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बचपन में राजकुमारियों की कहानियां पढ़ने का शौक ज़्यादा दिन टिका नहीं। मुझे हॉलिवुड में बनने वाली फिल्में खूब आकर्षित करती थी। खास़कर एक ‘स्ट्रॉन्ग वुमन कैरेक्टर’ यानि एक सशक्त महिला किरदार वाली फिल्में मेरे परियों वाली कहानियों को पढ़ने के शौक को खतम करने में सफल रहीं। ‘स्ट्रॉन्ग वुमन कैरेक्टर’ वाली फिल्में, वेब सीरीज़ देखने में रोमांचक लगती हैं लेकिन इन सशक्त महिला किरदारों के माध्यम से भी अक्सर पितृसत्तात्मक समाज अपने पूर्वाग्रहों को ही ज़ाहिर करता नज़र आता है। उदाहरण के तौर पर ज़्यादातर ऐसी फिल्मों में महिलाओं के किरदार ऐसे गढ़े जाते हैं जिन्हें पिंक रंग, मेकअप, फैशन, रोमांटिक किताबें, रोना-धोना और लड़कियों की पसंद से जोड़ी गई अन्य चीजों को समाज की आंखों में बेकार साबित किया जाता है। इन चीजों को पसंद करना जैसे लड़कियों के लिए शर्मिंदगी की बात बन जाती है। कई बार इन किरदारों के ज़रिये इन चीज़ों को और इन चीज़ों को इस्तेमाल करने वाली दूसरी लड़कियों से नफ़रत करना सिखाया जाता है क्योंकि ये सब “बेकार” होती हैं। दूसरे शब्दों में कहे तो ऐसा करके आंतरिक स्त्रीद्वेष को बढ़ावा दिया जाता है। इन बातों का असर लड़कियों के मानसिक विकास पर गहरा पड़ता है। साल 2021 में आए एक अमरीकी टीवी प्रोग्राम ‘वॉनडाविज़न’ (Wandavison) के सशक्त महिला किरदार पर कुछ ऐसे ही सवाल उठाए गए।

जनवरी 2021 में आए नौ एपिसोड वाले इस शो की चर्चा सोशल मीडिया पर जोर-शोर के साथ की गई। मानसिक स्वास्थ्य पर आधारित इस शो ने कुछ ऐसा किया जो पहले इस कैटेगरी में नहीं किया गया। वॉनडा मैक्सीमौफ के चरित्र की रचना मारवेल कॉमिक्स के दो पुरुषों द्वारा साल 1964 में की गई। पुरुषों द्वारा लिखे गए फीमेल सुपरहीरो को प्रमुख विचारधारा में अक्सर सीमित किया जाता है, उन्हें सिर्फ एक पुरुष के नज़रिये से देखा जाता है। साल 2020 तक वॉनडा के चरित्र के आव-भाव प्रमुख रूप से पुरुषों के हाथ में रहे, जिस कारण वॉनडा के ट्रॉमा को मार्वल यूनिवर्स में उसके पुरुष साथियों द्वारा संभाला एवं नकार गया। साल 2021 के वॉनडाविज़न के लेखक मंडली में अधिकतर महिलाएं थी; शायद इसीलिए एक फीमेल किरदार को रूढ़िवादी ‘स्ट्रॉन्ग फीमेल कैरेक्टर’ के दर्जे से ऊपर रखा गया है।

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वॉनडाविज़न के लेखक एक ही बात को स्पष्ट करना चाहते हैं, “ज़िंदगी में आगे बढ़ने के लिए शोक मनाना अनिवार्य है नहीं तो दर्द खुद के साथ आसपास के लोगों को भी चोट पहुंचाएगा। दर्द दिखाना कमजोरी की निशानी नहीं है, न ही मजबूती की।”

वॉनडाविज़न की कहानी सरल है। यह एक महिला सुपरहीरो की कहानी है जो ऐसी जगह में बड़ी हुई जहां राजनीतिक तनाव उसके घर और दिमाग को घेरे हुए था। जहां बम धमाके में वह अपने मां-बाप को आंखों के सामने मरते देखती है, जो अपने भाई को भी मरता देखती, जो बाद में लैब के चूहे की तरह इस्तेमाल की गई, जो लोगों के लिए सिर्फ एक हथियार ही बनकर रह गई, जो अपने प्रेमी को दो बार अपनी आंखों के सामने मरता देखती है। वॉनडा को मार्वेल स्टूडियो की पिछले फिल्मों में शोक मनाने का मौका नहीं मिला था। वॉनडाविज़न में वॉनडा के मन में दबे दुख-दर्द को दर्शकों ने पहली बार देखा। हम दर्शक वॉनडा को सबसे शक्तिशाली मानते थे, लेकिन उसकी बिगड़ती मानसिक स्थिति को महसूस नहीं कर पाए। यही सोच शायद हम अपने आस-पास की ‘स्ट्रॉन्ग’ औरतों पर थोप देते हैं। इस सोच की शिकार में छोटी बच्चियां भी शामिल हैं। वॉनडाविज़न के लेखक एक ही बात को स्पष्ट करना चाहते हैं, “ज़िंदगी में आगे बढ़ने के लिए शोक मनाना अनिवार्य है नहीं तो दर्द खुद के साथ आसपास के लोगों को भी चोट पहुंचाएगा। दर्द दिखाना कमजोरी की निशानी नहीं है, न ही मजबूती की।”

