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वेस्ट में इन्फ्लुएंसर कल्चर भारत से पहले आ गया। भारतीय बाजार और सोशल मीडिया में ये कुछ ही साल पुराना है। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक बिज़नस इनसाइडर इंटेलिजेंस ने बताया है कि साल 2022 तक वैश्विक स्तर पर ब्रांड्स 15 बिलियन डॉलर इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग पर खर्च करने वाले हैं। सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर अपने दर्शकों का बेस बनाते हैं। फैशन, लाइफस्टाइल, कॉमेडी उनके वीडियो में अधिकतर शामिल रहते हैं। ऐसे कंटेंट से इन्फ्लुएंसर अपने दर्शकों से ना सिर्फ़ जुड़ते हैं बल्कि उनकी जीवन शैली, सोच, निज़ी जीवन के छोटे बड़े चयन को भी प्रभावित करते हैं। यही कारण है कि सौंदर्य उत्पाद, खानपान, इलेक्ट्रॉनिक सामान, कपड़े आदि के ब्रैंड्स फैशन इन्फ्लुएंसर्स को प्रोमोशन के लिए संपर्क करते हैं। भारतीय बाजार के नए गुरु जिन पर ग्राहकों का भरोसा है वे यही फ़ैशन इन्फ्लुएंसर होते हैं। यही बात आगे बढ़ते हुए पूंजीवाद को डिजिटल माध्यम द्वारा ग्राहकों आकर्षित करने के लिए इन्फ्लुएंसर पर निर्भर बनाता है। चूंकि लोग इन इन्फ्लुएंसर को लंबे समय से फॉलो कर रहे होते हैं, उन्हें देख रहे होते हैं, उनके कंटेंट से परिचित होते हैं। वे उनके साथ एक विशेष जुड़ाव महसूस करते हैं। इसलिए वे उनका सुझाया हुआ प्रॉडक्ट खरीदें ऐसी संभावनाएं ज्यादा होती हैं। इन्फ्लुएंसर के लिए कमाई का मुख्य जरिया उनके फैन बेस की वजह से मिले ब्रैंड प्रमोशन और प्रोजेक्ट्स होते हैं। इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग में एक शब्द है, मेगा इन्फ्लुएंसर यानी जिनके किसी एक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एक मिलियन से ज्यादा फॉलोवर्स हैं।

किस तबक़े से हैं इन्फ्लुएंसर कल्चर के लोग और उनके दर्शक ?

सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर खासकर इंस्टाग्राम इन्फ्लुएंसर एक विशेष तबक़े से आते हैं। महानगरों में रहने वाले, समाज के उच्च आर्थिक और जातिगत पहचान से संबंध रखते हैं। इन्फ्लुएंसर कल्चर पर सबसे बड़ी आलोचना यहीं से आती है कि उन के पास एक हद तक संसाधन मौज़ूद हैं, उनके कंटेंट में एकरसता देखी जा सकती है, उनके एस्थेटिक एक तरह के हैं और वे एक तबके के दर्शकों को अपील करते हैं। स्पॉटीफाई पर ‘लाइट्स कैमरा आज़ादी’ नाम से आने वाले एक पॉडकास्ट में अनुराग माइनस वर्मा जो अपने इंस्टाग्राम अकाउंट को विचित्र कलात्मक प्रयोग की जगह मानते हैं। एक इंसान के इंस्टाग्राम अकाउंट के बारे में बात करते हुए कहते हैं, ‘एक आदमी जो अकेला बैठा है, बेरोज़गार है, अभी वह सुबह से शाम क्या कर रहा है उसके जो एस्पिरेशन हैं वे क्या हैं, बोरियत का आर्ट कैसे क्रीएट होता है। एक बेरोज़गार देश के अंदर एक आदमी कैसे ऑपरेट कर रहा है।” अनुराग माइंस वर्मा समाज के जिस वर्ग की बात कर रहे हैं, वह उनके कंटेंट में भी नज़र आता है। अनुराग जैसे लोग समाज के मजदूर वर्ग, श्रमिक वर्ग की सच्चाई पर उस इंसान की मनोस्थिति समझते हुए उनकी नज़र से समाज पर व्यंग्य बनाते हैं। इसलिए साढ़े पन्द्रह हज़ार इंस्टाग्राम फॉलोवर्स होने के बाद भी अनुराग माइंस वर्मा का कंटेंट किसी भी तरह से एक उभरते हुए मुख्यधारा के सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर की तरह बिल्कुल नहीं है।

