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‘विविधता में ही एकता है। इन शब्दों को स्कूल के बच्चे तब तक दोहराते हैं जब तक इनके अर्थ मन से उतार न जाए। लेकिन क्या सच में यह विविधिता हमारे समाज में मौजूद है? रंग, जाति, धर्म, जेंडर आदि के आधार पर हमारे समाज में व्यापक रूप से भेदभाव जारी है। रंग के आधार पर भेदभाव तो अपने चरम पर है। हमारे देश में ‘ब्लैक लाइवस् मैटर्स’ सिर्फ एक सोशल मीडिया स्टंट बनकर रह गया। जिनका रंग ‘साफ’ नहीं होता है, उन्हें समाज ‘साफ’ करने का दावा करता है क्योंकि हमारे समाज के मुताबिक त्वचा का काला होना ‘साफ’ न होना एक बराबर है। इस रंगभेद को काले लोगों की सामाजिक स्थिति में उथल-पुथल मचाने के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है ताकि उन्हें सामान्य अवसरों दूर एक कोने में धकेल दिया जाए। इस भेदभाव का असर उनके प्रतिनिधित्व पर पड़ता है। असर ऐसा कि उन्हें टेलीविज़न, वेबसीरीज़, सिनेमा में कहीं भी क्योंकि ‘साफ’ रंग देखना सुखद अनुभव होता है और वहीं काले रंगों वाले पात्रों को देखना नापसंद किया जाता है। इन ब्यूटी स्टैंडर्ड्स में सिर्फ साफ, चिकने, गोरे चमड़ों को स्थान दी जाती है।

ब्राह्मणवादी, पूंजीवादी, पितृसत्ता के नेतृत्व में चल रही संस्थाओं, पद्धति और संस्कृति से अक्सर भारत में पाए जाने वाले अलग-अलग त्वचा के रंगों को इस हद तक मिटा दिया है कि किसी काली या सांवली त्वचा वाले व्यक्ति के लिए मुख्यधारा में शामिल मुश्किल हो गया है। इसका उदाहरण हम आए दिन फिल्मों और वेबसीरीज़ में देख सकते हैं। जानबूझकर बनाई गई इस कमी को पूरा करने के लिए गोरे एक्टर्स पर मेकअप के ज़रिये काला रंग चढ़ाया जाता है। इस अभ्यास को 18वीं सदी में अमरीकी थियेटरों ने प्रचलित किया था। जब ब्लैक लोगों के पास मूल अधिकार नहीं थे, उन्हें सार्वजनिक आयोजनों में शामिल नहीं किया जाता था तब अमेरीकी थियेटरों में गोरे अभिनेता अपने चेहरे को ब्लैक समुदाय समुदाय को दर्शाने के लिए रंगते थे जिसे वहां ‘ब्लैकफेस’ कहा गया। ठीक उसी तरह भारतीय फिल्मों में, खासकर बॉलीवुड में, ब्राउनफेस का इस्तेमाल किया जाता है।

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त्वचा के रंग में मामूली अंतर भी आज किसी शख्स, खासकर महिलाओं को अपनी त्वचा पर तरह-तरह के उत्पाद इस्तेमाल करने के लिए मजबूर करता है। ऐतिहासिक रूप से रंगभेद ब्रिटिश या अन्य यूरोपीय उपनिवेशवाद के आने से पहले ही मौजूद था। रंगभेद की परिभाषा उस भेदभाव की तरफ इशारा करती है जहां सिर्फ एक त्वचा के रंग के आधार पर भेदभाव किया जाता है। इस परिभाषा की भारत में स्थित रंगभेद से तुलना न करें तो बेहतर है। भारत में, ब्राह्मणवाद कई प्रथाओं को आकार देता है, रंगभेद उनमें एक हैं। ब्राह्मणवाद के लिए गोरी त्वचा पवित्रता और शक्ति का प्रदर्शन है। पवित्र होना सवर्ण होने की खासियत है।

