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आप बस कल्पना करके देखें कि आपके घर का एकमात्र कमाने वाला जैसे-तैसे बाहर जाकर दो वक्त की रोटी का इंतज़ाम करने जाए और फिर कभी वापस ना आए क्योंकि पुलिस की हिंसा से उसकी मौत हो जाए। इस देश का दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक मुसलमान रोज़ इस पीड़ा से गुज़रता है। उसके लिए रोज़ का जीवन किसी युद्ध से कम नहीं है जहां उसे नहीं मालूम शाम तक वह घर वापस लौटेगा या नहीं। इस देश के शासन, प्रशासन में जाति और धर्म के अहम् में बैठे हुए लोग हैं, नफ़रती हैं, उन्हें सर्वश्रेष्ठ होने का अहंकार है। उनका यही अहंकार तमाम परिवारों के जीवन को अंधेरे में धकेलता आया है, अब भी धकेल रहा है।

चार दिन पहले उत्तर प्रदेश के उन्नाव ज़िले में यही हुआ। फ़ैसल जिसकी उम्र 19 साल थी, वह अपने सात लोगों के परिवार में अकेला कमाने वाला था। उन्नाव के बंगारमऊ में वह सब्ज़ी बेचकर अपने परिवार का गुज़ारा कर रहा था। फै़सल के पिता शारीरिक रूप से बीमार हैं, मां की उम्र ज़्यादा है और भाई-बहन छोटे हैं। उन्हें दो वक़्त की रोटी खिलाने के लिए सब्ज़ी मंडी में सब्ज़ी बेचने का काम करता था जिससे दिन का 200 रुपया मुनाफ़ा कमा लेता था। बीती 21 मई को भी वह रोज़ की तरह ही मंडी में दुकान लगाने गया। लॉकडाउन कर्फ्यू तोड़ने के आरोप में बंगारमऊ पुलिस ने सब्ज़ी मंडी से उसे उठाया और पुलिस थाने ले जाकर इतना मारा कि उसकी मौत हो गई। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में उन्नाव के एसपी बताते हैं कि 21 मई शुक्रवार को फै़सल को लॉकडाउन के नियम तोड़ने के आरोप में पुलिस थाने लाया गया। एक घंटे के भीतर ही उसे अस्पताल ले जाया गया जहां उसकी मौत हो गई।

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पुलिसिया हिंसा से हुई इस मौत को छिपाने के लिए पहले कहा गया कि फै़सल की मौत दिल का दौरा पड़ने से हुई है लेकिन फै़सल की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट बताती है कि उसके शरीर पर चोट के 14 निशान थे। फ़ैसल के शरीर पर तमाम चोटों के निशान थे, सिर पर भी गंभीर चोटें थीं। इस वक़्त परिवार की मांग है कि उनके पास सिर्फ फ़ैसल था जो घर को चला रहा था, क्योंकि अब कोई कमाने वाला ही नहीं बचा तो परिवार को मुआवजे के तौर पर एक करोड़ रुपए मिलें। उन्नाव के डीएम का कहना है कि अलग अलग सरकारी स्कीमों के तहत परिवार की पूरी मदद की जाएगी। हालांकि इस पूरे मामले में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ चुप हैं, उनका कोई बयान नहीं आया है। इस मामले में अब तक तीन पुलिसवालों पर हत्या का मुकदमा दर्ज किया गया है।

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इस देश के शासन, प्रशासन में जाति और धर्म के अहम् में बैठे हुए लोग हैं, नफ़रती हैं, उन्हें सर्वश्रेष्ठ होने का अहंकार है। उनका यही अहंकार तमाम परिवारों के जीवन को अंधेरे में धकेलता आया है, अब भी धकेल रहा है।

ये घटना अल्पसंख्यकों के खिलाफ़ हुई इकलौती घटना नहीं है। उत्तर प्रदेश बीते चार सालों में अल्पसंख्यकों, दलित-बहुजन के लिए मृत्यु का कुआं साबित हुआ है। शासन, प्रशासन की नज़रों में शायद इन सभी नागरिकों के जीवन का मूल्य शून्य है। इंडियन एक्सप्रेस में छपी रिपोर्ट के अनुसार गृह मंत्रालय द्वारा दी गई सूचना की मानें तो आर्थिक सत्र 2020-2021 में पुलिस द्वारा मानवाधिकार के उल्लंघन की करीब 11,000 शिकायतें दर्ज़ हुईं जिनमें से अकेले उत्तर प्रदेश पुलिस के ख़िलाफ़ ही 5,388 शिकायतें दर्ज़ हुईं यानि करीब कुल शिकायतों का आधा भाग। वहीं, इकॉनमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट बताती है कि बीते तीन वर्षों में उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा किए गए एनकाउंटर्स में 37 फीसद एनकाउंटर मुसलमानों के हुए जिनकी प्रदेश में कुल आबादी सिर्फ 19% है। वह पुलिस जो हथियारों से लैस रहती है वह एनकाउंटर पर एनकाउंटर करती चली जा रही है।

ये कुछ आंकड़ें इस बात की ओर इशारा करने के लिए काफी हैं कि अल्पसंख्यकों की मौतें सिर्फ गलतियां या सेल्फ डिफेंस नहीं है बल्कि अल्पसंख्यकों के प्रति हमारे देश में बढ़ती नफरत का उदाहरण है। एक ऐसा दौर जहां पूरा देश कोरोना महामारी से गुज़र रहा है तब भी मौके ये तलाशें जा रहे हैं कि इस व्यवस्थित नफरत को कैसे अंज़ाम दिया जाए। कोविड प्रोटोकॉल के बहाने पुलिस द्वारा जितने अत्याचार गरीब, लाचार, इस व्यवस्था द्वारा हरा दिए गए लोगों पर कर रही है, उनसे पूछा जाना चाहिए क्या आदमी की जान इतनी सस्ती हो चुकी है कि कोविड प्रोटोकॉल के नाम पर उसके पूरे परिवार को बर्बाद कर दिया जाए। क्या कोविड प्रोटोकॉल का पालन लोगों की जान से अधिक महत्वपूर्ण है। कैसा हो कि किसी का परिवार इंतज़ार करे कि उनका कोई अपना दो वक़्त की रोटी लेकर आएगा और रोटी की बजाय मृत शरीर उनके सामने पहुंचे? जिस व्यवस्था में देश की आबादी के एक वर्ग के लिए नफ़रत भरी होती है, जातीय और धार्मिक सर्वश्रेष्ठता का दंभ भरा होता है वो व्यवस्था जनता की सेवक नहीं रहती बल्कि हत्यारी बन जाती है।

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मेरा नाम आशिका शिवाँगी सिंह है, फिलहाल मिरांडा हाउस कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातक कर रही हूँ। मैं उस साहित्य और राजनीति की पक्षधर हूँ जो शोषितों की पक्षधर है। रोज़मर्रा के जीवन में सवाल करना, नई-नई आर्ट सीखना, व्यक्तित्व में लर्निंग-अनलर्निंग के स्पेस को बढ़ाना पसंद है।

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