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बक्सवाहा के जंगल काटने की तैयारी ज़ोर-शोर से चल रही है। बरसों से हमारे देश में ‘सेव द टाइगर’ अभियान चलाया जा रहा है। ये दोनों बातें रियल हैं और मैं बात रील की करने जा रही हूं। आखिर रियल लाइफ से ही प्रभावित होकर तो एक रील बनती है। ओटीटी प्लेटफार्म ऐमजॉन प्राइम वीडियो पर अमित वी. मसूरकर द्वारा निर्देशित ‘शेरनी’ एक बेहद गंभीर विषय पर बनी फिल्म है। इस फिल्म की कहानी ऐसी है जिससे हर कोई परिचित है, बस नज़र में आने की देर है। तो कहानी कुछ ऐसी है कि एक शेरनी T12 जो जंगल की कमी और वहां अतिक्रमण बढ़ने के कारण आस-पास रहनेवाले आदमियों को अपना शिकार बना रही है। उसे आदमखोर कहकर वन विभाग उसकी जान के पीछे पड़ गया है लेकिन कुछ अधिकारी होते हैं जुनूनी, संवेदनशील और गंभीर, जो अपने काम और ज़िम्मेदारी को समझते हैं और उसे निभाते भी हैं। इस फिल्म में ऐसी ही एक किरदार हैं विद्या विन्सेंट। विद्या विन्सेंट (विद्या बालन) की पोस्टिंग लंबे समय के डेस्क वर्क के बाद डिविज़न फोरेस्ट ऑफिसर के पद पर मध्यप्रदेश के जंगलों में हुई है। अपनी ज़िम्मेदारियों के प्रति बेहद ईमानदार विद्या काम में कोई बदलाव न पाकर बेहद दुखी है और वीडियो कॉल के ज़रिये अपने पति से नौकरी छोड़ने की बात करती है।

मुबंई में प्राइवेट जॉब करने वाला पति अपनी नौकरी की अनिश्चिता के कारण दबी आवाज़ में उसे नौकरी जारी करने को कहता है। पितृसत्तात्मक सोच रखने वाले डिपार्टमेंट में विद्या खुद को कई बार बहुत घुटन से घिरा महसूस करती है। काम के प्रति बेहद सजग विद्या के अधिकारी और सहयोगी उसकी चिंता और सवालों को लगातार नजरअंदाज़ करते दिखते हैं। इसी बीच गांव में शेरनी द्वारा लोगों पर हमला होने की घटना घटित होती है। गांव के लोगों की जान लेने वाली शेरनी की पहचान होने के बाद वन विभाग के लोग अपनी धीमी चाल से काम पर लग जाते हैं। आगामी चुनाव के माहौल के कारण राजनैतिक दल गांववालों को भड़काते हैं और इसे चुनाव का विषय बनाकर अपनी-अपनी राजनीति में लग जाते हैं। शेरनी को ज़िंदा पकड़कर सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने के लिए विद्या विन्सेंट योजना बनाती है पर साथ में उस पर गांव वालों की उग्र भावनाओं का भी बेहद दबाव है।

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बंसल (बिजेन्द्र कालरा) जैसे विभाग के वरिष्ठ अधिकारी राजनैतिक दबाव और काम के प्रति गैरज़िम्मेदार होने के कारण समस्या का सामाधान नहीं बल्कि तुरंत कार्रवाई चाहते हैं ताकि मामला शांत हो जाए। वन विभाग की कार्रवाई पर पूरा पॉलिटिकल खेल चलता है। ‘नेता जी’ के आगमन के बाद वह इस मिशन में ऐसे लोगों को टीम को ज़िम्मेदारी सौंप देते हैं जिनका वन विभाग और उसके नियम-कायदे कानून से दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं है। बिट्टू भैय्या (शरत सक्सेना) जैसे लोग जो कहते तो खुद को प्रकृति संरक्षक हैं, लेकिन असल में उनका संरक्षण उनके द्वारा शिकार किए हुए जानवरों के नबंरों पर गर्व महसूस करना है। शेरनी को बचाने के इस मिशन में हसन नूरानी (विजय राज), जो एक पास के ही कॉलेज में जूलॉजी के प्रोफेसर हैं और गांव के कुछ लोग जैसे ज्योति (समपा मंडल), जो पंचायत सदस्य है विद्या का साथ देते हैं।

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फिल्म में वही माहौल दिखाया गया है जैसी ज़रूरत थी और जैसा हमारा सामाजिक परिवेश है। वन विभाग में महिला अधिकारी की उनके पुरुष सहयोगियों के द्वारा कम अहमियत देना या फिर घटनास्थल पर उनके जाने पर गांव वालों द्वारा तंज करना कि ‘महिला को भेज दिया’ यही दिखाता है कि किसी पद पर कार्यरत महिला अधिकारी का पहुंचना उसका अपने काम को करना भी हमारे पितृसत्तात्मक मानसिकता वाले समाज को कितना खलता है।

