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पिछले तीन दशकों में भारत की प्रजनन दर लगभग 3.6 से 2.4 बच्चों तक घट गई है, लेकिन इसके बावजूद यूनाइटेड नेशन पॉपुलेशन फंड ने अनुमान लगाया है कि 2028 तक भारत दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश बन जाएगा। हमारे देश में परिवार नियोजन अलग-अलग स्तरों पर सामाजिक और लैंगिक मानदंडों के अंतरों से भरा हुआ है। भारत में शादी के बाद पति-पत्नी के बीच जितनी जल्दी हो सके यौन संबंध होना और परिवार आगे बढ़ाना एक अच्छे और स्थिर संबंध का प्रतीक माना जाता है। समाज में पुरुषत्व के महत्व के कारण एक ओर पुरुषों को एक श्रेष्ठ सामाजिक दर्जा दिया जाता है। वहीं, दूसरी तरफ यह उन पर परिवार को आगे बढ़ाने की सामाजिक अपेक्षा को पूरा करने का दबाव भी डालता है। वहीं, महिलाओं से उम्मीद की जाती है कि एक पत्नी के रूप में वे अपने पति को यौन सुख दें। साथ ही परिवार नियोजन की ज़िम्मेदारी भी औरतों के ऊपर ही थोप दी जाती है।

जनसंख्या वृद्धि की समस्या बहुपक्षीय है। बाल विवाह, छोटी उम्र में मां बनना, शिक्षा की कमी, बेटे की चाह, महिला केंद्रित परिवार नियोजन योजनाएं, कार्यक्रमों के कार्यान्वयन में कमी, यौन शिक्षा का अभाव और सामाजिक दबाव जैसे कई कारण इसके जिम्मेदार हैं। हालांकि भारत ‘राष्ट्रीय परिवार नियोजन कार्यक्रम’ बनाने वाला विकासशील देशों में पहला देश था पर सालों से भारत के सरकारी या गैर सरकारी परिवार नियोजन अभियान और कार्यक्रम लगभग पूरी तरह से महिलाओं पर केंद्रित होते रहे हैं। हाल ही में जारी हुए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) के पहले चरण की रिपोर्ट तो देखे तो सभी राज्यों में महिलाओं की तुलना में नसबंदी करवाने वाले पुरुषों की प्रतिशत बहुत कम है। सर्वेक्षण के अनुसार, पुरुषों का परिवार नियोजन में योगदान की बात करें तो, कई राज्यों में पुरुष कोई भी नियोजन के तरीके नहीं अपना रहे। कंडोम के इस्तेमाल में भी पुरुषों का प्रतिशत चिंताजनक है।

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जनसंख्या वृद्धि में सबसे ज्यादा योगदान देने वाले राज्यों की बात करें, तो बिहार में नसबंदी करवाने वाली महिलाओं का प्रतिशत एनएफएचएस-4 के 20.7 प्रतिशत से एनएफएचएस-5 में बढ़कर 34.8 प्रतिशत हुआ है। वहीं, पुरुषों में यह शून्य से बढ़ कर महज 0.1 प्रतिशत पाया गया। परिवार नियोजन के अनेक उपायों में से एक कंडोम का इस्तेमाल केवल 4 प्रतिशत पुरुष करते पाए गए। महाराष्ट्र की बात करें, तो नसबंदी करवाने वाली महिलाओं का प्रतिशत 49.1 पाया गया। वहीं, पुरुषों में इसका प्रतिशत महज 0.4 पाया गया और सिर्फ 10.2 प्रतिशत पुरुष कंडोम इस्तेमाल करते पाए गए। इन आंकड़ों से यह स्पष्ट है कि देश में परिवार नियोजन का भार महिलाओं के ऊपर है। यह गौर करने वाली बात है कि डॉक्टरों के अनुसार महिलाओं की परिवार नियोजन की पद्धति ट्यूबकटॉमी, पुरुषों के वॅसेक्टमी से कहीं अधिक जटिल और जोखिम भरी है।

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महिलाओं से उम्मीद की जाती है कि एक पत्नी के रूप में वे अपने पति को यौन सुख दें। साथ ही परिवार नियोजन की ज़िम्मेदारी भी औरतों के ऊपर ही थोप दी जाती है।

