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पिछले कुछ दिनों से पड़ रही रिकॉर्ड तोड़ गर्मी से तो आप सब वाकिफ़ होंगे ही। दिल्ली-एनसीआर समेत पूरे उत्तर भारत में मॉनसून सीज़न में भी भीषण गर्मी और उमस का दौर जारी है। वहीं, अमेरिका और कनाडा के कुछ इलाकों में भी हीटवेव लोगों की जान ले रही है। कनाडा में तो हीट डोम के कारण पड़ रही गर्मी ने पिछले 10,000 सालों का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। कुल मिलाकर पूरी दुनिया में गर्मी बढ़ रही है। वर्ल्ड मीटिरियोलॉजिकल ऑर्गेनाइजेशन के मुताबिक 1990 का दशक सबसे गर्म दशक रहा है। नेशनल ओशनिक एंड एटमोस्फियरिक एडमिनिस्ट्रेशन (एनओएए) द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार पिछले 140 सालों में 10 सबसे गर्म मार्च 1990 के बाद ही रिकॉर्ड किए गए हैं। तापमान में हो रही इस बेतहाशा वृद्धि से पृथ्वी पर जलवायु और तापमान का संतुलन डगमगा रहा है। वैश्विक तापन का विनाशकारी प्रभाव जंगलों में आग लगने, मरुस्थलीकरण, ग्लेशियरों के पिघलने और तटीय शहरों और द्वीपों के डूबने, जैसे रूपों में साफ तौर पर दिखाई दे रहा है। कहीं सूखा पड़ रहा है तो कहीं बाढ़ और तूफान ने जीना मुहाल कर रखा है। पीने के पानी और खेती की पैदावार में भी कमी आ रही है। इस सबका असर हम इंसानों पर तो पड़ ही रहा है। वहीं वनस्पति और जीव- जंतु भी इससे अछूते नहीं हैं। जलवायु में आए इस बदलाव को अपना नहीं पाने की वजह से उनमें कुछ आनुवांशिक बदलाव आते हैं जो नई- नई बीमारियों को रूप में हमारे सामने आ रहे हैं। 

जलवायु परिवर्तन से सभी देशों की अर्थव्यवस्था तो प्रभावित होती ही हैं। वहीं, लोगों के मानवाधिकारों का हनन भी व्यापक तौर पर होता है। जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा भोजन का अधिकार, जीने का अधिकार, स्वस्थ रहने का अधिकार, पानी की उपलब्धता, आवास, स्वच्छता, सस्ती व्यावसायिक ऊर्जा जैसे मूलभूत मानवाधिकार प्रभावित होते हैं। मजबूरी में किया गया पलायन, आर्थिक विकास में बाधा और असमानता में बढो़तरी कुछ ऐसे ही मुद्दे हैं जो दर्शाते हैं कि कैसे जलवायु परिवर्तन मानवाधिकारों के लिए एक खतरा है। वैसे तो ग्लोबल वार्मिंग पूरे विश्व के लिए ही खतरा है लेकिन कुछ खास इलाके, गरीबी, लिंग, उम्र या किसी समुदाय विशेष के लोग जो पहले से वंचित और समस्याग्रस्त हैं, इससे अधिक गंभीर रूप से प्रभावित होते हैं। इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) द्वारा जारी एक रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है, ‘जलवायु प्रणाली पर मानव का प्रभाव स्पष्ट है और हाल ही में हो रहा मानवजनित ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन इतिहास में सबसे अधिक है। जलवायु परिवर्तन का मानव और पर्यावरण पर व्यापक प्रभाव पड़ा है।’ इसके साथ ही रिपोर्ट में कहा गया है कि जो लोग सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और संस्थागत रूप से हाशिए पर हैं वे विशेष रूप से जलवायु परिवर्तन से पीड़ित हैं। तो आइए जानते हैं कुछ ऐसे ही मूलभूत मानवाधिकारों के विषय में जिनका हनन जलवायु परिवर्तन के चलते सबसे ज्यादा होता है।

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जीवन जीने का अधिकार

जलवायु परिवर्तन की वजह से सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार तो छोड़िए, जीने का मूलभूत अधिकार भी खतरे में पड़ गया है। यूएन एनवायरनमेंट प्रोग्राम के मुताबिक, दुनियाभर में करीब 1,50,000 अकाल मौतें सीधे जलवायु संकट से संबंधित होती हैं। क्लाइमेट वल्नरेबल फोरम और DARA इंटरनेशनल की एक रिपोर्ट के अनुसार तो जलवायु परिवर्तन से हर साल लगभग 400,000 मौतें होती हैं और यह संख्या 2030 तक 700,000 तक होने की उम्मीद है। बाढ़, तूफान, हीटवेव, जंगल की आग, सूखा, जल और वायु प्रदूषण से होने वाली बीमारियों, भूख और कुपोषण से होने वाली मौत जलवायु परिवर्तन का ही परिणाम हैं। 