कहानी में आगे क्या होता है, विद्या शेरनी को बचाने में सफ़ल होती हैं या नहीं वह जानने के लिए तो आपको फिल्म देखनी होगी। फिल्म की अन्य खूबियों पर बात करें तो निर्देशक द्वारा एक बेहद संवेदनशील विषय मनुष्य और जानवर के संबंध को चुना गया है। धीमी गति से चलती फिल्म में क्लाईमैक्स के नाम पर कुछ तड़का लगाया जा सकता था, लेकिन यहीं निर्देशक की समझदारी कही जा सकती है कि उन्होंने विषय की संवेदना को समझते हुए उसे वास्तविक रहने दिया। फिल्म में प्रकृति के प्रति उदासीन और क्रूरता को दिखाने के लिए कुछ बेहतर दृश्यों और भाव को एक साथ पिरोकर पेश किया गया है। यह फिल्म आदमी और जानवर के कॉन्फ्लिक्ट के भीषण परिणाम पर शांत रहकर इशारा करती है। सिस्टम, जिसमें डर में अपने ही दफ्तर में छिपता अधिकारी और धूल में दीमक खाई हुई फाइलों के दृश्य सरकारी विभाग के ढ़ांचे और व्यवस्था की वास्तविकता को दर्शाते हैं। 

फिल्म में वही माहौल दिखाया गया है जैसी ज़रूरत थी और जैसा हमारा सामाजिक परिवेश है। वन विभाग में महिला अधिकारी की उनके पुरुष सहयोगियों के द्वारा कम अहमियत देना या फिर घटनास्थल पर उनके जाने पर गांव वालों द्वारा तंज करना कि ‘महिला को भेज दिया’ यही दिखाता है कि किसी पद पर कार्यरत महिला अधिकारी का पहुंचना उसका अपने काम को करना भी हमारे पितृसत्तात्मक मानसिकता वाले समाज को कितना खलता है। अधिकारी के अनुभव और पद को सिर्फ इसलिए कम आंका जाता है क्योंकि योजना बनाने वाली एक महिला अधिकारी है। इस तरह का व्यवहार हमारे सामाजिक परिवेश में बिल्कुल सामान्य है जब एक महिला काम पर जाती है और अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाने की कोशिश करती है तो भी उसे लोगों की बातें सुननी पड़ती हैं। उसके काम को कम गंभीरता से लिया जाता है। 

शेरनी का एक दृश्य

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वहीं, दूसरे पहलू में धीमी आवाज़ में संदीजगी से फिल्म में कई जगह उस स्वतंत्र स्त्री को भी दिखाया गया है जो कि पितृसत्तात्मक समाज के लिए खतरा है। शेरनी के बच्चों को बचाने में लगी विद्या साफ शब्दों में कहती है कि मुझे बच्चा पैदा नहीं करना है। वहीं, अपनी बेटी की पढ़ाई और उसकी रुचि को पंख लगाती ज्योति वह चेहरा दिखाती है जिसकी वास्तव में ज़रूरत है। इसी कहानी का एक पहलू यह है जहां एक दृश्य में दो अलग पृष्ठभूमि की दो महिलाओं को शेरनी के बच्चों की जान बचाने पर हाथ थामें, गले लगते दिखाया गया है। महिला अधिकारी को गांव वाली महिलाएं खुलकर अपनी समस्याएं बताती हैं, वे अपने काम के नये विकल्प बनाती हैं।

फिल्म में जंगल, वन-विभाग, राजनीति और सामान्य गांव जन की जीवनी की जटिलता को बहुत सीधी तरीके से बुनकर पेश किया गया है। विद्या बालन जैसी सरीखी कलाकार जो लीक से हटकर काम करती हैं उन्होंने अपने किरदार को अपने दमदार अभिनय के साथ पूरी ईमानदारी से निभाया है। पर्दे पर वन विभाग अधिकारी की भूमिका में वह बिल्कुल उतनी ही सामान्य लगी हैं जितना उन्हें लगना था। आंखों में बेबसी और काम करने की तमन्ना को उन्होंने अपनी अदाकारी से साफ दिखाया है। फिल्म के बाकी कलाकारों ने अपने काम को दी हुई ज़िम्मेदारी के अनुसार सही निभाया है। फिल्म में केवल एक गीत है जो कहानी के अनुसार सही तंज है। जिसको लिखा हुसैन हैदरी ने है और जिसे मयूर नरवेकर (बंदिश प्रोजेक्ट) ने अपनी धुनों से सजाया है।

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मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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