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हम पैदा होते हैं और एक चेकलिस्ट के साथ बड़े होते चले जाते हैं। एक तय उम्र तक पढ़ाई, फिर नौकरी, शादी, बच्चे और गृहस्थी में शामिल होना। ठीक वैसे ही जैसे हमारे माता-पिता ने किया था और उनके भी माता-पिता ने किया था। कोई व्यक्ति इससे इतर थोड़ा भी सोचता है तो उसको अजूबे की तरह देखा जाता है। शादी इस लिस्ट के सबसे महत्वपूर्ण टास्क में शामिल है। अगर कोई शादी की संस्था पर एक सवाल भी उठाता है तो समाज नाम की संस्था उस पर वार करने के लिए खड़े हो जाते हैं। सबसे कम उम्र में शांति के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित पाकिस्तान की मलाला युसुफज़ई द्वारा ब्रिटिश फैशन मैगजीन वोग को दिए एक इटंरव्यू को लेकर ठीक ऐसा ही हो रहा है। इस इंटरव्यू में उन्होंने शादी पर अपनी दो टूक बेबाक राय सामने रखी है। उनके इस बयान के बाद पाकिस्तान समेत दुनिया के कई हिस्सों में पितृसत्तात्मक लोग उन पर टूट पड़े। ट्विटर पर मलाला और उनके पिता दोनों को रूढ़िवादी लोगों ने बहुत ही भला-बुरा कहना शुरू कर दिया। दोंनो को ही बेहद ट्रोल किया गया। ट्विटर पर #ShameOnMalala हैशटैग भी चलाया गया।

शादी-प्रेम जहां दो व्यस्कों का निजी मामला है, वहीं हमारे समाज में इसे एक सार्वजनिक उत्सव की तरह मनाया जाता है। हजारों लोगों की मौजूदगी में पूरे बैंड-बाजे के साथ परिवार की रंज़ामदी से दो अजनबी लोगों को शादी कर साथ रहने की अनुमति दी जाती है। मलाला के इंटरव्यू पर जिस तरह की प्रतिक्रिया पाकिस्तान और दूसरी जगहों से आ रही है ऐसा ही बवाल भारत में भी उठ जाता है जब यहां पर कोई लड़की या महिला अपनी स्वतंत्र राय जाहिर कर सामाजिक और धार्मिक रीति-रिवाजों पर सवाल करती है। मलाला को निशाना बनाने वालों में बहुत से भारतीय भी हैं जो उनकी आलोचना कर रहे हैं।

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मलाला युसुफज़ई वोग मैगजीन के जुलाई अंक के कवर पेज पर हैं जिसमें सीरीन काले ने उनका इंटरव्यू लिया है। दुनिया, राजनीति, शिक्षा, निजी जिंदगी और भविष्य पर उन्होंने ने अपनी राय जाहिर की है। इसी इंटरव्यू में उन्होंने शादी को लेकर अपने मन की एक बात कही जो लोगों को नागवार गुज़री। पाकिस्तान समेत जहां दुनिया भर में वोग के कवर पेज की सराहना हो रही है। वहीं, इस पर पितृसत्तात्मक रूढ़िवादी सोच के लोगों ने हंगामा मचा दिया है। मलाला का कहना है, “मुझे यह समझ नहीं आता कि लोग शादी क्यों करते हैं। अगर आप जीवनसाथी चाहते हैं, तो आपको शादी के कागजों पर हस्ताक्षर क्यों करने है?” एक पित्तृसत्तात्मक समाज में लड़की जब-जब अपनी पसंद जाहिर करती है और सामाजिक ढ़ाचों पर सवाल करती है तब पुरुष सत्ता उस पर ऐसे ही वार करती है।

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बिना आडंबर और रीति-रिवाज को अपनाए बगैर जब दो लोग साथ रह सकते हैं तो वे शादी जैसी स्त्री विरोधी संस्था को क्यों अपनाएंगे।

