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यह बात अक़्सर ही उठाई जाती रही है कि वे फिल्में जो महिलाओं ने लिखी और निर्देशित की हैं, पुरुषों द्वारा बनाई गई फिल्मों से अपेक्षाकृत अधिक संवेदनशील, स्पष्ट और स्त्री-जीवन पर केंद्रित होती हैं। दरअसल, औरतें औरतों को ‘ऑब्जेक्ट’ के रूप में नहीं प्रस्तुत करती बल्कि वे यह समझती हैं कि लंबे समय से चलती आ रही यह परंपरा बेतुकी है। औरतों के जीवन के अनेक आयाम हैं, जिन्हें सामाजिक अभिव्यक्ति की आवश्यकता है और यह एक या दो महिलाएं अकेली नहीं कर सकती क्योंकि पितृसत्तात्मक समाज की गहरी जड़ें उन्हें ऐसा करने नहीं देंगी। हालांकि यह प्रवृत्ति अब बदल रही है और इस दिशा में सकारात्मक प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। बीते कुछ समय में फ़िल्मों के तकनीकी पक्ष में महिलाओं की भागीदारी से ही ‘डॉली किट्टी और पांच चमकते सितारे’, ‘छपाक’, ‘थप्पड़’, बुलबुल जैसी फिल्में रिलीज हुई हैं, जिन्होंने महिलाओं की भूमिकाओं का नया पक्ष दर्शकों के सामने रखा है। उसी कड़ी में हैं, रेणुका शहाणे द्वारा लिखी और निर्देशित फ़िल्म- त्रिभंगा, जिसमें मुख्य भूमिकाओं में हैं, काजोल, तन्वी आज़मी और मिथिला पालकर।

फ़िल्म की कहानी साधारण होते हुए भी ख़ास है। यह तीन पीढ़ी की महिलाओं के बारे में है, जिनके व्यक्तित्व, संघर्ष और इच्छाएं-एक दूसरे से पूरी तरह अलग हैं। यह अपने अधिकारों को लेकर जागरूक और शोषण के ख़िलाफ़ ज़िद्दी रवैया अपनाने वाली महिलाओं की कहानी है। साथ ही यह दिखाती है कि कैसे समाज और परिवार की भूमिका और इसके पीछे निहित पितृसत्तात्मक शोषण को कई बार स्त्रियां भावनात्मक द्वंद्व में उलझकर झेलने को मज़बूर है। फ़िल्म ज़ोर देकर यह बताती है कि सामाजिक रूप से ‘नॉर्मल’ दिखने में कितनी ही बार औरतों की इच्छाओं और उनके चयन के अधिकार को कुचल कर ख़त्म कर दिया जाता है और यह कहानी तबतक चलती है, जबतक पितृसत्ता को चुनौती देने के लिए कोई ‘अभंग’ नहीं उठती।

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इस कहानी में ओडिसी नृत्य की तीन भंगिमाओं का प्रयोग करते हुए लेखिका ने तीनों किरदारों के व्यक्तित्वों की व्याख्या की है। नयनतारा आप्टे (तन्वी आज़मी) जो एक चर्चित लेखिका और अनुराधा की मां है, वे अभंग हैं। अभंग यानी अखंडित, जो टूटती नहीं है, चाहे कितनी भी समस्याएं आ जाएं, अपनी शर्तों से हटकर चलना नहीं स्वीकारती। नयनतारा की बेटी, अनुराधा (काजोल) जो फ़िल्म अभिनेत्री और नृत्यांगना है, त्रिभंग है यानी अजीब, विषम फिर भी सुंदर और उसकी बेटी माशा जो कि हाउसवाइफ़ है, समभंग यानी पूरी तरह से संतुलित है। नयनतारा और अनुराधा अकेली माएं (सिंगल मदर) हैं। उन दोनों ने समाज और पुरुषों के नियमों को स्वीकार नहीं करते हुए अपनी शर्तों पर जीवन जीना तय किया। वहीं माशा संयुक्त परिवार (जॉइंट फैमिली) में रहती है, जिसका संचालन पितृसत्तामक मूल्यों के अनुसार होता है।