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स्वस्थ रहने का अधिकार

जलवायु परिवर्तन का दुनिया की बड़ी आबादी के स्वास्थ्य पर भी भारी असर हो रहा है। संयुक्त राष्ट्र की जलवायु परिवर्तन पर एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2019 में तापमान में वृद्धि के कारण जापान में 100 से ज्यादा और फ्रांस में 1462 लोगो की मौतें हुईं। वहीं साल 2019 में तापमान वृद्धि के कारण डेंगू वायरस का प्रकोप भी बढ़ा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक जलवायु में उष्णता में बढ़ोतरी की वजह से ह्रदय और श्वास संबंधी बीमारियों में वृद्धि होगी। वहीं, दुनिया के विकासशील देशों में डायरिया, पेचिश, हैजा, क्षयरोग, पित ज्वर जैसी संक्रामक बीमारियों की में वृद्धि होगी। इसके अलावा रोगाणुओं की नई- नई प्रजातियां भी उत्पन्न होंगी। अमेरिका और विश्व के अन्य भागों में भारी वर्षा के कारण क्राइप्टोपोराइडोसिस के मामले भी सामने आए हैं। स्वास्थ्य और जलवायु परिवर्तन पर लैंसेट आयोग के अनुसार, जलवायु संकट इक्कीसवीं सदी का सबसे बड़ा वैश्विक स्वास्थ्य खतरा है और इससे वैश्विक स्वास्थ्य के क्षेत्र में पिछले पांच दशकों में की गई प्रगति भी खतरे में आ जाएगी। 

जलवायु परिवर्तन से सभी देशों की अर्थव्यवस्था तो प्रभावित होती ही हैं। वहीं, लोगों के मानवाधिकारों का हनन भी व्यापक तौर पर होता है। जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा भोजन का अधिकार, जीने का अधिकार, स्वस्थ रहने का अधिकार, पानी की उपलब्धता, आवास, स्वच्छता, सस्ती व्यावसायिक ऊर्जा जैसे मूलभूत मानवाधिकार प्रभावित होते हैं।

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भोजन का अधिकार

जिस देश की अर्थव्यवस्था मोटे तौर पर कृषि व्यवस्था पर निर्भर हो, वहां जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न खतरे को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। वैश्विक खाद्य उत्पादन पर जलवायु परिवर्तन के असर से वैश्विक भुखमरी उत्पन्न होती है। डाउन टू अर्थ के मुताबिक, यूएन द्वारा प्रकाशित ‘एमिशन गैप रिपोर्ट 2020’ में कहा गया है कि यदि पृथ्वी का तापमान इसी दर से बढ़ता रहा तो सदी के अंत तक यह 3.2 डिग्री सेल्सियस के पार चला जाएगा। इसके चलते खाद्य उत्पादन में 31 फीसद और मवेशियों से प्राप्त होने वाले उत्पादों में 34 फीसद की गिरावट आ जाएगी। वहीं, विश्व बैंक के एक अनुमान के मुताबिक वैश्विक तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि से 100 मिलियन से लेकर 400 मिलियन तक लोग भुखमरी का शिकार हो सकते हैं। जलवायु परिवर्तन भोजन के पोषण स्तर को भी प्रभावित करता है। कार्बन डाइऑक्साइड के अधिक कॉन्संट्रेशन से फसलों में प्रोटीन, ज़िंक और आयरन के तत्व कम हो जाते हैं। परिणामस्वरूप, 2050 तक अनुमानित अतिरिक्त 175 मिलियन लोगों में ज़िंक की और 122 मिलियन लोग प्रोटीन की कमी की मार झेल सकते हैं। इससे सबसे ज्यादा खतरा हाशिए पर रह रहे लोगों और समुदायों को है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी नई रिपोर्ट ‘2021 ग्लोबल रिपोर्ट ऑन फूड क्राइसिस’ में सामने आया है कि 2020 के दौरान दुनिया के 55 देशों के करीब 15.5 करोड़ लोग गंभीर रूप से खाद्य संकट का सामना कर रहे हैं जोकि पिछले पांच सालों में सबसे अधिक है। रिपोर्ट के मुताबिक इस खाद्य असुरक्षा की स्थिति के लिए जलवायु परिवर्तन, संघर्ष और कोरोना महामारी के कारण उत्पन्न आर्थिक संकट मुख्य रूप से जिम्मेदार था। 

