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जब बंगाल, पुडुचेरी, असम, तमिलनाडु, केरल में चुनाव हो रहे थे तब एक और प्रदेश, उत्तर प्रदेश में ठीक उसी वक़्त पंचायत चुनाव भी हो रहे थे जिनमें उत्तर प्रदेश की क्षेत्रीय पार्टी फिर से उभरकर आई हैं जिससे बीजेपी (जिसकी सीट् अभी भी ज़्यादा हैं), उसे एक झटका तो ज़रूर लगा है। हम इस लेख में आगे पढ़ेंगे पंचायती राज का मौजूदा स्ट्रक्चर, उसमें जाति और जेंडर की पॉलिटिक्स, उससे जुड़ी घटनाएं। इसके अलावा कुछ ऐसी घटनाएं जिन्होंने पंचायत चुनावों में जाति और जेंडर पॉलिटिक्स को चुनौती दी।

पंचायती राज की बात करें तो यह ग्रामीण भारत के स्थानीय स्वशासन की व्यवस्था है जो कि भारत के प्रशासन के इतिहास की सबसे पुरानी व्यवस्थाओं में से एक है। हम जो इसकी मौजूदा आधुनिक शक्ल देखते हैं वह संविधान के 73वें संवैधानिक संशोधन एक्ट 1992 की वजह से है जिसकी पृष्ठभूमिक 64वें संवैधानिक संशोधन बिल से आती है जो 1986 में बनी एल.एम सिंघवी समिति को संवैधानिक प्रारूप देने की कोशिश करता है। यह 1989 में राजीव गांधी के नेतृत्व की सरकार में संविधान सभा में लाया जाता है लेकिन ये बिल राज्य सभा में इस वजह से पारित नहीं हो सका कि बाकी नेताओं को लग रहा था कि इससे राज्य सरकार के अधिकार ग्रामीण सत्ता में कम हो जाएंगे। लेकिन काफ़ी बहसों के बाद 1992 में 73 वें संवैधानिक संशोधन एक्ट के तहत ग्रामीण स्थानीय स्वशासन को संवैधानिक मंजूरी दे दी जाती है। 

73 वें संवैधानिक संशोधन एक्ट 1992 इसे एक्ट के सबसे ज़रूरी हिस्से की बात करें तो इस एक्ट के तहत पंचायती राज व्यवस्था को तीन स्तरीय संरचना में विभाजित किया जाता है। ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत, ब्लॉक स्तर पर पंचायत समिति जिसे मंडल परिषद या ब्लॉक समिति भी कहा जाता है और जिला स्तर पर जिला परिषद। इसके अलावा इस एक्ट के तहत पंचायती राज संस्थाओं में एक तिहाई सीट महिलाओं के लिए आरक्षित होती है। एससी-एसटी के लिए भी उनकी आबादी के अनुसार तीनों स्तर पर सीट्स आरक्षित होती हैं और ये आरक्षण सिर्फ़ पंचायत के आम लोगों तक सीमित नहीं होता बल्कि तीनों स्तर की समितियों में अध्यक्ष पदों पर भी ये आरक्षण लागू होता है। एक तिहाई महिला आरक्षण एससी-एसटी की आरक्षित सीटों पर भी लागू होता है इसका मतलब एक सीट एक महिला जो कि एक दलित भी हो सकती है, उसके लिए आरक्षित होती है यानी एक दलित महिला/ आदिवासी महिला भी सरपंच हो सकती है। साथ ही अगर राज्य चाहे तो बैकवर्ड क्लासेज के लिए भी यही प्रावधान लागू कर सकती है। हम ये देखते हैं कि इस एक्ट के तहत एक ठीक-ठाक संख्या में दलित, आदिवासी – महिला या पुरुष सरपंच बन सकते हैं लेकिन फिर भी मुख्यधारा की राजनीति में ये लोग शामिल नहीं हो पा रहे हैं।