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मुख्यधारा के इन्फ्लुएंसर अक्सर श्रमिक और मज़दूर वर्ग को एक अपर क्लास नज़रिए से देखते और उनकी खिल्ली उड़ाते हैं। आप इंस्टाग्राम रील स्क्रॉल करते हुए कई ऐसे वीडियो देखते होंगे जहां ‘गोलगप्पे वाले भईया’, ‘रिक्शावाले भईया’, ‘सड़क पर बैठा कोई खाली इंसान’, ‘काम वाली बाई’ ‘चौकीदार’ फल-सब्जीवाले, इन वीडियो में हंसी के पात्र बनाए जाते हैं। श्रमिक वर्ग एक तरह की शहरी भाषा, तौर तरीक़े और एस्थेटिक का प्रदर्शन करने में सक्षम नहीं है। वह वर्ग गांव से शहर की तरफ जीवन यापन के नए अवसरों की तलाश में आया है। एक वर्ग महानगरों में भी ऐसा है जो शहर की रेस में दरकिनार हो गया है, जिसे पास चमचमाती रोशनी और एसी वाले मेट्रो के डिब्बों में चढ़ने की सुविधा तो महानगर ने दी है लेकिन रोज़गार के अवसर नहीं दे सका। इसलिए इंटरनेट ख़ासकर इंस्टाग्राम पर अपर क्लास-कास्ट के इन्फ्लुएंसर जिनका कंटेंट बेहतरीन माना जाता है वे इस वर्ग को अपनी दुनिया का हिस्सा न बन पाने के कारण मख़ौल का पात्र मानते हैं। उनके बोलने के तरीक़े, रोज़मर्रा और व्यवहार को प्रिविलेज्ड चश्मे से देखते हैं। ये सब डिजिटल युग में कॉमेडी कंटेंट के नाम पर होता है और दर्शक इसे आराम से पचा लेते हैं क्योंकि इनके दर्शकों का एक बड़ा तबका भी ज़मीन पर मेहनत मजदूरी करने वालों को निचले दर्ज़े का नागरिक ही मानता है।

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इन्फ्लुएंसर कल्चर पर सबसे बड़ी आलोचना यहीं से आती है कि उनके पास एक हद तक संसाधन मौज़ूद हैं, उनके कंटेंट में एकरसता देखी जा सकती है, उनके एस्थेटिक एक तरह के हैं और वे एक तबके के दर्शकों को अपील करते हैं।

ऑफलाइन दुनिया की बात करें तो ये वही समाज है जहां लोग तथाकथित उच्च जाति के लोग तथाकथित छोटी जाति के लोगों को घर के बाहर बिठाने, चाय-नाश्ता अलग बर्तन में देने जैसा करते हैं। दलित-बहुजन आदिवासी जैसे हाशिये पर गए समुदायों को संस्थागत तरीक़े से शिक्षा और संसाधनों से दूर रखा गया, इसलिए वे वही काम करने को मजबूर रहे जो उनके पूर्वजों ने किया था। जैसे दूसरों के घरों में काम करना, मजदूरी, कूड़ा बीनना, जूते सिलना, गाय चराना, दूसरों के खेतों में मज़दूरी करना, इत्यादि। इनमें से किसी निचली जाति की नई पीढ़ी शिक्षा और ठीकठाक नौकरी हासिल कर भी ले तो उनकी जाति और उनके पूर्वजों द्वारा किए गए काम से साथ जुड़ी सामाजिक शर्म ब्राह्मणवादी समाज और संसाधन समृद्ध लोग याद दिलवाने से पीछे नहीं हटते। डिजिटल दुनिया में यही सोच देखने मिलती है जब मज़दूर और श्रमिक वर्ग के इतिहास और संघर्ष को एक सिरे से नज़रंदाज़ कर अपर क्लास, कास्ट के लोगों द्वारा उन्हें केवल एक हास्यास्पद किरदार की तरह पेश किया जाता है।

