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सदियों पहले सामाजिक व्यवस्था-संतुलन-सामंजस्य जैसे तर्क-कुतर्क के आधार पर कर्म पर आधारित वर्ण व्यवस्था की जगह जन्म पर आधारित जाति व्यवस्था ने ले ली। जाति व्यवस्था से ढ़ेरों सामाजिक कुप्रथाओं और कुरितियों को बढ़ावा मिला, जिसका मूल तथाकथित ऊँची जाति के वर्चस्व को क़ायम रखना रहा। इन सामाजिक कुरितियों को ख़त्म करने के लिए कई आंदोलन हुए, कुछ सफ़ल तो कुछ असफल। पर हमारे लोकतांत्रिक देश के संविधान में जाति को कोई जगह नहीं दी गयी। इससे जुड़े भेदभाव को सिरे से ख़ारिज करते हुए समानता को मौलिक अधिकार में शामिल किया गया। लेकिन वास्तविकता ये है कि आज के इस आधुनिक युग में भी जाति का संघर्ष क़ायम है, गाँव में दलित जातियों के साथ हिंसा की बात हो या फिर घर में दलित जाति के मेहमानों के लिए रखा जाने वाला अलग बर्तन, ये संघर्ष अभी भी हमारे समाज-परिवार में रचा बसा है। इसलिए ये कहना ग़लत नहीं होगा कि जाति को व्यवस्था नहीं बल्कि एक जटिल समस्या है। इस समस्या के हल के रूप में अक्सर कहा जाता है कि लव मैरिज से जाति की समस्या दूर हो सकती है।

अपने पितृसत्तात्मक भारतीय समाज में लव मैरिज या यों कहें कि अपने पसंद की शादी अपने आप में जोखिमपूर्ण है, ये जोखिम क्यों है इसका अंदाज़ा ऑनर किलिंग के मामलों से लगाया जा सकता है। इतना ही नहीं, हमारा समाज और परिवार जैसे ही लव मैरिज की बात सुनता है वो तुरंत अपने सपोर्ट सिस्टम को पीछे खीचकर चुनौतियों को बढ़ाने लगता है। ऐसे में जब लव मैरिज इंटरकास्ट होतो तो सारी चुनौतियाँ चार गुना बढ़ जाती है।

सोशल मीडिया और इंटरनेट के इस युग में युवाओं में अब लव मैरिज करने का चलन बढ़ा है। लेकिन इन लव मैरिज में इस्तेमाल किए जाने वाले स्मार्ट फ़िल्टर युवाओं की शादीशुदा ज़िंदगी को भले ही उनके अनुसार फ़ायदा पहुँचायें लेकिन ये जाति व्यवस्था की कुरीति को कहीं से दूर करने की बजाय इसे पोसने का काम कर रहे है। जातिगत संघर्ष चूँकि सिर्फ़ जाति तक सीमित नहीं रहते है, ये इंसान की सामाजिक, पारिवारिक, मानसिक और कई बार आर्थिक पहलुओं को भी प्रभावित करते है। इसलिए इन चुनौतियों से बचने के लिए अपने लव मैरिज को अरेंज मैरिज में बदलने का चलन काफ़ी तेज़ी से बढ़ा है। पढ़े-लिखे और ख़ुद को प्रगतिशील कहने वाले युवा जब जाति, गोत्र, परिवार, गाँव और कुंडली मिलान के फ़िल्टर के बाद प्यार के लिए अपने साथी का चुनाव करने लगे तो आने वाले समय में जाति व्यवस्था की बढ़ती जटिलताओं का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।

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इतने फ़िल्टरों के बाद साथी का चुनाव करने वाले एक युवा से बात करने पर उसने बताया कि, ‘हमलोग बाहर पढ़ने आए है। अपने पढ़ाई और काम करने की जगह तो कोई जातिगत संघर्ष नहीं देखते, लेकिन जैसे ही शादी की बात आती है तो जाति का मुद्दा पहले आ जाता है। अब अगर हमलोग दूसरी जाति में शादी करते है तो आधी से ज़्यादा ज़िंदगी अपने और साथी के बीच जाति के फ़र्क़ को दूर करने और इसे दूसरों के सामने साबित करने में बीत जाएगी। बाक़ी मानसिक, पारिवारिक और सामाजिक दबाव अलग से और समाज भी कोई साथ नहीं देगा उस टाइम। इसलिए हमने सोच समझकर अपनी जाति की ही साथ पढ़ने वाली लड़की को अपने साथी एक तौर पर चुना।‘