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महिलाएं जब जनरल रिजर्व सीट से लड़कर जीतती हैं तब उनके घर में पुरुष सारा काम देखते हैं तब वहां महिला का सीट एक प्रॉक्सी भर हो जाता है। जब चुनाव को दलित, आदिवासी महिला जीतती हैं, तब वे दोहरी राजनीति का शिकार होती है, पहला उसकी बजाय उसके घर के पुरुष सारा काम देखते हैं दूसरा वे पुरुष सवर्ण पुरुषों के दबाव में काम करते हैं।

भारतीय संविधान के निर्माता बाबा साहेब आंबेडकर मानते थे कि गांव जातीय हिंसा के अड्डे हैं और कहते थे कि गांव क्या हैं? वे स्थानीयता का कूप हैं। अज्ञान, संकीर्णता और सांप्रदायिकता की गुफा हैं। मुझे खुशी है कि संविधान के मसौदे में गांव को नहीं, बल्कि व्यक्ति को इकाई माना गया है। जब हम इस वाक्य को पढ़ते हैं तो पाते हैं कि कुछ हद तक हालात सुधरने के बावजूद मुख्यधारा पॉलिटिक्स में अब तक दलित-आदिवासी-बहुजन, वंचित समुदाय के लोग अपनी जगह नहीं बना पाए हैं या कहें कि उन्हें यह जगह बनाने नहीं दी गई है जो कि बाबा साहब के अनुमान को ठीक-ठाक प्रासंगिकता देती है। हाल में जब उत्तर प्रदेश में पंचायती राज के चुनाव हुए हैं उनमें मेरी रिश्तेदारी में एक व्यक्ति ने सरपंच का चुनाव लड़ा जिसमें वह जीते भी। इसके साथ साथ खुद मैं जहां रहती हूं वहां का चुनाव प्रचार भी देखा। इन सभी प्रचार में जाति और महिला केंद्र बिंदु रहे। 

जिस क्षेत्र में दलित आबादी ज़्यादा थी लेकिन फिर भी संख्या में कम सवर्ण जाति के लोगों का दबदबा ज़्यादा है। यही सवर्ण लोग निश्चित करते हैं कि किस जाति का व्यक्ति अगर सीट रिजर्व में आती है तो खड़ा होगा और अधिकांश ऐसा हुआ है कि जिस दलित जाति को दबाए रखने में वे सक्षम होते हैं उसे रिजर्व यानि आरक्षित सीट पर खड़ा करते हैं जिसमें पैसा सवर्ण ही लगाते हैं। व्यक्ति जीते तो उसका आरक्षित सीट से दलित सरपंच होना सिर्फ़ प्रॉक्सी भर होता है क्योंकि काम से लेकर आर्थिक फैसले या उससे जुड़े काम सब सवर्ण पुरुष देखते हैं। आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक हाशिए पर खड़े वर्ग के लिए संविधान जब उनके प्रतिनिधत्व को बढ़ाने की कोशिश करता है तब तथाकथित ऊंची जाति के लोग अपना वर्चस्व दिखाते हैं इसीलिए जब बाबा साहेब आंबेडकर कहते हैं कि गांव जातीय हिंसा के अड्डे हैं तब ये हिंसा शारीरिक के साथ-साथ राजनीतिक भी है।

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महिलाएं जब जनरल रिजर्व सीट से लड़कर जीतती हैं तब उनके घर में पुरुष सारा काम देखते हैं तब वहां महिला का सीट एक प्रॉक्सी भर हो जाता है। जब चुनाव को दलित, आदिवासी महिला जीतती हैं, तब वे दोहरी राजनीति का शिकार होती है, पहला उसकी बजाय उसके घर के पुरुष सारा काम देखते हैं दूसरा वे पुरुष सवर्ण पुरुषों के दबाव में काम करते हैं। इस बीच एक अनुभव ये और रहा कि मैंने लगातार एक वाक्य सुना, जो था कि ” जो जिसके पैरों में पड़ जाएगा, चुनाव जीत जाएगा।” ये पैर छूना सम्मान की निशानी मानी जाती है, यह इस देश की बहुसंख्यक आबादी यानि हिंदू धर्म की संस्कृति का एक बड़ा हिस्सा भी है और उसका रिफ्लेक्शन भी लेकिन जब तथाकथित ऊंची जाति के व्यक्ति के पैर तथाकथित निचली जाति के लोग छूते हैं तब वह सवर्ण के जाति के ईगो को सेटिस्फाई करने के लिए छुए जाते हैं यानि इसका मतलब है, चुनावों में आरक्षित सीट से खड़ा होने वाला व्यक्ति का अगर उस क्षेत्र के सवर्णों के पैरों में गिर जाएगा तो चुनाव जीत जाएगा।