अभद्र भाषा और ट्रोलिंग के सहारे ‘संस्कृति’ बचाते पुरुष

इंटरव्यू के चर्चा में आने के बाद से ट्विटर, इंस्टाग्राम समेत पूरे सोशल मीडिया पर हर कोई मलाला को निशाना बनाने में लग गया। बहुत से लोग बिना पूरी बात जाने उनको ट्रोल कर रहे हैं। “पाकिस्तान, इस्लाम को बदनाम कर पश्चिमी संस्कृति की दुलारी बन पैसा कमाने का तरीका, मुसलमान होकर इस तरह की बात करना गुनाह है, हमें शर्मिंदा हैं तुम पर” जैसी बातें मलाला के लिए कही जा रही हैं। एक लड़की का स्वतंत्र होकर अपने मन की बात कहना हर किसी के लिए एक गंभीर विषय बन जाता है और लोग उसे नसीहत देना शुरू कर देते हैं। आलोचना करने वालो में पुरुषों की संख्या हमेशा ज्यादा होती है। अभद्रता की भाषा, चरित्र हनन कर पुरुष अपने मन को शांत उन विचारों को कुचलने में लग जाते हैं। सोशल मीडिया ट्रोलिंग पर महिला का मानसिक शोषण कर अपने धर्म, संस्कृति, रीतियों की सुरक्षा करना शुरू कर देते हैं।

दरअसल आज़ादी के इतने लंबे समय बाद चाहे भारत हो या पाकिस्तान दोनों ही जगह पर महिलाओं के लिए एक जैसे से ही ख्याल है। जब-जब कोई महिला पुरुष सत्ता वाले समाज में सामने से आकर अपनी बात कहती है तो वह उन्हें अखरती है। घटना के तुंरत बाद ही उसके पूरे पहलू को समझे बिना मर्द अपनी आहत सोच को थोपने के लिए आ जाते हैं। खुद मलाला के साथ ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। रूढ़िवादी सोच पर जब भी उन्होंने कुछ कहा है लोग उनकी ऐसे ही आलोचना करनी शुरू कर देते हैं।

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शादी ज़रूरी तो नहीं

हमारे समाज में शादी एक एकतरफा दायित्व-निर्वाह है जिसमें महिला पर ही सारा भार है। उसका काम सिर्फ आदेश पालन करना है। शादी की शुरुआत से लेकर अंत तक उसे आज्ञा का पालन करना होता है। पिता, पति और पुत्र के इर्द-गिर्द ही उसे जीना है। इससे इतर थोड़ा भी सोचना उसके लिए हानिकारक है। हमारे यहां शादी के द्वारा महिला को नियंत्रित करने का रिवाज है। सुरक्षा कवच, प्रेम के नाम पर महिला से उसके अधिकार छीन उसे दोयम दर्जे का नागरिक बना दिया जाता है। शादी में एक लड़की भले ही अपनी पंसद से कपड़े, गहने चुन ले, लेकिन जीवनसाथी नहीं चुन सकती है। लड़की का अपनी मर्जी से साथी चुनना पित्तृसत्ता के लिए एक धक्का होता है। पुरुषों के मुताबिक यह उनका हक है कि ‘घर की इज्ज़त’ किससे शादी करेंगी। शादी नामक संस्था का हिस्सा बनना उसके लिए सबसे ज्यादा ज़रूरी है। शादी के नाम पर लड़कियों की बीच में पढ़ाई तक छुड़वा दी जाती है। एक लड़की या महिला का खुद की पंसद का साथी चुनना और शादी की जगह एक पार्टनरशिप के तहत रहना या फिर शादी न करना पित्तृसत्ता की पूरी नींव हिला देता है। भारत में तमाम तरह की कानूनी मान्यता मिलने के बावजूद भी लोग सामाजिक तौर पर लिव-इन-रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों के साथ बेहद क्रूर व्यवहार कर उन्हें गलत नजरों से देखते हैं।

आज लड़कियां पढ़ रही हैं अपनी राय बना रही हैं। पुरुषों के मुकाबले भले ही कम वेतन पा रही हैं लेकिन वे आर्थिक रूप से सबल हो रही है। अपनी कमाई अपनी समझ से वे खुद की पंसद की जिंदगी जीना चुन रही हैं। शादी करना या नहीं करना , किससे करनी है, बच्चे कब पैदा करने हैं जैसे फैसलों पर अपनी राय रख रही हैं। यही सब बदलाव बरसों से चली आ रही रीतियों की जड़ों को हिलाने का काम कर रहे हैं। बिना आडंबर और रीति-रिवाज को अपनाए बगैर जब दो लोग साथ रह सकते हैं तो वे शादी जैसी स्त्री विरोधी संस्था को क्यों अपनाएंगे। महिलाएं अपने रिश्ते खुद चुन उनमें प्यार, सम्मान, समानता खोज रही हैं। परिवार और समाज में अपनी जगह बनाने में लगी हुई है, स्वंय की पंसद-नापंसद को अहमियत दे रही हैं। एक स्वतंत्र नागरिक की तरह जीने में विश्वास कर रही हैं।

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तस्वीर साभार : Vogue

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