लैंगिक असमानता वाले हमारे समाज में पुरुष का नसबंदी करने का विचार या यहां तक कि कंडोम इस्तेमाल करना भी उसके मर्दानगी पर आघात है। यह समाज के पुरुषत्व के मानदंडों से मेल नहीं खाता। इसलिए अकसर पुरुषों का इन उपायों को इस्तेमाल न करने के पीछे उनका अहम और मर्दानगी की बेसिरपैर समझ होती है। सरकारी योजनाओं के तहत परिवार नियोजन के विज्ञापन भी मूल रूप से महिलाओं को इन उपायों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करते नजर आते हैं। जहां अलग-अलग तरीके महिलाओं को अनचाहे गर्भधारण और उससे जुड़ी समस्याओं से निपटने का उपाय देती है, वहीं परिवार नियोजन की एकल जिम्मेदारी उनकी आजादी और अधिकारों को सीमित कर देती है।

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इंटरनेशनल सेंटर फॉर रिसर्च ऑन वुमन (आईसीआरडब्ल्यू) के एक अनुसंधान के अनुसार भारत में पुरुषों के परिवार नियोजन में भागीदारी न होने के पीछे सामाजिक रूढ़िवाद से जन्मे पुरुषत्व, यौन संबंध, शादी और प्रजनन शक्ति की अवधारणाएं शामिल हैं। अनुसंधान कहता है कि दंपति के बीच महिलाओं और पुरुषों के बीच मौजूद असमानता परिवार नियोजन को सीधे-सीधे तौर पर प्रभावित करती है। यह दंपति के बीच बातचीत, निर्णय लेने और परिवार नियोजन के विकल्पों को भी प्रभावित करती है। द इंडियन एक्स्प्रेस में छपी पिछले राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के रिपोर्ट के अनुसार देश में पुरुषों के 6.8 प्रतिशत के मुकाबले 93 प्रतिशत से भी अधिक महिलाओं ने परिवार नियोजन के लिए नसबंदी करवाई थी। साफ तौर पर, न सिर्फ परिवार नियोजन का दायित्व महिलाओं पर थोप दी जाती है बल्कि इससे जुड़ी समस्याओं से भी उन्हें जूझना पड़ता है।

हमारे देश में दिखाए जा रहे अलग-अलग कंपनियों के कंडोम के विज्ञापन पर ध्यान दे तो ये ज़्यादातर विज्ञापनों में कंडोम को महिलाओं को यौन सुख प्रदान करने वाली उपभोग की ‘वस्तु’ के रूप में दिखाते हैं न कि एक गर्भनिरोधक के रूप में। इन विज्ञापनों में महिलाओं को यौन सुख देने वाली वस्तु के रूप में दर्शाया जाता है। वहीं, मर्दों के लिए यह संदेश दिया जाता है कि कंडोम के इस्तेमाल से उनके सेक्सुअल प्लेज़र में कोई कमी नहीं आएगी। गर्भनिरोधकों के मामले में भी महिला के स्वास्थ्य को नुकसान न होना ही अहम रूप से दिखाया जाता है। दोनों ही स्थिति में परिवार नियोजन को महिलाओं की स्वेच्छित सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी बताई जाती है जबकि पुरुषों के लिए यह केवल यौन संबंध को प्रभावित करने या न करने वाली एक कारण दिखाई जाती है। यूएनपीएफ के अनुसार साल 2020 में 15-49 वर्ष की महिलाओं में किसी भी विधि से गर्भनिरोधक व्यापकता दर 43 प्रतिशत है। भारत में साल 2017 में कुल उर्वरता दर (टीएफआर) 2.2 रहा। ऐसे में पुरुषों की समान सहभागिता के बिना इस व्यापक समस्या से निपटना मुश्किल हो सकता है।           