आवास का अधिकार

रोज़ी- रोटी की तलाश में गांवों से शहरों की ओर पलायन तो हमेशा से होता आ रहा है लेकिन बीते कुछ वर्षों में जलवायु परिवर्तन की वजह से इसमें बढ़ोतरी हुई है। इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) ने साल 1990 में अनुमान लगाया था कि जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा प्रभाव पलायन के रूप में दिखाई देगा। ‘वर्ल्ड माइग्रेशन रिपोर्ट 2020‘ के अनुसार हर साल हिंसा और संघर्ष की तुलना में प्राकृतिक आपदाओं से लोग अधिक पलायन कर रहे हैं। आपदाओं के कारण होने वाले विस्थापन की वजह से मानव तस्करी की घटनाओं में भी बढ़ोतरी हुई है। यूएन एनवायरमेंट प्रोग्राम का अनुमान है कि प्राकृतिक आपदाओं के दौरान पलायन से मानव तस्करी 20-30 फीसदी बढ़ जाती है। विस्थापन का असर बच्चों, महिलाओं, बुजुर्गों, बीमार लोगों और पहले से ही हाशिए पर रह रहे लोगों पर सबसे ज्यादा पड़ता है। कई जगहों पर पानी की कमी के कारण खेती पर विपरीत असर पड़ने की वजह से लोग कृषि से विमुख हो जाते हैं और रोजगार के लिए दूसरी जगह पलायन करते हैं। वहीं, पश्चिम बंगाल के सुंदरबन इलाके में जलस्तर में लगातार वृद्धि होने की वजह से कई द्वीप पानी में डूब गए हैं और कुछ पर यह खतरा मंडरा रहा है। इसकी वजह से पर्यावरण शरणार्थियों की तादाद लगातार बढ़ रही है। विश्व बैंक का अनुमान है कि अकेले समुद्र के जलस्तर के लगातार बढ़ने के कारण इस सदी में करीब नौ करोड़ लोग विस्थापित हो जाएंगे। 

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स्वच्छ जल का अधिकार

पानी के लगातार दोहन के कारण स्वच्छ जल की उपलब्धता कम होती जा रही है। जल संसाधन तेज़ी से घट रहे हैं। बारिश के बदलते पैटर्न की वजह से सतही जल उपलब्धता में कमी आ रही है और भूजल पर निर्भरता बढ़ रही है जिससे भूजल के स्तर में दिन-ब-दिन गिरावट होती जा रही है। वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक तापमान में दो डिग्री सेल्सियस की वृद्धि से एक से दो बिलियन लोगों की जल आपूर्ति की मूलभूत आवश्यकता प्रभावित हो सकती है। वहीं, बाढ़ और सूखे के कारण पानी से संबंधित स्वास्थ्य मुद्दे भी पैदा हो रहे हैं। बाढ़ बीमारी फैलाने वाले कीटाणुओं के लिए प्रजनन का आधार बनती है जिससे पानी से पैदा होनेवाली बीमारियों के पैदा होने का खतरा बढ़ रहा है। इससे डायरिया रोग के खतरे में वृद्धि हो सकती है, जो हर साल पांच लाख से अधिक बच्चों की मौत का कारण बनता है। इस सबका सीधा असर महिलाओं भी पड़ता है क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में, खास तौर पर महिलाओं पर ही यह जिम्मेदारी होती है कि वे खाना और पानी उपलब्ध करवाएं। 

जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा आर्थिक रूप से पिछड़े और हाशिए पर जीने वाले लोग प्रभावित होते हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण पशुपालन, मछलीपालन, वर्षा-आधारित खेती और जंगलों पर निर्भर लोगों की जिंदगी पर बहुत गंभीर प्रभाव हो रहे हैं।

शिक्षा का अधिकार

जलवायु परिवर्तन का बच्चों की शिक्षा पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है। प्राकृतिक आपदाओं की वजह से बच्चों को स्कूल छोड़ना पड़ता है। तटीय इलाकों में चक्रवात जैसी मौसमी घटनाओं से स्कूल बिल्डिंग्स क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। इसके अलावा स्कूल की ईमारतों का उपयोग विस्थापित लोगों को आश्रय देने के लिए भी किया जाता है जिससे बच्चों को अस्थायी रूप से स्कूल छोड़ना पड़ता है और कुछ बच्चे तो कभी वापिस स्कूल जा भी नहीं पाते हैं। जिन परिवारों की रोजी- रोटी ही खेती से चलती है, उन पर जब सूखे या हीटवेव की मार पड़ती है तो उनकी आजीविका खतरे में पड़ जाती है। उनके पास अपने बच्चों की स्कूल की फीस का भुगतान करने के लिए पर्याप्त पैसा नहीं होता है और अतिरिक्त आय अर्जित करने में मदद करने के लिए वे अपने बच्चों का स्कूल छुड़वा देते हैं। गंभीर सूखे के दौरान, खासकर लड़कियों को स्कूल छोड़ना पड़ता है क्योंकि उन्हें पानी लाने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। इसके साथ ही बच्चों के स्कूल छोड़ने में एक बड़ा कारण आपदाओं की वजह से होने वाला पलायन भी है जिसमें पूरे परिवार को भोजन और रोजगार की तलाश में किसी दूसरे स्थान पर जाना पड़ता है। 