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वर्ग और जाति का विशेषाधिकार

जून 2020 के टिकटॉक ऐप बैन से पहले टिकटॉक एक ऐसा ऐप था जहां शहरी और स्वर्ण एस्थेटिक में फिट नहीं हो पाने वाले लोगों ने अपनी एक अलग दुनिया बना रखी थी। हालांकि वहां हिंसात्मक और महिला विरोधी कंटेंट भी मौजूद था लेकिन दूसरी तरफ इंटरनेट पर श्रमिक वर्ग और उनके तौर तरीक़ों और नज़रिए से कंटेंट की मौजूदगी इंटरनेट की एकरसता को तोड़ती थी। मेरे गांव में मैंने ऐसे कई लड़के देखे थे जो दिन में बढ़ई का काम, हलवाई दुकान में काम करके जीविका चलाने का रास्ता निकालते और शाम में या काम के बीच मिले समय में टिकटॉक पर अपने मनोरंजन के लिए वीडियो बनाते। कुछ लोग इस माध्यम से टिकटॉक के कारण कमाई भी कर लेते थे। इन लड़कों के पास इन्फ्लुएंसर की तरह कोई कलर कॉर्डिनेट किए कपड़े, महंगे सौंदर्य उत्पाद, रिंग लाइट नहीं होती थी, ना ही उनके पास शहरी तौर-तरीके थे। इसलिए इंस्टाग्राम और अन्य सोशल मीडिया के इन्फ्लुएंसर द्वारा इन्हें क्रींज़ यानी कूड़ा कंटेंट कहा जाता था। हालांकि इससे बड़ी हास्यास्पद बात क्या हो सकती है कि ‘कैरी मीनाटी’, जैसे यूट्यूबर ने किसी टिकटॉकर का मज़ाक उड़ाते हुए उसके लिए ट्रांस-फोबिक शब्दों का प्रयोग किया था और उसके घाघरे पहनने पर टिप्पणी की थी। लेकिन टिकटॉक को क्रींज़ कहने वाले इस बात को कैसे तर्कसंगत मानेंगे कि कैरी मीनाटी के बचाव में कई सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर आ गए जिनका कहना था कि शब्दों को बिना संदर्भ ना देखा जाए, वह बस एक रोस्ट यानी मज़ाक था। किसी के लिए ‘बेटी’,’मिठाई की दुकान में बिक जाएगा’ जैसे शब्द गाली की तरह प्रयोग करना तब जब इंटरनेट पर आपकी उपस्थित एक बहुत बड़े दर्शक वर्ग को प्रभावित करती है बहुत ही ग़लत और गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार है।

साल 2020 के एक सर्वे के मुताबिक भारत के 5.7 प्रतिशत लोग इंस्टाग्राम का प्रयोग करते हैं। इसमें 18 से 24 साल का सबसे बड़ा यूज़र ग्रुप है। इन्फ्लुएंसर द्वारा इंस्टाग्राम पर कही गई बातें उनके दर्शकों को इसलिए भी ज़्यादा प्रभावित करती हैं क्योंकि जिस उम्र के दर्शक वर्ग इंस्टाग्राम पर हैं, अगर वे एक तरह के प्रिविलेज्ड तबक़े से आते हैं तो उनके लिए अपने प्रिविलेज़ को पहचानना और उनसे कम संसाधन में जी रहे लोगों को इंसान की तरह देखने में परेशानी होती है। वे या तो उन्हें क्रींज़ और मज़ाक का पात्र मानते हैं या फिर सेवियर कॉम्प्लेक्स से ग्रसित होते हैं। ‘सेवियर कॉम्प्लेक्स’ का मतलब होता है खुद को रक्षक समझना। कई बार इस के चक्कर में बिना सामने वाले के जिए गए अनुभव को समझे आप अपने अनुभवों के आधार पर उसका हल बताने लगते हैं या उसकी तरफ से बातें करने लग जाते हैं।डिजिटल भाषा में एक शब्द है ‘वोक’ यानी प्रगतिशील। कई इन्फ्लुएंसर ‘वोक’ कंटेंट बनाने के चक्कर में किसी एक शोषित तबक़े के इर्द-गिर्द कंटेंट बनाने लगते हैं जिसके जीवन और संघर्ष को उन्होंने दूर-दूर तक न देखा है न ही समझा है। ऐसा करते हुए वे अक्सर उस समुदाय को आहत कर देते हैं। हाल ही में किसी एक अपर क्लास, अपर कास्ट ट्रान्स महिला किसी व्यक्ति की जातिगत पहचान पर तुक्का लगा रही थीं। ऐसा वह अपने इंस्टाग्राम लाइव में एक अन्य ऐसी ही महिला के साथ मिलकर कर रही थीं। दो उच्च जाति की महिलाओं (डॉक्टर त्रिनेत्रा हालदार और मीरा सिंघानिया) द्वारा किसी बहुजन की जाति पर बात करना और बाद में इस दलील के साथ आना कि उन्हें उसकी जातिगत पहचान मालूम नहीं थी जातिगत बर्ताव है। हम किसी भी समाज में कई पहचान के साथ रहते हैं, जातिगत पहचान, लैंगिक पहचान, धार्मिक पहचान, आर्थिक पहचान, ये जानना बहुत जरूरी है कि हम किन मोर्चों पर औरों से प्रिविलेज्ड हैं।

