FII is now on Telegram
5 mins read

पारुल शर्मा

दुनिया में आज जितने भी मुद्दों की जोर- शोर से चर्चा है, उनमें से दो पर्यावरण संरक्षण और महिला सशक्तिकरण से संबंधित हैं। चर्चा होनी भी चाहिए क्योंकि पर्यावरण और महिलाओं का जितना शोषण किया गया है, मानव इतिहास में शायद ही किसी और का किया गया हो। इस शोषण के संबंध से परे भी महिलाओं का शुरू से ही प्रकृति के साथ निकटतम संबंध रहा है। महिलाएं हमेशा से पर्यावरण संरक्षण में आगे रहती हैं। वे अपने- अपने स्तर पर पर्यावरण संरक्षण में अपना योगदान देती रहती हैं। महिला सशक्तिकरण का पर्यावरण संरक्षण से विशेष संबंध है। जब महिलाएं पर्यावरण संरक्षण और जीर्णोद्धार से संबंधित नीतियों और कार्यक्रमों में भागीदार बनेंगी तो प्रभाव और बदलाव दोनों क्रांतिकारी सिद्ध होंगे। अगर सतत विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करना है तो लैंगिक समानता के क्षेत्र में कार्य करना बहुत महत्वपूर्ण है। रियो डिक्लेरेशन में भी माना गया है कि पर्यावरण प्रबंधन एंव विकास में महिलाओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। सतत विकास के लिए महिलाओं की पूर्ण भागीदारी आवश्यक है।

महिलाओं की आजीविका पर पर्यावरणीय कारकों का प्रभाव अधिक होता है, इसको ध्यान में रखते हुए पर्यावरण का संरक्षण करने में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए। अधिकांश ग्रामीण महिलाएं आज भी स्थानीय रूप से उपलब्ध ऊर्जा के परंपरागत स्रोतों जैसे कि जानवरों का गोबर, फसलों के अवशिष्ट और ईंधन लकड़ी पर निर्भर हैं। इन ऊर्जा स्रोतों के स्थान पर पर्यावरण अनुकूल स्त्रोत जैसे- सौर ऊर्जा, बायोगैस, धुआं रहित चूल्हों और दूसरे ग्रामीण संसाधनों के प्रयोग के बारे में महिलाओं को जागरूक बनाया जाए जिससे उनकी जीवन शैली को बदलने में इन उपायों का स्पष्ट प्रभाव पड़े। 

और पढ़ें : तुलसी गौडा : पद्मश्री से सम्मानित कर्नाटक की ‘वन विश्वकोष’

Become an FII Member

इसके अलावा अगर महिलाएं शिक्षित होंगी और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होंगी तो वे परिवार नियोजन के प्रति भी जागरूक होंगी और खुद अपने फैसले लेने में सक्षम होंगी। इस संबंध में जलवायु अनुसंधान संगठन ‘प्रोजेक्ट ड्रॉडाउन’ ने 2020 में एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी। इस रिपोर्ट के मुताबिक विकासशील देशों में महिलाओं और लड़कियों को सशक्त बनाकर ग्लोबल वार्मिंग को 2 डिग्री सेल्सियस तक कम किया जा सकता है। ड्रॉडाउन का अनुमान है कि लड़कियों की शिक्षा और परिवार नियोजन पर काम करने से 2050 तक 85 गीगाटन कार्बन उत्सर्जन कम किया जा सकता है। शिक्षा और परिवार नियोजन की जानकारी मिलने से महिलाएं इस मुद्दे पर जागरूक होती हैं कि उनके कितने बच्चे हो और कब हो। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में, धीमी जनसंख्या वृद्धि दर से पारिस्थितिक तंत्र पर भी दबाव कम पड़ता है जिससे संसाधनों का अत्यधिक दोहन नहीं होता है। जब संसाधनों की बचत होगी और महिलाएं शिक्षित होंगी तो वे अपने करियर पर अधिक ध्यान दे सकती हैं और उनको स्वास्थ्य समस्याओं का सामना भी कम करना पड़ता है। संसाधनों की बचत से ग्रामीण महिलाओं के पास फसल की पैदावार भी अधिक होती है, जिससे उनके परिवारों को बेहतर पोषण और वित्तीय स्थिरता मिलती है। 

रिपोर्ट इस बात पर भी ज़ोर देती है कि यह प्रयास जनसंख्या नियंत्रण लागू करने के बारे में नहीं हैं बल्कि ये महिलाओं को अपनी पसंद चुनने की आजादी देते हैं। ड्रॉडाउन के मुताबिक इससे महिलाओं को जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए पर्याप्त ज्ञान और कौशल प्राप्त होगा। रिपोर्ट के मुताबिक आज ऐसी अनेक आर्थिक, सांस्कृतिक और सुरक्षा संबंधी बाधाएं हैं जो दुनिया भर में 62 मिलियन लड़कियों को उनके शिक्षा संबंधी अधिकार को प्राप्त करने से रोकती हैं। इन समस्याओं के हल के लिए रिपोर्ट में प्रमुख रणनीतियां भी शामिल की गई हैं जो इस प्रकार हैं- 

1- स्कूलों की फीस इतनी हो कि गरीब भी आसानी से दाखिला ले सके।

2- लड़कियों को उनकी स्वास्थ्य समस्या संबंधी जानकारी देना और उन पर काबू पाने में मदद करना।