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किरदारों का दर्द से सामना करना कहानी का हिस्सा होता है। यह सुपरहीरो फिल्मों की शैली में आम विषय है। अगर वे अपनी वास्तविकता चाहे वह कितनी भी दर्दनाक हो, उसे स्वीकार कर लेते हैं तो वे अपनी व्यथा को व्यक्त करने में सफल होते हैं। सफल अगर हो गए तो उन्हें बहादुर कहा जाता है। कहना भी चाहिए, लेकिन हर किसी को दर्द सामना करने का मौका नहीं दिया जाता है। वॉनडा के जीवन में घटित तमाम घटनाओं से लगे घाव को किसी इंसान ने भरने की कोशिश नहीं की। जब एक एंड्रॉयड (विज़न) ने वॉनडा के जख्मों में हिस्सेदारी लेनी कोशिश की और सफल भी हुआ, वॉनडा उसे भी खो बैठी। वॉनडा के घाव और गहरे हो गए। वॉनडा की इच्छा को समाज ने ठुकरा दिया क्योंकि विज़न के अंतिम संस्कार में करोड़ों विज़न (एक बहुमूल्य धातु से बनी हुई रोबोट-नुमा मशीन थी) की बरबादी होगी। वॉनडा को अपने दर्द अभिव्यक्त करने की भी आज़ादी नहीं थी। नतीजा यह हुआ कि उसने एक पूरे शहर के बेकसूर निवासियों के मन को नियंत्रित करके अपने खेल का हिस्सा बनाया जहां उसे तंग करने वाला और उसको उसके हकीकत को याद दिलाने वाला कोई नहीं रहा।

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यह कुछ अरसे से आने वाली मुख्यधारा नारीवादी फिल्मों पर भी लागू होता है जहां औरतों को एक ऐसा किरदार बना दिया जाता है जिनमें कोई कमी नहीं होती। इन किरदारों को इतनी शक्ति दी जाती है कि वे हर परेशानी को चुटकी में सुलझा देती हैं। हर मुश्किल का सामना कर पाना उनके लिए एक आम बात होती है, चाहे वह मुश्किल कितनी भी डरावनी और दिल-दहला देने वाली हो। उनके लिए हकीकत को टालना विकल्प नहीं होता है। वॉनडाविज़न ट्रॉमा के भयानक परिणाम को दिखाता है जब हकीकत को स्वीकार न करना एक अकल्पनीय दर्द पैदा करता है। वॉनडा का किरदार कुछ हद तक रिलेटेबल बन जाता है। खुद को व्यथा से बचाने के लिए वॉनडा टीवी सिटकॉम का इस्तेमाल करती है। यह मनगढ़त दुनिया उसकी बनाई दुनिया थी, लेकिन हकीकत टालने के नतीजे अच्छे नहीं होते। आखिरकार उसे अपनी बनाई दुनिया और अपनी हकीकत में से एक चुनना पड़ा। वह अपनी हकीकत को निस्वार्थ कारणों द्वारा चुनती है। वह एक सुपरहीरो होने के बावजूद आम व्यक्ति सी मालूम पड़ती है। हम सब आम लोग अपने जीवन में संघर्ष कर रहे हैं जिससे भागने की भी कोशिश करते हैं; लेकिन हकीकत में वापस आना होता है हम वापस आते भी हैं।

आजकल फिल्मों में औरतों को एथ्लेटिक, बुद्धिमान, त्रुटि-रहित, साधन संपन्न दर्शाने की एक उत्कृष्ट प्रवृत्ति है। जो लेखक इन चरित्रों को लिखते हैं, वे इन चरित्रों को भावनात्मक रूप से स्थिर और सुलझा बनाते हैं। वहीं एक पुरुष सुपरहीरो के चरित्र को आसानी से भावनात्मक रूप से अस्थिर दिखाया जा सकता है। ‘स्ट्रॉन्ग वुमन कैरेक्टर’ शब्दों का उपयोग बिना सोचे समझे बहुतायत से किया जाता है। ऐसे शब्दों का इस्तेमाल महिलाओं को शक्तिशाली और कमज़ोर जैसे श्रेणी में विभाजित कर नारीवाद और महिलाओं को नीचा दिखाता है। इन कमज़ोर श्रेणी की औरतें क्रूर मज़ाक के केंद्र में चली आती हैं। स्ट्रॉन्ग वुमन कैरेक्टर यहां एक ट्रेंड बन गया है। इन ट्रेंड की वजह से लड़कियां खुद को दूसरी लड़कियों से अलग साबित करने में लगती हैं। लड़कियों को खुद को अपने नज़र में सम्मानजनक बनाने के लिए हर समय एक बुद्धिमान और भावनात्मक रूप से साधन संपन्न ‘स्ट्रॉन्ग कैरेक्टर’ होने के दबाव को महसूस करने की ज़रूरत नहीं है। महिलाएं अपना जीवन किस प्रकार बिताना चाहती हैं और कैसे अपने भावनाओं को अभिव्यक्त करना चाहती हैं इन सब की स्वतंत्रता उन्हें पूरी है।

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तस्वीर साभार : Marvel Studios

मैं मधुरिमा माईती हूँ। कलकत्ता की हूँ, लेकिन रहती मैं सोशल मीडिया में हूँ। लिखना और चित्र बनाना मुझे बेहद पसंद है, लेकिन इंटरनेट पर बिल्लियों को ताड़ना ज़्यादा पसंद है। बाकी आम लोगों की तरह खाली समय में समय बर्बाद कर लेना एक स्वभाव बन गया है। कभी कभी कहीं से ढेर सारी प्रेरणा मिल जाती है और मैं Netflix खोल के बैठ जाती हूँ। अगर काम की बात करूं तो मुझे पितृसत्ता और Heteronormativity को शब्दों और तस्वीरों से भंग करना अच्छा लगता है।

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