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जाति भारतीय समाज में इतने संस्थागत और गहरे तरीक़े से जड़ है कि अन्य पैमानों पर कोई भी पहचान रखने वाले उच्च जाति के किसी भी व्यक्ति को जातिगत आधार पर मिले विशेषाधिकार औरों के मुकाबले उनके सफ़र को आसान बना देती है। अपने जातिगत व्यवहार पर बहुत ही कमज़ोर दलीलें देने के बाद त्रिनेत्रा ने एक माफ़ीनामा पोस्ट लिखा, लेकिन हैरानी यहां होती है जब उनके वे फ़ॉलोअर्स जो बहुजन समुदाय से नहीं हैं, कॉमेंट सेक्शन में आकर माफ़ीनामा मंजूर करने की बातें और उनकी तारीफ़ करने लगे। त्रिनेत्रा के माफ़ीनामा से पहले लिखा एक पोस्ट लिखा था जिसमें वह ग़लती मानने के बजाय गैरजिम्मेदाराना सेल्फ़ लव की बातें कर रही थीं। इस पोस्ट को बाद में त्रिनेत्रा ने खुद हटा दिया था। इंटरनेट पर इतना कुछ घट रहा है कि सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर जितनी शिद्दत से एक दूसरे के साथ कोलैबोरेशन करना चाहते हैं, ‘वोक’ और प्रसिद्ध होना चाहते हैं, उतनी जिम्मेदारी अपने व्यवहार के लिए नहीं लेते जबकि उनकी कमाई का मुख्य जरिया इंटरनेट और इंटरनेट दिखता पर उनका व्यवहार ही है। 

क्या ये हल्की फ़ुल्की बातें हैं?

सोशल मीडिया का लोगों के जीवन में जो दखल है उससे इनकार नहीं किया जा सकता है। कॉस्मोपोलिटन इंडिया जैसे प्लैटफार्म इन सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स को सम्मानित भी करते हैं लेकिन सोशल मीडिया एक्टिविज़्म या इन अवार्ड्स पर बात करने से पहले इन्फ्लुएंसर किस तरह के कंटेंट बना रहा है और क्या वह किसी और समुदाय के दुखों पर कंटेंट बना रहा है यह बात देखना जरूरी है। दूसरी बात ये कि सोशल मीडिया समाज का ही हिस्सा है, किसी भी बदलाव या प्रगतिशील सोच को प्रचारित करने में सोशल मीडिया की भूमिका अहम बनाई जा सकती है लेकिन किसी का एक्टिविज़्म अगर केवल उनके सोशल मीडिया कंटेंट तक सीमित है और उसे केवल उसी बात के लिए ‘वोक’ नई पीढ़ी की वाहवाही मिल रही है तो इस पीढ़ी को अपनी जानकारी का स्त्रोतों को चेक करना चाहिए और इन सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर को बिना उनके प्रिविलेज़ पर सवाल किए मानने से परहेज़ करना चाहिए। सोशल मीडिया के इन्फ्लुएंसर को कई बार कॉल आउट भी किया जाता है यानी उनकी ग़लती बताई जाती है, जैसे डॉक्टर त्रिनेत्रा के मामले में कई दलित-बहुजन समुदाय के प्रतिनिधि इंस्टाग्राम अकाउंट ने किया था। लेकिन कई बार वे अपनी ग़लती समझने से पहले बेमतलब दलीलें दे चुके होते हैं या फिर उन आलोचनाओं पर ध्यान तक नहीं देते क्योंकि जो ब्रांड्स उनसे जुड़े हैं उन्हें इन्फ्लुएंसर की नैतिक आलोचना से फ़र्क नहीं पड़ता, उन्हें केवल उनके फॉलोवर की संख्या से मतलब होता है। इसलिए किसी सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर के ‘फॉलोवर’ बनने और उनसे प्रभावित होने से पहले सोचें क्योंकि आप किसी ऐसे इंसान के प्रगतिशील होने की कमाई खाने का जरिया बन रहे हैं जो असल दुनिया में एक उसी प्रोब्लेमटिक कल्चर का हिस्सा हो सकता है।

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तस्वीर साभार : Economic Times

मेरा नाम ऐश्वर्य अमृत विजय राज है, मिरांडा हाउस से 2021 में दर्शनशास्त्र से स्नातक है। जन्म और शुरुआती पढ़ाई लिखाई बिहार में हुई। इसलिए बिहार के कस्बों और गांव का अनुभव रहा है। दिल्ली आने के बाद समझ आया कि महानगर से मेरे लोग मीलों नहीं बल्कि सालों पीछे हैं। नारीवाद को ख़ासकर भारतीय संदर्भ में उसकी बारीकियों के साथ थ्योरी में और ज़मीनी स्तर पर समझना, जाति और वर्ग के दख़ल के साथ समझना व्यक्तिगत रुचि और संघर्ष दोनों ही है। मुझे आसपास की घटनाएं डॉक्यूमेंट करना पसंद है, कविताओं या विज़ुअल के माध्यम से। लेकिन कभी कभी/हमेशा लगता है "I am too tired to exist".

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