतदाताओं को राजनीति में आनेवाली महिलाओं को अपना ‘नारीत्व’ गंवाते देख बुरा लगता है।

महिला राजनेताओं से उम्मीद की जाती है कि वे राजनीति के क्षेत्र में भी बिल्कुल उन्हीं पितृसत्तात्मक धारणाओं को मज़बूत करें जिसे समाज तय करता है जबकि महिलाओं का यह रूप राजनीति में उनके जीतने की संभावना को दुर्बल करने की क्षमता रखता है। राजनीति में ज्यादातर स्टीरियोटाइप सिर्फ महिला राजनेताओं के लिए ही हैं। ये पूर्व निर्धारित धारणाएं राजनीति पेशे में आने वाले किसी भी महिला को डरा सकती है। केट मैन ने अपनी पुस्तक डाउन गर्ल: द लॉजिक ऑफ मिसोजिनी में कहा है कि कैसे उन्होंने हिलरी क्लिंटन पर डॉनल्ड ट्रम्प की जीत की भविष्यवाणी की थी। ट्रम्प ‘पितृसत्ता खतरे में है’ के आखिरी उम्मीदवार बने फिरते थे और क्लिंटन उसी पितृसत्ता के लिए खतरा थीं। महिला-विरोधी समाज के लिए क्लिंटन वांछनीय उम्मीदवार बन गई।

भारत के पुरुष राजनेताओं ने महिला-विरोधी बयान देने में महारथ हासिल की है। इस कौशल का इस्तेमाल वे लोग महिलाओं का मज़ाक बनाने में इस्तेमाल कर देते हैं। वे इन बयानों से लोगों को हंसाते हैं और लोग उन्हें वोट भी देते हैं। उनके जुमलों में देश के ज़रूरी मुद्दों को छोड़कर सारी बातें शामिल होती हैं। यह पूरी स्थिति एक दुष्चक्र की तरह है। साथ ही यह स्थिति सिर्फ राजनीति में ही नहीं समाज में हर जगह मौजूद है। राजनीति में उदाहरण की कमी नहीं है और न ऐसे महिला-विरोधी बयान देनेवाले पुरुषों की। ‘जर्सी गाय’ जैसे शब्दों का प्रयोग कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोनिया गांधी के पर एक घिनौनी टिप्पणी की थी। साल 2016 के बंगाल चुनाव पर अमित शाह ने मायावती और ममता बनर्जी पर नोटबंदी के संदर्भ में टिप्पणी करते हुए कहा था कि एक दिन में इन महिला नेताओं के चेहरे का नूर उतर गया है।। इनकी यह बात ममता बैनर्जी और मायावती को उदाहरण स्वरूप रख कर की गई थी। टीएमसी सांसद मिमी चक्रबर्ती और नुसरत जहान को सोशल मीडिया में संसद में पहने गए उनके वेस्टर्न पोशाक को लेकर मज़ाक बनाया गया।

भारत के पुरुष राजनेताओं ने महिला-विरोधी बयान देने में महारथ हासिल की है। इस कौशल का इस्तेमाल वे लोग महिलाओं का मज़ाक बनाने में इस्तेमाल कर देते हैं। वे इन बयानों से लोगों को हंसाते हैं और लोग उन्हें वोट भी देते हैं।

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शरद यादव ने संसद में महिलाओं पर ‘पर कटी औरतें’ जैसी टिप्पणी करने का साहस किया। स्मृति ईरानी संजय निरुपम के लिए ‘ठुमके लगाने वाली’ ही रह गईं। पुरुषों को लगता है कि उनकी ये बातें राजनीति में आनेवाली महिलाओं के अंदर डर पैदा करती हैं। यदि कोई इन पुरुषों को चुप कराने की हिम्मत कर भी दे, चुप कराने वाले को ही उलटा पहले चुप पहले कर दिया जाता है। इसी लिए अकसर स्थानीय या राज्य स्तर की महिला नेता इन बातों से अपनी नज़रें फेर लेती हैं। इन नेताओं के बयानों की आलोचना करने वालों को तुरंत ‘कैंसल’ कर दिया जाता है। लिंगभेद संसद से लेकर ऑनलाइन प्लैटफॉर्म हर जगह मौजूद है। सोशल मीडिया पर तो महिलाओं को बलात्कार और मौत की धमकी देना कुछ मर्दों की दिनचर्या बन गई है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्था ऐमनेस्टी इंटरनेशनल द्वारा किए गए सर्वेक्षण में यह पता चला था कि अल्पसंख्यक समुदायों की महिलाओं को धमकी मिलने की संभावना कई ज़्यादा होती है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि इन धमकियों ने कई मजबूत आवाजों को खामोश किया है।

पुरुष जिन महिला नेताओं के राजनीतिक करिअर को खत्म नहीं करना चाहते, या उनकी राजनीति से सहमत होते हैं तो उन महिलाओं के नाम के आगे सकारात्मक विशेषण जोड़ देते हैं। जैसे, ‘देश की बेटी’ या ‘झांसी की रानी’ या ‘बहादुर शेरनी।’ ये विशेषण उनकी भूमिकाओं को परिभाषित करता है जबकि एक पुरुष बिना किसी विशेषण के अपने राजनीतिक करियर में आगे बढ़ जाता है। उनको पुरुष ही रहने दिया जाता है, बिना किसी रोक-टोक, बिना किसी पूर्वाग्रह के। महिलाओं को सशक्त करने के लिए सिर्फ एक शक्तिशाली महिला नेता की ज़रूरत नहीं है, बल्कि एक ऐसी सोच और नीति की ज़रूरत है जहां राजनीतिक मंचों से दिए जाने वाले इन बयानों के ख़िलाफ़ सख्त कदम उठाए जा सकें।

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तस्वीर साभार : Feminism In India

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