FII is now on Telegram

एडिटर्स नोट : यह लेख हमारी नई सीरीज़ ‘बदलाव की कहानियां’ के अंतर्गत लिखा गया दसवां और आखिरी लेख है। इस सीरीज़ के तहत हम अलग-अलग राज्यों और समुदायों से आनेवाली उन 10 महिलाओं की अनकही कहानियां आपके सामने लाएंगे जिन्हें साल 2021 में पद्म पुरस्कारों से नवाज़ा गया है। सीरीज़ की अगली कड़ी में पेश है पद्मश्री बीबी प्रकाश कौर की कहानी।

पुरानी बात है। करीब 60-62 साल पहले की। पंजाब के किसी इलाके में एक बच्ची सड़क किनारे पड़ी है। मां-बाप ने उसे यूं ही छोड़ दिया है। क्यों छोड़ा, पता नहीं लेकिन अब वह भगवान भरोसे है। कुछ गुरुद्वारे वाले उसे रोता देख अपने साथ ले आते हैं। रातभर उसका ख्याल रखते हैं। कुछ समय बाद, उसे नारी निकेतन भेज दिया जाता है। वह वहीं बड़ी होने लगती है। जिस बच्ची को उसके मां-बाप ने छोड़ा, वह आज हजारों छोड़े हुए बच्चों की मां है। उसका नाम है, प्रकाश कौर और वह इस बार की पद्मश्री विजेताओं में से एक हैं। 

बीबी प्रकाश कौर 63 साल की ये महिला सैंकड़ों बच्चों की मां हैं। पंजाब के जालंधर में वह एक यूनीक होम चलाती हैं। यह यूनीक होम सच में बहुत यूनीक है। सबसे अलग और सबसे प्यारा है। एकदम छोटी ये बच्चियां अपने आप में कई कहानियां समेटे हैं। कहानियां प्रकाश कौर की ममता की। बच्चियां प्यार से उन्हें मम्मा बुलाती हैं। जिंदगी विद रिचा से बात करते हुए वह कहती हैं, ये तो भगवान के बच्चे हैं। सचमुच में। इन्हें ईश्वर ने भेजा है। जब तुम भगवान पर फुली सरेंडर कर देते हो, तब वह तुम्हारा हाथ थाम लेता है। तुम्हें संभाल लेता है। 

और पढें : पद्मश्री अनीता पौलदुरई : वह बास्केटबॉल प्लेयर जिसने जो चाहा वह कर दिखाया

Become an FII Member

प्रकाश कौर ने अनाथों वाला जीवन जिया था। उन्हें एहसास था कि बिना मां के बच्चों का रहना कितना मुश्किल है। प्रकाश तय कर लिया था कि वह शादी नहीं करेंगी, कभी नहीं और ऐसे बच्चों के पास रहेंगीं जिन्हें समाज ने ठुकरा दिया है। उनके संगी- साथियों ने भी इसके लिए उनका हौसला बढ़ाया। उनका साथ दिया। प्रकाश कौर जानती थीं कि वह क्या करना चाहती हैं। लेकिन कैसे करें, यह सवाल जब मन में आया, तब वह एक संस्था से जुड़ गई। उसके लिए काम करने लगीं। कुछ समय अच्छे से काम किया। फिर उन्हें यह महसूस किया कि यह संस्था अंदर से कुछ और है, बाहर से कुछ और। प्रकाश ने इसके खिलाफ बोला लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला। उन्हें संस्था से बाहर जाने के लिए बोल दिया गया। उन्होंने संस्था छोड़ दी। हालांकि वहां जो बच्चियां थीं, वे प्रकाश के साथ रहना चाहती थीं। लिहाजा, उनके साथ कुछ बच्चियां भी आ गई।

