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‘मेरी इच्छा है कि मेरी लाश को अग्नि मेरा छोटा भाई दे और कोई नहीं, मेरा पति भी नहीं’ यह कहकर राजस्थान में नागौर जिले के हेमपुरा गांव की सुमन ने कथित तौर पर कुएं में कूद कर अपनी जान दे दी जिसके बाद सुमन के चाचा ने पुलिस थाने में जाकर रिपोर्ट की और बताया कि वह 4-5 दिनों से परेशान थी। शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया जिसमें सामने आया कि कुएं में कम पानी होने की वजह से सुमन की मौत हुई। मौत के बाद से ही सुमन का सुसाइड नोट सोशल मीडिया पर काफी चर्चा में है जिसमें सुमन ने अपनी मौत का जिम्मेदार किसी विशेष व्यक्ति को नहीं बल्कि पूरे समाज को ठहराया है। सुमन ने अपनी मौत का ज़िम्मेदार एक कुप्रथा को बताया है जो राजस्थान में ‘आटा साटा’ के नाम से प्रचलित है। आटा-साटा प्रथा के अंतर्गत अगर किसी लड़के का विवाह किसी लड़की से होता है तो साथ में लड़की की तरफ से किसी लड़के की शादी लड़के की बहन से की जाती है यानि अदला-बदली। साफ शब्दों में कहें तो अगर किसी घर से एक लड़की जाएगी तो दूसरी लड़की बहु के रूप मे आएगी। इस प्रथा के कारण लड़के का भविष्य तो सुरक्षित रहता है लेकिन लड़कियों को अपनी सभी इच्छाओं से समझौता करना पड़ता है। कई बार यह सब छोटी उम्र में ही तय कर दिया जाता है कि इस लड़के के साथ इस लड़की को भेजा जाएगा।

इस प्रथा में जरूरी नहीं कि यह सगे बहन भाइयों में ही हो। दूर के रिश्तों में भी ऐसा कर दिया जाता है। यह प्रथा केवल राजस्थान में ही नहीं बल्कि हरियाणा और मध्यप्रदेश के अलावा अन्य कई राज्यों में प्रचलित है। हालांकि इस प्रथा के नाम अलग-अलग हैं जैसे अदला-बदली शादी और भी बहुत कुछ। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक सुमन की शादी 2 साल पहले बूढ़ीगांव में हुई थी कुछ समय वहां रहने के बाद उसका पति काम करने विदेश चला गया जिसके बाद वह मायके यानि अपने घर में आकर रहने लगी। पति सुमन से कम पढ़ा-लिखा था, जो शादी के बाद मजदूरी करने विदेश चला गया। सुमन के चाचा ने पुलिस को बताया कि सुमन आठ महीनों से हमारे पास ही रह रही है। वह चार पांच दिनों से मानसिक रुप से परेशान थी जिसके कारण उसने कुएं में कूद कर अपनी जान दे दी। हालांकि इस बात का जिक्र कही नहीं है कि सुमन का आटा साटा किस तरह से हुआ था। सुमन ने नोट में साफ तौर पर यह ज़िक्र किया है कि आटा-साटा से कैसे एक 70 साल के बूढ़े का विवाह 17 साल की लड़की से तय कर दिया जाता है। साथ ही सुमन ने इस कुप्रथा के ख़िलाफ़ अभियान चलाए जाने की भी अपील की।

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आटा-साटा प्रथा के कारण लड़कियों को उनके सपनों से और अपने मूल अधिकारों से दूर कर दिया जाता है। यह प्रथा एक तरह से लड़कियों के मानवाधिकार का हनन है जो किसी भी कीमत पर नहीं होना चाहिए। कितनी गंभीर बात है कि महिलाएं मानवाधिकारों से भी वंचित हैं। किसी को किसके साथ जीवन बिताना है या कैसा जीवन जीना है यह तय करना उसका मूल अधिकार है। अधिकार तो दूर यहां लड़कियों को कानून का सहारा लेने की भी इजाज़त नहीं हैं। उदयपुर जिले में रहने वाली काजल ने फेमिनिज़म इन इंडिया से बातचीत के दौरान कहा कि आटा-साटा ज्यादातर उन मामलों में देखा जाता है जहां लड़के की शादी नहीं हो पा रही होती है ऐसी स्थिति में लोग आटा-साटा कर देते हैं ताकि शादी के लिए कोई लड़की मिल जाए लेकिन परेशानी इसमें यह होती है कि लड़की की ना तो कोई इच्छा पूछी जाती है और ना ही उसके अनुरुप लड़के की कोई योग्यता देखी जाती है।

