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कहने को तो हमारे देश में दहेज प्रथा को खत्म करने के लिए क़ानून काफ़ी पहले बन चुका है, लेकिन इसके बावजूद यह सामाजिक समस्या आज भी वैसे की वैसे ही बनी हुई है। इसकी जड़ें इतनी मज़बूत हो गई हैं कि अमीर हो या गरीब, हर वर्ग के लोगों को इसने जकड़ रखा है। दहेज समाज में गर्व का मुद्दा बन चुका है, जिसके तहत यह माना जाता है कि जिसको जितना ज्यादा दहेज मिलता है, वह उतना ही योग्य है। इसका प्रदर्शन दहेज लेने और दहेज देने वाले लोग गांव में ढिंढोरा पीटकर करते हैं लेकिन क़ानूनी कार्रवाई से बचने के लिए लोग इसे अकसर ‘गिफ़्ट’ का नाम दे देते हैं।

कुछ सालों पहले हमारी बस्ती में एक शादी हुई, जिसमें लड़का किसी सरकारी नौकरी में था। उस लड़के को काफ़ी ज़्यादा पैसा और सामान दिया गया और शादी में काफ़ी ज़्यादा खर्च किया गया। ऐसा करना एक मज़दूर परिवार की कल्पना से भी परे था। उस शादी के बाद हमारी बस्ती में वैसी ही महंगी शादियों का चलन बढ़ने लगा। लेकिन मज़दूर परिवार की सीमित आमदनी में ऐसा कर पाना सबके लिए मुश्किल था इसलिए लोगों ने कर्ज़ लेना शुरू किया। शुरुआती दौर में कर्ज़ से एक-दो शादियां तो हो गईं, लेकिन उसके बाद परिवारों की हालत खराब होने लगी। एक परिवार में तो पिता ने कर्ज़ के बोझ के आगे घुटने टेक दिए और अपनी जान दे दी। इस घटना के बाद बस्ती में महंगी शादियों के चलन में थोड़ी कमी आई। अब लोगों ने क़र्ज़ लेना तो कम किया लेकिन अपनी पूरी जमापूंजी और कई बार खेत बेचकर शादी करने में वे तनिक भी बाज नहीं आते हैं।

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बस्ती में महंगी शादियों की इस प्रथा ने धीरे-धीरे लड़कियों को बोझ मानने की भावना को और तेज़ कर दिया है, जिसकी वजह से उनको ज़्यादा पढ़ाया भी नहीं जाता है। इतना ही नहीं, कई परिवारों में दहेज की वजह से महिला हिंसा के मामले भी सामने आए हैं। पितृसत्तात्मक समाज में दहेज प्रथा महिला हिंसा के प्रमुख कारणों में से एक है। जिन लड़कियों की शादी हो जाती है, उन्हें शादी के बाद ये हिंसा झेलनी पड़ती है, लेकिन इस प्रथा की वजह से लड़कियों को जन्म से ही भेदभाव जैसी हिंसा का सामना जीवनभर करना पड़ता है।

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बस्ती में महंगी शादियों की इस प्रथा ने धीरे-धीरे लड़कियों को बोझ मानने की भावना को और तेज़ कर दिया है, जिसकी वजह से उनको ज़्यादा पढ़ाया भी नहीं जाता है।

इस बीच जब कोई परिवार दहेज न लेने का फैसला करता है तो समाज उसे बेहद हेय दृष्टि से देखता है। समाज इसे ऐसे देखता है, जैसे ज़रूर उस लड़के में कोई कमी होगी, इसलिए कोई दहेज नहीं लिया गया और समाज में भी उसकी कोई इज्ज़त नहीं रह जाती है। एक बार मेरे पास के गांव में एक लड़की ने शादी के दौरान ही शादी से इनकार कर दिया था, क्योंकि लड़के वालों की मांग बढ़ती जा रही थी। कई अख़बारों में इस घटना की खबर छपी और ख़ूब वाहवाही भी हुई, लेकिन इसके बाद उस लड़की की जल्दी शादी नहीं हो पाई और सात साल बाद उसे अपने से कम पढ़े-लिखे लड़के से शादी करनी पड़ी।

सामान्य बोलचाल में जब हम दहेज पर बात करते हैं तो हर दूसरा इंसान इसका विरोध करता हुआ ख़ुद को प्रगतिशील बताने की कोशिश करता है, लेकिन जैसी ही शादी की बात आती है तो हमेशा इसे महंगा और भव्य स्वरूप देना चाहता है। शहरों में आजकल दहेज की बजाय महंगी शादी का चलन ख़ूब देखने को मिलता है, जिसमें बड़े-बड़े होटल या लॉन में शादी की जाती है जहां दिखावा अपने चरम पर होता है। यह दहेज प्रथा का नया रूप है, जो देखने में तो दहेज जैसा नहीं लगता पर होता दहेज ही है, जिसमें लड़की वाले को इन महंगे होटल या लॉन का खर्च उठाने का दबाव दिया जाता है। शहरों में होने वाली इन महंगी शादियों ने गांव में खूब प्रभाव डाला है।

ऐसे चलन के बीच दहेज प्रथा को कैसे दूर किया जाए ये बड़ी चुनौती है, क्योंकि इससे न केवल लड़के-लड़की के परिवार वाले बल्कि कई बारे वे ख़ुद भी प्रभावित दिखते हैं। जब लड़का महंगी चीज़ों की चाहत सामने रखता है और लड़की महंगे लहंगे की मांग। कहते हैं कि किसी भी सामाजिक बदलाव में युवा पीढ़ी अहम भूमिका निभाती है, लेकिन जब युवा पीढ़ी ख़ुद बदलाव के विरोध में आने लगे तो ये अधिक चिंता का विषय बनने लगता है। इसलिए हम बहुत से तो नहीं पर अपने आप से दहेज प्रथा और महंगी शादी के ख़िलाफ़ खड़े होने की पहल कर सकते हैं और अगर ऐसा करने में थोड़ा भी पैर कमजोर पड़े तो हमें याद रखना होगा कि लैंगिक हिंसा, भेदभाव और लड़कियों को बोझ मानने के पीछे दहेज प्रथा बहुत अहम भूमिका अदा करती है। ये दहेज और महंगी शादी का ही दबाव है जो आज भी हमारा पितृसत्तात्मक समाज लड़कियों की पढ़ाई और उनके हुनर विकास की जगह उसकी शादी के लिए पैसे बचाने को वरीयता देना है।  

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तस्वीर : रितिका बनर्जी फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए

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