पिछले दिनों जनसंख्या विस्फोट की आशंका ने फिर से संसद में अपना रास्ता बनाया। शिवसेना के राज्यसभा सांसद अनिल देसाई ने संसद में एक प्राइवेट बिल संविधान (संशोधन) विधेयक, 2020 पेश किया जिसमें परिवार को दो बच्चों तक सीमित रखने की अपील की गई है। अगर यह बिल लागू होतe है तो बढ़ती जनसंख्या को नियंत्रित करने के लिए अनुच्छेद 47ए के अनुसार राज्य अपने लोगों को कर, रोजगार, शिक्षा आदि में प्रोत्साहन देकर छोटे परिवार के मानदंडों को बढ़ावा देगा। इसके विपरीत जो अपने परिवार को दो बच्चों तक सीमित नहीं रखते हैं उनसे हर सुविधा या रियायत वापस ले ली जाएगी और आगे भी वंचित रखा जाएगा। यह आवश्यक है कि ऐसे बिल को लागू करने के पहले इसके विभिन्न पक्षों को परख लिया जाए। जनसंख्या वृद्धि के लिए देश में पहले से ही मुसलमान समुदाय के लिए सामाजिक राय बनी हुई है। देश में वृहद आर्थिक विषमता के कारण सभी लोगों के लिए सामाजिक, चिकित्सक, आर्थिक और राजनीतिक साधन भी एक जैसे नहीं है। ऐसा बिल ग्रामीण और वंचित तबके को कहीं अधिक प्रभावित कर सकता है जो पहले से ही आधारभूत और मौलिक अधिकारों की कमियों से जूझ रहे हैं।  

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आईसीआरडब्ल्यू और यूएनपीएफ के छह राज्यों में किए गए एक शोध में पुरुषों और महिलाओं से उनके और उनके साथी की शिक्षा और आय में मौजूद अंतर के बारे में पूछा गया। 64 प्रतिशत से अधिक पुरुषों ने बताया कि उन्होंने अपने साथी की तुलना में अधिक कमाया, जबकि आधी से अधिक महिलाएं यानी 53 प्रतिशत ने कहा कि उनके पास कोई आय नहीं थी। केवल 3 प्रतिशत पुरुषों ने बताया कि वे और उनके साथी समान रूप से कमाते हैं, जबकि महिलाओं में यह अनुपात 6 प्रतिशत था। इस शोध के अनुसार 77 प्रतिशत पुरुष इस बात से सहमत थे कि वे अपनी पत्नी या साथी से इस बात की उम्मीद करते हैं कि जब वे यौन संबंध बनाना चाहे तो वे राजी हो। साथ ही, कंडोम का उपयोग करने का सुझाव देने वाली पत्नी या साथी उन्हें स्वीकार नहीं।

स्पष्ट है कि महिलाओं के लिए परिवार नियोजन के कई तरीके होते हुए भी इन विषयों में फैसला करने की छूट उन्हें नहीं है। पुरुषों को यह आश्वस्त करने की ज़रूरत है कि महिला के तुलना में पुरुष नसबंदी अधिक सुरक्षित और सरल है। बच्चों को स्कूल में सही और पर्याप्त यौन शिक्षा मिलनी चाहिए ताकि आगे चलकर उन्हें इन विषयों में अपने साथी पर निर्णय थोपने न पड़े। परिवार नियोजन के सभी कार्यक्रमों को भी लिंग समावेशी रुख अपनाने की आवश्यकता है। पितृसत्ता से जन्मे पुरुषत्व भी पुरुषों को त्यागना पड़ेगा ताकि मर्दानगी की रक्षा में महिलाओं पर परिवार नियोजन का दबाव न रहे।

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तस्वीर साभार : DNA

कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से हिंदी में बी ए और पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद बतौर पत्रकार और शिक्षिका मैंने लम्बे समय तक काम किया है। बिहार और बंगाल के विभिन्न क्षेत्र में पले-बढ़े होने के कारण सामाजिक रूढ़िवाद, धार्मिक कट्टरपन्त, अंधविश्वास, लैंगिक और शैक्षिक असमानता जैसे कई मुद्दों को बारीकी से जान पायी हूँ। समावेशी नारीवादी विचारधारा की समर्थक, लैंगिक एवं शैक्षिक समानता ऐसे मुद्दें हैं जिनके लिए मैं निरंतर प्रयासरत हूँ।

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