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कोविड-19 फैलने के कारण साल 2020 में दुनियाभर भर के लोग अपने घरों में रहने के लिए मजबूर हो गए। ऑफिस, मॉल, स्कूल, कोर्ट इत्यादि सभी जगह पूरी तरह से लॉकडाउन लग गया। इसके चलते बड़ों के साथ-साथ बच्चे भी अपने घरों में क़ैद से होकर रह गए। सरकार द्वारा लॉकडाउन के आदेश महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य और सुरक्षा उपाय के अंतर्गत लिए गए। लॉकडाउन इस लिए लगाया गया ताकि लोग कोविड- 19 के प्रभाव से बच सकें और इसके फैलाव को रोका जा सके। लेकिन अगर आंकड़ों का विश्लेषण करें तो यह निष्कर्ष निकलता है कि लॉकडाउन के कारण घरों में रहने की मजबूरी का साना कर रहे लोगों खासकर महिलाओं और बच्चों के लिए घर सबसे सुरक्षित जगह नहीं है। चाइल्डलाइन 1098 जो कि दुर्व्यवहार और हिंसा की स्थिति में महिलाओं और बच्चों की मदद के लिए फील्ड कॉल करने के लिए एक आपातकालीन सेवा है, उसके मुताबिक अप्रैल 2020 में भारत में लॉकडाउन के दूसरे सप्ताह में बच्चों की मदद की कॉल की संख्या में 50 प्रतिशत की वृद्धि हुई। न्यू इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक बीते साल लॉकडाउन के पहले 21 दिनों में ही यानि 20 मार्च ये 10 अप्रैल तक चाइल्डलाइन ने करीब 4.6 लाख कॉल्स के जवाब दिए।

लॉकडाउन में बच्चों और महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा की घटनाओं में वृद्धि हुई है क्योंकि महिलाएं और पीड़ित बच्चे अपने दुर्व्यवहार करने वालों के साथ घर के अंदर फंसी हुई हैं। महिलाओं के साथ-साथ बच्चे भी अपने घरों में दुर्व्यवहार का सामना करने के खतरे में हैं, ख़ासकर जान-पहचान के लोगों द्वारा शोषण की संभावनाएं अधिक होती हैं। ऐसा इसीलिए है कि वे हिंसा करने वाले अपराधी जोकि उनके घर के अंदर का व्यक्ति होता है, के साथ एक ही घर में रह रहे होते हैं। कुछ बाल अधिकार कार्यकर्ताओं के अनुसार परिवारों के अंदर बाल यौन शोषण से जुड़े अपराधों पर उनकी रिपोर्टिंग और उनमें हस्तक्षेप, दोनों को लॉकडाउन ने असंभव बना दिया है। आंकड़ों से पता चलता है कि बाल यौन शोषण के मामलों में 93 फीसद अपराधी रिश्तेदार या जान-पहचान वाला व्यक्ति है। यह पीड़ितों में संबंधित असहायता और मानसिक स्वास्थ्य परिणामों की संभावित भयावहता को भी उजागर करता है।

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शेरीन बोस्को जोकि बलात्कार संकट केंद्र और एनजीओ नक्षत्र के संस्थापक हैं बताते हैं, “जब भी हमारे पास कोई भी बाल यौन शोषण का मामला आता है तो हम सबसे पहले बच्चे को एक सुरक्षित स्थान पर पहुंचाते हैं लेकिन कोविड-19 के चलते लगने वाले लॉकडाउन के कारन यह असंभव सा हो गया है। पीड़ित बच्चा और दोषी व्यक्ति एक साथ उसी घर में एक छत के नीचे रह रहे हैं। दुर्भाग्य की बात तो यह है कि पीड़ित बच्चा स्कूल भी नहीं जा पा रहा और न ही वह बाहर अपने दूसरे सहयोगियों से मिल पा रहा है। इस कारण वह अपने मन की व्यथा भी किसी को नहीं बता पाता।” घर में की गई यौन हिंसा का मामला पुलिस के पास ज्यादातर मामलों में केवल तभी आता है जबकि पीड़ित बच्चे को मेडिकल इमरजेंसी जैसे कि प्राइवेट पार्ट्स से खून आना या लगतार यौन शोषण से बच्ची का गर्भवती हो जाना की ज़रूरत पड़ती है। उससे पहले अन्य यौन हिंसा के मामलों को घर में ही दबाने की कोशिश की जाती है। जैसे कि बच्चे के सीने को दबा देना, उसके प्राइवेट पार्ट्स को छूना, उससे अपना प्राइवेट पार्ट पकड़वाना इत्यादि।