जब हमारे देश में जातीय हिंसा अभी तक नहीं थमी तो भला पंचायत चुनावों में दलति-बहुजन-आदिवासी समुदाय का प्रतिनिधत्व क्या कोई बड़ा फ़र्क ला सकता है, एक अहम सवाल है। गूगल पर दलित सरपंच सर्च करने पर तमाम वे घटनाएं दिखीं जहां दलित सरपंच को मारा गया, सेक्रेटेरिएट के दफ्तर में नहीं घुसने दिया, मंदिर में एक त्योहार के दिन नारियल फोड़ने पर तथाकथित ऊंची जाति के लोगों ने एक दलित महिला सरपंच और उसके पति को बुरी तरह मारा। ये कुछ खबरे हैं जो पहले पन्ने पर दिखती हैं, इनकी लिस्ट बहुत लंबी है और ऐसी सब घटनाएं बताती हैं कि आजादी के दशकों बाद भी सवर्णों को ये कतई मंज़ूर नहीं कि उनका सरपंच, नेता कोई दलित या आदिवासी हो। ये उनके जाति से जुड़े ईगो का सवाल बन जाता है इसीलिए वो हत्यारा बनना ज़्यादा पसंद करते हैं।

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लेकिन इन घटनाओं के बीच एक घटना है कृष्णावेणी की हिम्मत की। के. कृष्णावेणी, थलैयुथू पंचायत, नेल्लाई ज़िला, तमिलनाडु से दलित महिला आरक्षित सीट पर निर्दलीय लड़ती हैं और जीतती भी हैं। अपने 2007 से 2011 के कार्यकाल में वह बेहतर काम करते हैं, जैसे नरेगा को लागू करवाना, लाइब्रेरी बनवाना, सड़कें बनवाना और धीरे-धीरे वह लोगों के बीच मशहूर हो जाती हैं लेकिन सवर्ण इस बात से खुश नहीं थे, उन्हें ये पच नहीं रहा था कि एक महिला वह भी दलित उनकी सरपंच कैसे हो सकती है। इंडियास्पेंड की एक रिपोर्ट बताती है कि 13 जून 2011 को करीबन 10 बजे पंचायत दफ्तर से अपने घर लौटते वक़्त कृष्णावेणी पर हमला होता है जिसका उद्देश्य उन्हें जान से मार देने का था। हमला इसीलिए कराया गया क्योंकि कृष्णावेणी सरकारी ज़मीन पर महिलाओं के लिए टॉयलेट बनवाने जा रही थीं। हमले में उनकी उंगलियां कट चुकी थी, कान भी काट दिया गया था, कृष्णवेणी खून से सनी हुई थी। बाद में उन्हें अस्पताल के जाया गया जहां ग्यारह दिन बाद आईसीयू में भर्ती रहीं और वहां की दलित जातियों के विरोध करने के बाद इलाज के लिए उन्हें चेन्नई भेजा गया था। हालांकि यह ख़बर मेनस्ट्रीम मीडिया की नज़र से गायब रही। यह घटना प्रतिरोध की घटना है, सवर्ण पुरुष के वर्चस्व को चुनौती देने की, इसलिए के. कृष्णावेणी की को बताया जाना ज़रूरी है।

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तस्वीर साभार : The Print

मेरा नाम आशिका शिवाँगी सिंह है, फिलहाल मिरांडा हाउस कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातक कर रही हूँ। मैं उस साहित्य और राजनीति की पक्षधर हूँ जो शोषितों की पक्षधर है। रोज़मर्रा के जीवन में सवाल करना, नई-नई आर्ट सीखना, व्यक्तित्व में लर्निंग-अनलर्निंग के स्पेस को बढ़ाना पसंद है।

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