3- स्कूल ऐसी जगह स्थित हो जहां जाने का समय और दूरी कम हो या उन तक पहुंच आसान बनाई जाए।

4- स्कूलों को लड़कियों के अधिक अनुकूल बनाना।

इसके अलावा खेती-बाड़ी के काम में महिलाओं की भूमिका की बात करें तो पूरी दुनिया में ग्रामीण महिलाओं का कृषि क्षेत्र में योगदान 50 फीसद से भी अधिक है। खाद्य और कृषि संगठन (FAO) के आंकड़ों के मुताबिक कृषि क्षेत्र में कुल श्रम में ग्रामीण महिलाओं का योगदान 43 प्रतिशत है और कुछ देशों में यह आंकड़ा 70 से 80 प्रतिशत भी है। बावजूद इसके महिलाओं को केवल मज़दूर समझा जाता है। वे आज भी पुरुषों से अधिक समय तक काम करती हैं। इसके अलावा घर- परिवार की जिम्मेदारी भी संभालती हैं। न तो महिलाओं को खेती के लिए प्रशिक्षण दिया जाता है और न पैदावार अच्छी होने पर उनके काम को सराहा जाता है। संयुक्त राष्ट्र के भोजन और कृषि संगठन के एक सर्वेक्षण के मुताबिक अधिकारों और सुविधाओं को छोड़कर महिलाएं कृषि मामले में पुरुषों से हर क्षेत्र में आगे हैं। महिलाओं का न तो जमीन पर मालिकाना हक होता है, मालिकाना हक तो छोड़िए भूमि में हिस्सेदारी भी नहीं होती। इंटरनेशनल यूनियन ऑफ कंजर्वेशन ऑफ नेचर (IUCN)  के मुताबिक वैश्विक स्तर पर केवल 13.8% महिलाओं के पास ज़मीन का मालिकाना हक है, जिनको भी अक्सर भूमि से प्राप्त उत्पादन की खरीद- फरोख्त,  प्रबंधन और नियंत्रण से संबंधित कई कानूनी और सामाजिक बाधाओं का सामना करना पड़ता है। महिलाओं के पास भू- स्वामित्व संबंधी अधिकार नहीं होने की वजह वे विभिन्न फसलों को उगाने, भूमि के टिकाऊ प्रबंधन संबंधी फैसले लेने में सक्षम नहीं होती हैं। इसके साथ ही अगर जमीन उनके नाम नहीं होगी तो वे उत्पादन बढ़ाने के लिए तकनीक में निवेश के लिए ऋण भी नहीं ले सकती हैं। 

और पढ़ें : पर्यावरण को बचाने के लिए मौजूदा समय के 5 महत्वपूर्ण आंदोलन

इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) की एक रिपोर्ट के मुताबिक भूमि पर महिलाओं की पहुंच और नियंत्रण को मजबूत करने से स्थायी प्रबंधन प्रयासों में सुधार होता है। आईयूसीएन के मुताबिक, राष्ट्रीय सरकारों से लेकर स्थानीय सामुदायिक समूहों में, निर्णय लेने में महिलाओं को बहुत कम प्रतिनिधित्व दिया जाता है। उदाहरण के लिए, दुनियाभर की संसदों में महिलाओं की भागीदारी 25 फीसद से भी कम हैं। इसके अलावा दुनियाभर में पर्यावरण संबंधित सेक्टरों में महिलाएं शीर्ष स्तर के मंत्रीपदों से लेकर जिला या सामुदायिक स्तर की समितियों में केवल 12 फीसद प्रतिनिधित्व ही रखती हैं जो कि औसत से काफी कम है। जब प्राकृतिक संसाधनों और पारिस्थितिकी तंत्र के प्रबंधन की बात आती है, तो महिलाओं की जरूरतों, प्राथमिकताओं और ज्ञान को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है जिससे स्थायी प्रबंधन के समाधानों पर भी प्रभाव देखने को मिलता है। इसका सीधा- साधा सा मतलब है कि अभी आधी आबादी वर्कफोर्स से दूर है और पर्यावरण संरक्षण संबंधी फैसले लेने से वंचित है।

अगर लैंगिक भेद खत्म किया जाए और महिलाओं की कृषि संसाधनों और कृषि क्षेत्र में मौजूद असीम संभावनाओं में भागीदारी को बढ़ाया जाए, उनकी शिक्षा पर ध्यान दिया जाए तो खाद्य, पोषण और पर्यावरण संबंधी समस्याओं को खत्म किया जा सकता है। जानकारों के मुताबिक, जिन देशों में महिला सांसदों की संख्या अधिक होती है, वहां पर्यावरण संरक्षण संबंधी संधियों और योजनाओं के लागू होने की संभावना अधिक होती है। 

और पढ़ें : बेहतर भविष्य के लिए लड़नेवाली 5 भारतीय महिला पर्यावरणविद


(यह लेख पारुल ने लिखा है, जिन्होंने आईआईएमसी, नई दिल्ली से “हिंदी पत्रकारिता” में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया है। उन्हें किताबें पढ़ना और फोटोग्राफी करना बेहद पसंद है। वह पर्यावरण और जेंड़र सेंसिटिविटी से जुड़े मुद्दों पर लिखना पसंद करती हैं)

तस्वीर साभार : World Bank Group

Follow FII channels on Youtube and Telegram for latest updates.

Leave a Reply