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एक अन्य चौंकाने वाला तथ्य यह है कि भारत में बच्चों की एक बड़ी आबादी बेघर, कचरा बीनने वालों और सड़कों पर भीख मांगने वालों की है। भोजन या दिहाड़ी मज़दूरी के बदले हजारों बच्चों का शोषण किया जा रहा है। द चाइल्डलाइन इंडिया फाउंडेशन के अनुसार, हेल्पलाइन को नियमित रूप से कुछ ‘साइलेंट कॉल्स’ आती हैं जहां कॉल करने वाले बच्चे को यह नहीं पता होता कि उसके साथ की गई यौन हिंसा को वह ‘क्या हुआ / कैसे व्यक्त करें।’ इस कोविड महामारी के दौर में बच्चों के प्रति ऑनलाइन हिंसा के मामलों में भी काफी वृद्धी हुई है। एक गैर-सरकारी संगठन, इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन फंड के अनुसार, 2020 में लॉकडाउन की घोषणा के ठीक बाद मार्च में चाइल्ड पोर्नोग्राफी खोजों में भी भारी वृद्धि हुई थी। भारत में बाल यौन शोषण तस्वीरों और वीडियो की मांग में लॉकडाउन के बीच 95 प्रतिशत की वृद्धि हुई। यूनाइटेड स्टेट्स नेशनल सेंटर फॉर मिसिंग एंड एक्सप्लॉइटेड चिल्ड्रेन (NCMEC) और नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर 2019 और जनवरी 2020 के बीच भारतीय सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर चाइल्ड पॉर्नोग्राफी से जुड़ी कम से कम 25,000 सामग्रियां अपलोड की गईं। यह आंकड़े चिंताजनक हैं। गृह मंत्रालय (एमएचए) के एक अधिकारी ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि जब बाल यौन शोषण सामग्री (सीएसएएम) अपलोड करने की बात आती है तो रिपोर्ट में दिल्ली शीर्ष स्थान पर है। अधिकारी के अनुसार महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल दिल्ली के बाद अन्य शीर्ष राज्य हैं। 

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कोरोना महामारी ने दुनिया के हर कोने में सभी को परेशानी में डाला हुआ है। इस महामारी ने छोटे-बड़े सबको अपनी चपेट में लिया हुआ है। इस महामारी के फैलाव को रोकने के लिए ही लॉकडाउन लगाया गया लेकिन यह लॉकडाउन सबके लिए बचाव के रूप में कार्य नहीं कर पाया। अपने साथ होने वाली यौन हिंसा के फलस्वरूप बच्चों पर इस सबका हानिकारक प्रभाव होना स्वाभाविक है। जैसे, बच्चों में PTSD का होना, अवसाद और चिंता विकार विकसित होना। सही समय पर पीड़ित को मदद नहीं मिलना अपने आप में उनके साथ एक और ज़्यादती है। इस व्यापक बाल अधिकार संकट से निपटने के लिए, यूनिसेफ ने मोबाइल पर संदेशों, शैक्षिक प्लेटफार्मों और सोशल मीडिया के माध्यम से COVID-19 के दौरान हिंसा, दुर्व्यवहार और उपेक्षा से बच्चों की सुरक्षा के लिए उपलब्ध सूचनाओं और सेवाओं के उचित संचालन की आवश्यकता पर बल दिया है। ऑनलाइन क्लासरूम की तरह टेली काउंसलिंग सेवाओं को भी उपलब्ध कराने की सिफारिश की गई है। माता-पिता को सकारात्मक, अहिंसक पालन-पोषण और तनाव प्रबंधन स्व-सहायता मार्गदर्शिकाएं उपलब्ध करवाना ज़रूरी है। यूनिसेफ द्वारा नाजुक संदर्भों और मानवीय संकटों में बाल संरक्षण सेवाओं को सुनिश्चित करने के लिए सामाजिक और सामुदायिक कार्यकर्ताओं को शामिल करने का सुझाव दिया गया है।

भारत में, बाल यौन हिंसा से संबंधित आंकड़े चिंताजनक हैं। इस महामारी के दौर में भी बच्चे हिंसा और शोषण का सामना कर रहे हैं। बच्चों के मूल अधिकारों की रक्षा करना अत्यंत चिंता का विषय है। किसी भी इंसान का सबसे सुरक्षित स्थान उसका घर होता है लेकिन स्थिति तब भयावह हो जाती है जब इंसान की सुरक्षा घर पर भी दांव पर लगी होती है। ये आंकड़े सरकार को और विधायिका को बाल यौन हिंसा में वृद्धि को रोकने और बाल संरक्षण सुनिश्चित करने के लिए कुछ नए कानून बनाने और उनके क्रियान्वन के लिए कहता है वरना मौजूदा हालात एक गंभीर प्रभाव छोड़ेंगे और यह भविष्य के लिए एक बड़ा खतरा बन जाएगा।

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(यह लेख मासूम कमर ने लिखा है जो एक स्वतंत्र शोधकर्ता हैं।)

तस्वीर : सुश्रीता बनर्जी फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए

दिल्ली विश्वविद्यालय से लॉ की डिग्री ली फिर जामिया से LLM किया। एक ऐसे मुस्लिम समाज से हूं, जहां लड़कियों की शिक्षा को अधिक महत्त्व नहीं दिया जाता था लेकिन अब लोग बदल रहे हैं। हालांकि, वे शिक्षा तो दिला रहे हैं, मगर सोच वहीं है। कई मामलों में कट्टर पितृसत्तात्मक समाज वाली सोच। बस इसी सोच को बदलने के लिए लॉ किया और महिलाओं और पिछड़े लोगों को उनके अधिकार दिलाने की ठानी। समय-समय पर महिलाओं को उनके अधिकारों से अवगत कराती रहती हूं। स्वतंत्र शोधकर्ता हूं, वकील हूं, समाज-सेवी हूं। सबसे बड़ी बात, मैं एक मुस्लिम हूं।

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1 COMMENT

  1. ये एक बहुत गंभीर मुद्दा है, सरकार को लॉकडाउन के साथ साथ इस मुद्दे पर भी खास ध्यान रखना चाहिए।

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