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यह फिल्म बताती है कि पुरुषों की भावनाएं दरअसल एक प्रपंच हैं। औरतें ही औरतों की हितैषी हैं, वे ही एक दूसरे की साथी हैं। यह बात नयन की साथी विमल, अनुराधा और नयन के एक दूसरे के प्रति भाव से दर्शाया गया है।

फिल्म के शुरुआती शॉट नयनतारा आप्टे और उनकी जीवनी-लेखक हिंदी के पीएचडी छात्र मिलन के आपसी बातचीत का है, जिसमें लेखिका कांपते हाथ से अनु और उसके भाई को एक पत्र लिख रही होती है और मिलन उनसे कुछ सवाल पूछता है जिसके जवाब में वे शराब पीते हुए कहती हैं, “बैठे-बैठे सोच रही थी क्या अब भी कुछ जीना बाकी है, नहीं – कुछ मरना बाकी है।” आगे की कहानी में मालूम चलता है कि नयनतारा और उनकी बेटी के संबंध अच्छे नहीं थे। नयनतारा की बेटी उन्हें अच्छी मां नहीं मानती थी और जीवन भर इतने मज़बूत निर्णय लेने वाली लेखिका, जिसने अपने दोनों बच्चों का पालन-पोषण अकेले किया था, बुढ़ापे में लगभग अकेली थी और इसी अकेलेपन की अभिव्यक्ति थी-‘ हां, कुछ मरना बाकी है।’ इसी शॉट में नयनतारा को अटैक आता है और वह कोमा में चली जाती हैं, जहां से फ़िल्म फ़्लैशबैक में जाती है।

फ़िल्म की कहानी एक परिवार के बारे में हैं जो टूट जाता है। टूटता इसलिए है क्योंकि इस परिवार की स्त्री अपने सपनों का त्याग नहीं करती, समझौता नहीं करती। नयनतारा, उसका पति, दो बच्चे और सास एक परिवार के रूप में रहते थे, जहां उससे अपेक्षा की जाती थी कि वह पति के लिए रसोई तैयार करे, बाहर से आने पर उसकी आवभगत करे और बच्चों और सास का ख्याल रखे। चूंकि नयनतारा को लेखन में विशेष दिलचस्पी रहती है, इसलिए वह दिनभर एकांत में अपना उपन्यास लिखती रहती है। कुछ समय बाद उसे अपने पहले उपन्यास के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिलता है, उसके उपलक्ष्य में बधाई देने उसके कुछ दोस्त घर आते हैं, वह उनके साथ बैठी होती है और बातचीत करती है।

यहां गौर करने की ज़रूरत है कि भारतीय परिवारों में किस तरह से सामंतवादी मूल्य अंतर्निहित हैं। बाहर भले ही किसी स्वनिर्मित महिला विद्वान की सराहना की जाए लेकिन परिवार में उसे स्वतंत्र रूप से बुद्धजीवी के रूप में अपनी क्षमताओं के विस्तार के लिए समय नहीं दिया जाता है। उससे अपेक्षा की जाती है कि वह औरत है, कुछ और होने से पहले वह बहू, पत्नी और मां है, इसलिए अपनी सारी इच्छाओं का त्यागकर यदि वह इन ज़िम्मेदारियों को निभाती है, तब ही वह आदर्श स्त्री मानी जाएगी, वरना नहीं। इस फ़िल्म में नयन की सास भी यही कहती है कि वह घर का कोई काम नहीं करती, बस लिखती रहती है तो किसलिए उसकी तारीफ़ की जाए! इसके उलट पुरुषों के लिए ऐसा नहीं है। पुरुष बिना कारण ही अपने दोस्तों की महफ़िल बुलाकर गप्पे लड़ा सकता है, और पत्नी के सामने फ़रमाईश रख सकता है और ‘पति की इच्छा पूरी करना तो पत्नी का कर्तव्य होता ही है!’