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आज, गोरे होने की इस चाहत को हर जगह देख सकते हैं लेकिन रंगभेद को फिलहाल जितना बॉलीवुड ने सराहा है उतना शायद कहीं और देखने को मिले। हम इससे इनकार नहीं कर सकते हैं कि हिंदी फिल्म जगत को देखने और पूजने वाले कई हैं। इस जगत से निकले हर गीत, जुमले, फिल्म, कुछ पलों में वायरल हो जाते हैं। जहां मनोरंजन के साथ रंगभेद की खुराक भी मिल जाती है। मुख्य किरदारों के लिए ‘काले’ अभिनेताओं को आमतौर पर नहीं लिया जाता है। एक्टर्स द्वारा त्वचा गोरी करनेवाले प्रॉडक्ट्स के इस्तेमाल करने की सलाह मुफ़्त में दी जाती है। अगर हिसाब किया जाए तो बॉलीवुड में ऐसे गिने-चुने ऐक्टर्स ही हैं जिनकी रंगत सांवली या गोरी है। इसका परिणाम ये होता है कि फिल्मों में शायद ही ऐसी रंगत वाले किरदारों को जगह दी जाती है। अगर ज़रूरत पड़ी भी तो गोरे एक्टर्स को ही मेकअप लगाकर इन किरदारों में ढाल दिया जाता है।

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रंगभेद की परिभाषा उस भेदभाव की तरफ इशारा करती है जहां सिर्फ एक त्वचा के रंग के आधार पर भेदभाव किया जाता है। इस परिभाषा की भारत में स्थित रंगभेद से तुलना न करें तो बेहतर है। भारत में, ब्राह्मणवाद कई प्रथाओं को आकार देता है, रंगभेद उनमें एक हैं।

फिलहाल बॉलीवुड प्रोग्रेसिव बनने की ओर फोकस कर रहा है। प्रोग्रेसिव फिल्में अवॉर्ड जीतने के मौके बढ़ा देती हैं, फिर क्यों न बनाएं, भले ही इन फिल्मों में अलग-अलग समुदायों के लोगों का प्रतिनिधित्व शायद ही कभी हो। काले त्वचा वाले किरदार गोरी त्वचा वाली अभिनेत्रियों को करने के लिए दे दिए जाते हैं मतलब उनके गोरे चेहरे को गहरे रंग से पोत दिया जाता है। ऐसी फिल्म प्रोग्रेसिव कम, बल्कि खतरनाक ज़्यादा होती हैं। इनकी इस चाल से एक बात लागू होती है कि सांवले, काले, गहरे रंग की त्वचा वाले लोगों के पास प्रतिभा नहीं होती। हमारा रूढ़िवादी समाज कहता है कि प्रतिष्ठा उनको मिलती है जो योग्य होते हैं, जिनके पास प्रतिभा होती है। प्रतिभा उनके पास ही होते हैं जिनका रंग ‘साफ’ है, जो ऊंची जाति से आते हैं। इन बातों को रोज करोड़ों बच्चे-युवा सुनते हैं। उनके आत्मविश्वास के टूटने की आवाज़ शायद ही बॉलीवुड सुन पाए। भले ही फिल्मी जगत ने सांवले, काले एक्टर्स को स्वीकार किया हो लेकिन उनको केंद्र में रखकर फिल्मों के मुख्य किरदार गिने-चुने ही लिखे गए हैं। क्योंकि रोमांटिक और एक्शन फिल्में इन सांवले, काले एक्टर्स से नहीं बिकतीं।

सांवले, काले लोग काबिल होते हैं या नहीं इसका पता सिर्फ फेयर एंड लवली जो कि अब ग्लो एंड लवली के नाम से बाज़ार में मौजूद है। इन विज्ञापन के पीछे पूंजीवाद और पितृसत्ता काम करते हुए नज़र आते हैं। इन उत्पादों की परछाई में रूढ़िवादी छवियां मौजूद होती हैं। एक ऐसी लड़की की छवि जो सुंदर, गोरी, लंबी, पतली हो। उन लड़कियों और औरतों को नज़रअंदाज कर दिया जाता है जो इस छवि से अलग होती हैं। पितृसत्तात्मक समाज की आंखों में प्यारा बनने के लिए फेयर एंड लवली लगाकर, ‘बेयोंसे शर्मा जाएगी’ पर ठुमकना ही एकमात्र ज़रिया है। इन भेदभावों के विरोध में हज़ार लेख मिल जाएंगे लेकिन बॉलीवुड अपनी इन रंगभेदी आकांक्षाओं को गली बॉय, बाला, सुपर 30, उड़ता पंजाब, द फैमली मैन-2 में धीरे-धीरे घोलकर बेचता रहेगा और शायद आपके कान में आ कर फुसफुसा दे, “धूप में मत जाना।”

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