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‘आटा साटा’ प्रथा के अंतर्गत अगर किसी लड़के का विवाह किसी लड़की से होता है तो साथ में लड़की की तरफ से किसी लड़के की शादी लड़के की बहन से की जाती है यानि अदला-बदली।

काजल बताती है कि उनके क्षेत्र में हाल ही में एक दसवीं पास लड़के की शादी ग्रेजुएशन कर रही लड़की से आटा-साटा के तहत करवा दी गई। काजल बताती हैं कि आटा-साटा के तहत लड़की को बांध दिया जाता है जिससे अगर उसे कोई परेशानी हो रही होती है और वह कोई कदम उठाती है तो उसके भाई की परेशानी बढ़ जाती है। अगर लड़की अपने घर जाती है तो उसकी भाभी को अपने घर बुला लिया जाता है। लड़की के कुछ करने पर सीधा असर उसके भाई की शादी पर होता है। कई बार शादी टूटने तक की स्थिति पैदा हो जाती है। अगर परिवार अच्छा है तो सब सामान्य रहता है और अगर ऐसा नहीं होता है तो लड़की मजबूर हो जाती है जिसमें से कुछ सुमन जैसी भी होती हैं। आटा-साटा के बीच कानून का कोई मतलब नहीं रह जाता। इस तरह की प्रथाओं को बरकरार रखने का जिम्मा यहां की पंचायतों का होता है। खौफ़ इतना है कि कोई इस प्रथा के बीच में नहीं बोल पाता क्योंकि बोलने का अवसर ही नहीं दिया जाता है। आटा साटा तोड़ने पर जाति पंचायत द्दारा परिवार को आर्थिक दंड, सामाजिक बहिष्कार जैसी स्थिति का सामना करना पड़ता है। अजमेर ग्रामीण क्षेत्र में महिला सशक्तिकरण पर काम कर रहे महिला कल्याण मंडल के सदस्य बताते हैं कि यहां आटा-साटा प्रथा बेहद सामान्य है। हालांकि इससे कोई परेशानी नहीं होती लेकिन ऐसा अक्सर होता है कि लड़की को उसकी योग्यता अनुसार लड़का नहीं मिलता।

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बहुत से लोगों का मानना है कि इस प्रथा के कारण लड़की ढूंढने में परेशानी नहीं होती और दहेज लेन-देन की दिक्कत भी नहीं होती लेकिन ऐसा करना सही परिवार की नज़र में होता है क्योंकि उन्हें किसी तरह से शादी से खुद को निपटाना होता है असल समस्या आगे चलकर लड़की को झेलनी पड़ जाती है। आटा-साटा से जुड़ए ऐसे बहुत कम मामले होते है जो कोर्ट तक पहुंचते हैं। जिन मामलों में सुनवाई हुई है उनमें कोर्ट ने ऐसा कोई फैसला नही दिया है जो इस प्रथा के खिलाफ हो, ऐसा लगता है कि कोर्ट का इस तरह की प्रथा का कोई अंदाजा नहीं है। मजिस्ट्रेट की जांच के अनुसार अगर शादी जोर जबरदस्ती से होती है तो ही कोर्ट फैसला देती है लेकिन केस वहां तक पहुंचते ही नहीं। लेकिन इन बात को नकारा नहीं जा सकता कि आटा-साटा के तहत लड़कियों की परेशानी कितनी गंभीर है। क्या लड़के के स्वार्थ में लड़की की खुशी ना देखना सही है, यह जड़ है उस मानसिकता की है जिनके लिए लड़कियों का जीवन कुछ खास मायने नहीं रखता यह प्रथा सीधे-सीधे लड़कियों के चुनने के अधिकार पर हमला करती है। अक्सर ऐसा देखा जाता है कि जिन लड़कों की शादी नहीं हो रही होती है उन्हें किसी भी लड़की के साथ भेज दिया जाता है, लड़के के स्वार्थ में क्या समाज इतना असंवेदनशील हो चुका है कि वह लड़की के जीवन के इतने बड़े फैसले पर बात करना या उसकी सहमति जानना भी जरूरी नहीं समझता।

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तस्वीर साभार: India Today

सीखने की प्रक्रिया में हूं, आधी पत्रकार आधी एक्टिविस्ट । लड़की जात हूं मगर कमज़ोर नहीं, समता और समानता ही मेरा धर्म है।

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