लव को अरेंज करने का चलन जातिगत भेदभाव और संघर्ष को कभी को दूर नहीं बल्कि पोसने और इसे बढ़ावा देने का काम कर रहा है। 

ये वो सच्चाई है जो हमारे आसपास ज़ारी है। मैं ये नहीं कहती कि सोच-समझकर अपने साथी का चुनाव करना ग़लत है या लव को अरेंज में बदलना ग़लत है, बल्कि मेरा मानना है कि समाज के बताए पितृसत्तात्मक फ़िल्टर का इस्तेमाल करके अपने साथी का चुनाव करना और जाति के बिंदु पर मिलान कर लव को अरेंज करना ग़लत है, क्योंकि जाने-अनजाने में ये सदियों पुरानी जाति व्यवस्था को पोसने और इसे जटिल बनाने का काम करता है। पर ऐसा नहीं कि लव मैरिज करने वाले सभी जाति के फ़िल्टर का इस्तेमाल करते है, कई युवा ऐसे भी है जिन्होंने इस व्यवस्था को चुनौती दी है। लेकिन ये उनके लिए बेहद संघर्षपूर्ण रहा है।

शैली (बदला हुआ नाम) ने अपने कॉलेज के दोस्त से शादी की। शैली पिछड़ी जाति से ताल्लुक़ रखती है और उसका साथी तथाकथित ऊँची जाति से। शादी से पहले शैली के ससुराल वालों का संपर्क शैली से हमेशा रहा। वे सभी शैली को बेहद सम्मान देते। लेकिन ये सब सिर्फ़ तब तक रहा जब तक शैली शादी होकर उनके परिवार में शामिल नहीं हुई। शैली बताती है कि, ‘पहले ससुराल वाले मेरी ख़ूब तारीफ़ करते। उस वक्त उन्हें ये अंदाज़ा नहीं था कि आने वाले समय में मैं उनके बेटे से शादी करूँगी। लेकिन जिस दिन से शादी हुई उस दिन लेकर हर दिन मुझे मेरी जाति अहसास करवाया जाता है। ससुराल वाले मुझसे आजतक नहीं मिले और न ही मैं अपने ससुराल गयी, ये सब सिर्फ़ इसलिए क्योंकि मैं उनकी तरह तथाकथित ऊँची जाति से नहीं हूँ।‘ शैली आगे बताती है कि, ‘मैं एक पढ़े-लिखे अमीर परिवार से आती हूँ और मेरे ससुराल वाले आर्थिक रूप से बेहद कमजोर है। मैं कामकाजी हूँ और उनके बेटे की ही तरह ऊँची यूनिवर्सिटी से पढ़ाई भी की, अपनी ज़िंदगी में आजतक कभी भी मुझे मेरे जाति विशेष का होने का आभास नहीं हुआ, लेकिन शादी के बाद से परिवार हर व्यवहार मानो मेरी जाति पर आकर टिक गया है। अक्सर मेरे साथी को परिवारवाले कहते है कि जब लव मैरिज ही करना था तो अपनी जात में किया होता।‘

जाति के संघर्ष की दो कहानियाँ है, जिसमें युवाओं के वर्ग विभाजित होने लगे है या यों कहें कि जाति की समस्या को दूर करने और पोसने के दो रास्ते बन चुके है। जाति को ख़त्म करने के लिए अंतरजातीय शादियाँ सशक्त माध्यम है लेकिन इसकी चुनौतियाँ बेहद ज़्यादा है, जिससे बचने के लिए युवाओं का लव को अरेंज करने का चलन जातिगत भेदभाव और संघर्ष को कभी को दूर नहीं बल्कि पोसने और इसे बढ़ावा देने का काम कर रहा है। 

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तस्वीर साभार : thenewsminute

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