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वंचित लोगों पर असर

जैसा कि हमने ऊपर बताया था कि जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा आर्थिक रूप से पिछड़े और हाशिए पर जीने वाले लोग प्रभावित होते हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण पशुपालन, मछलीपालन, वर्षा-आधारित खेती और जंगलों पर निर्भर लोगों की जिंदगी पर बहुत गंभीर प्रभाव हो रहे हैं। नदी के निरंतर उफान की वजह से वहां रहने वाले लोगों को अपने घरों और जमीन को छोड़कर किसी दूसरे स्थान पर जाना पड़ता है। चरम मौसमी घटनाओं, समुद्र के पानी की क्षारता में आए बदलाव और बढ़ते प्रदूषण के कारण समुद्री मछलियों की आबादी में काफी कमी आई है जिसकी वजह से मछुआरों की आजीविका खतरे में पड़ जाती है। इसके अलावा जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न समस्याओं के रोकथाम के प्रयासों से भी वंचित वर्ग के अधिकारों को खतरा हो सकता है। जलविद्युत बांधों और अन्य नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं के निर्माण का खामियाजा वहां रह रहे लोगों के पलायन के रूप में भुगतना पड़ता है। वहीं, शहरों में बढ़ते वायु प्रदूषण का भी सबसे ज्यादा नुकसान आर्थिक रूप से कमजोर तबके को उठाना पड़ता है। अमीर लोग तो अपने घरों में एयर- प्यूरिफायर और एयर कंडीशनर लगवा सकते हैं लेकिन दिहाड़ी मजदूरों और फुटपाथ पर रहने वालों को तो दिन-रात इस प्रदूषण का सामना करना पड़ता है। यही तो विडंबना है कि प्रदूषण के लिए जो लोग सबसे कम जिम्मेदार हैं, उनको ही इसका सबसे ज्यादा खामियाजा भुगतना पड़ता है।  

महिलाओं पर असर

वंचितों में भी महिलाओं का अनुपात ज्यादा होने की वजह से उनको इस समस्या का सामना और ज्यादा करना पड़ता है। कृषि की पैदावार पर पड़ने वाले जलवायु परिवर्तन के असर और जल की उपलब्धता का प्रभाव सीधा महिलाओं पर पड़ता है। भारत में ग्रामीण क्षेत्रों में घर के अंदर चूल्हा जलने से होने वाले वायु प्रदूषण का खामियाजा भी महिलाओं को ही भुगतना पड़ता है। वहीं जब काम- धंधे की तलाश में पुरुष शहरों की ओर पलायन कर जाते हैं तो महिलाओं को अकेले ही घर, बच्चों और खेतों का ख्याल रखना पड़ता है। प्राकृतिक आपदाओं की वजह से महिलाओं की तस्करी के मामलों में भी वृद्धि होने लगती है। इसी संबंध में गैर सरकारी संगठन एक्शन एड ने रिपोर्ट जारी की थी जिसके मुताबिक ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी तादाद में लोग रोजी- रोटी की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। उनके पीछे से बच्चों और बुजुर्गों की सारी जिम्मेदारी महिलाओं पर आ जाती है।

पिछले कुछ दशकों में जलवायु परिवर्तन विकास, लोगों के अधिकार और शांति में रुकावट पैदा करने वाले नवीन उपकरण के रूप में सामने आया है। इस पर काबू पाने के लिए प्रभावी जलवायु कार्यवाही तो आवश्यक ही है। साथ ही व्यापक और सार्थक भागीदारी भी उतनी ही जरूरी है। जलवायु परिवर्तन पर हो रही अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं में जहां पर्यावरण की रक्षा और भावी पीढ़ी के लिए प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर तो जोर होना ही चाहिए वहीं सबसे ज्यादा प्रभावित आबादी के जीवन और आजीविका जैसे मूलभूत अधिकारों को सुनिश्चित करने को भी महत्व देना चाहिए। अगर लोगों को जरूरी और मूलभूत सुविधाएं मिलेंगी तो वे खुद-ब-खुद पर्यावरण की बेहतरी के लिए अपना योगदान दे पाएंगे।

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तस्वीर साभार : BBC

मेरा नाम पारुल शर्मा है। आईआईएमसी, नई दिल्ली से 'हिंदी पत्रकारिता' में स्नातकोत्तर डिप्लोमा और गुरु जांबेश्वर यूनिवर्सिटी, हिसार से मास कम्युनिकेशन में एम.ए. किया है। शौक की बात करें तो किताबें पढ़ना, फोटोग्राफी, शतरंज खेलना और कंटेंपरेरी डांस बेहद पसंद है।

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