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तस्वीर साभार: Netflix

नयनतारा एक नारीवादी स्त्री है। लेखन उसका जुनून है और लिखे बिना वह नहीं रहना चाहती, इसलिए वह त्याग नहीं करती बल्कि अपने सपने को चुनती है। वह परिवार और स्वतंत्रता में से एक चुनती है और बच्चों के साथ अलग रहने का निर्णय लेती है। नयनतारा औरतों के शोषण के पीछे सामाजिक-आर्थिक समीकरणों की सच्चाई से अवगत होती है इसलिए ही वह तय करती है कि अपने बच्चों को वह उनके पिता का नहीं बल्कि अपना नाम देगी क्योंकि उनकी समस्त आर्थिक और भावनात्मक ज़रूरतें वह पूरी कर रही है। पति से अलग होने के बाद नयन ने नए सिरे से जीवन शुरू किया। वह कई बार प्रेम में पड़ी। हालांकि उसने एक गलत व्यक्ति पर विश्वास करते हुए प्रेम किया जिसने उसकी ग़ैर-मौजूदगी में उसकी बेटी अनुराधा का यौन शोषण किया। नयनतारा ने स्वतंत्र निर्णय लिए और अपनी शर्तों पर जीवन जीना तय किया , जिसमें कुछ निर्णय गलत भी रहे, लेकिन फिर भी एक औरत के लिए अपने अधिकारों को समझना और उनका उपभोग करना महत्वपूर्ण है।

ज़रूरी बात यह भी है कि यदि एक स्त्री मज़बूत होगी और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होगी तो उसका प्रभाव अन्य स्त्रियों पर भी होगा। वे भी अपने निर्णय स्वयं लेंगी। नयनतारा की बेटी अनुराधा भी उन्मुक्त महिला थी। उसने अपना जीवन अपने हिसाब से तय किया। औरतें जबतक अपने अस्तित्व की लड़ाई को नहीं समझेंगी, पुरुष उनपर अपनी शर्तें थोपते हुए उनका इस्तेमाल करेंगे। अनुराधा की बेटी माशा पुरुषों की इस प्रवृत्ति में उलझ गई। सामान्य जीवन और परिवार की इच्छा ने उसकी आज़ादी को ख़त्म कर दिया। यह फ़िल्म भावनात्मक लहज़े को सामाजिक परिभाषा से अलग दिखाती है। यह फिल्म बताती है कि पुरुषों की भावनाएं दरअसल एक प्रपंच हैं। औरतें ही औरतों की हितैषी हैं, वे ही एक दूसरे की साथी हैं। यह बात नयन की साथी विमल, अनुराधा और नयन के एक दूसरे के प्रति भाव से दर्शाया गया है।

तकनीकी पक्ष पर ग़ौर करें तो शुरुआत में यह थोड़ी बोझिल लगती है और अनुराधा के रूप में काजोल ‘ओवरएक्टिंग’ करती दिखती हैं। हालांकि बाद में वह सहजता से अपने किरदार में उभरती हैं। नयनतारा की भूमिका में तन्वी आज़मी बेहद जंचती हैं। उनके हाव-भाव, आख़िर की निराशा ने कहानी को और अधिक उभार दिया है। माशा के रूप में मिथिला पालकर संवाद नहीं कर पातीं, हो सकता है यह उनकी सीमित मौजूदगी के कारण हो। मिलन का किरदार बढ़िया था, हिंदी के पीएचडी छात्र के रूप में उनकी मौजूदगी सटीक लगी। फ़िल्म के शॉट्स और सिनेमैटोग्राफ़ी सहज और बेहतर लगे। कुल मिलाकर यह फ़िल्म मौजूदा समय में साधारण होकर भी बेहद अलग है,जो खुलकर पितृसत्ता, लिव-इन रिलेशनशिप, सामाजिक-आर्थिक असमानता और सांस्कृतिक भेदभाव जैसे मुद्दों पर बातचीत करती है। यह बताती है कि अपना स्थान बनाने के लिए औरतों को कुछ बहुत मज़बूत फ़ैसले लेने होंगे, अन्यथा सामान्य दिखने की आड़ में कितनी ही औरतों व उनकी इच्छाओं का दम घोंट दिया जाएगा।

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तस्वीर साभार : Netflix

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