पुरस्कृत होती प्रकाश बीबी कौर, तस्वीर साभार: Unique Home

लेकिन अभी समस्याओं ने उनका पीछा नहीं छोड़ा था। प्रकाश के पास रहने की कोई जगह नहीं थी। इस मौके पर उनके एक दोस्त सामने आए और उन्हें रहने के लिए अपना घर दे दिया। वह दोस्त कहीं और रहने लगे। यह बात जिसने भी सुनी, लगभग उन सभी ने प्रकाश और उनकी बच्चियों की मदद की। प्रकाश भी बिना संकोच के सहायता मांग लेती थीं। वह कहती हैं, ‘इन बच्चियों के लिए ही तो मैं हूँ। ये नहीं तो कौन। मुसीबतें आती थीं, कभी घर कभी रहने की दिक्कत हुई लेकिन हमेशा सब मैनेज हो गया।’ 

और पढ़ें : मणिपुर की फैशन डिज़ाइनर दादी मां : पद्मश्री हंजबम राधे देवी

साल 1993 में मई की 17 तारीख को प्रकाश कौर ने ‘यूनीक होम’ खोला। यहां उनकी बच्चियां रहती हैं। प्रशासन से किसी भी तरह की कोई दिक्कत न हो इसलिए इसे एक ट्रस्ट के ज़रिए खोला गया। ट्रस्ट का नाम है, भाई घनैया जी चैरिटेबल ट्रस्ट- यूनीक होम। जगह जालंधर रही। यह होम यहां रहनेवाली सभी बच्चियों का सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और नैतिक उत्थान करता है। नकोदर रोड स्थित 3 एकड़ के इस होम में 80 लड़कियां रहती हैं। सभी की उम्र 18 साल से कम है। 18 साल से बड़ा होने पर लड़कियों को दूसरे होम भेज दिया जाता है। इन 80 लड़कियों का पूरा खर्च समाज के लोग, संगत मिलकर उठाते हैं। सरकार से किसी भी तरह का अनुदान नहीं लिया जाता है। यह पूरी तरह पब्लिक सर्विस से ही चलता है। अगर कोई यहां बच्ची देने के लिए फोन करता है, तो वह खुद उसे लेने जाती हैं। साथ ही, देने वाले का नाम और पता दोनों ही गुप्त रहता है।  

साल 1993 में मई की 17 तारीख को प्रकाश कौर ने ‘यूनीक होम’ खोला। यहां उनकी बच्चियां रहती हैं। प्रशासन से किसी भी तरह की कोई दिक्कत न हो इसलिए इसे एक ट्रस्ट के ज़रिए खोला गया। यह होम यहां रहनेवाली सभी बच्चियों का सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और नैतिक उत्थान करता है।

प्रकाश कौर के यूनीक होम में बच्चा छोड़ने के लिए भी एक खास जगह बनी है। इसका नाम बेबी क्रेडल है। इस जगह पर न तो कोई कैमरा लगा है, न कोई मौजूद रहता है। हां, यह ज़रूर है कि जब भी इस बेबी क्रेडल में कोई बच्ची रखा जाता है, एक घंटी अपने आप बज जाती है। इससे प्रकाश कौर को पता चल जाता है कि कोई बच्ची छोड़ गया है। इस क्रेडल में आज तक कभी कोई अपना लड़का नहीं रखने आया। प्रकाश बताती हैं कि जो बच्चे यहां आते हैं, वे इतने बीमार होते हैं कि उन्हें 6-6 महीनों तक अस्पताल में रखना पड़ता है। अलजज़ीरा से बात करते हुए वहां काम करने वाले सतनाम सिंह बताते हैं कि इन बच्चों का विकास होने में बाकियों की तुलना में समय ज़्यादा लगता है क्योंकि इन्होंने जन्म के बाद से काफी कुछ सहा होता है। इस यूनीक होम में चाइल्ड वेलफेयर और पुलिस के द्वारा भी बच्चे आते हैं। प्रकाश कौर किसी भी बच्चे को गोद नहीं देती हैं। कई बार परिवार बच्चे को गोद तो ले लेते हैं पर फिर बाद में बुरा बर्ताव करते हैं, इसलिए सभी बच्चियां उनके पास ही रहती हैं। बता दें कि 2011 की जनगणना के हिसाब से, पंजाब में प्रति 1000 लड़कों पर 895 लड़कियां हैं। 

और पढ़ें : अनाथों की मां : पद्मश्री सिंधुताई सपकाल

यूनीक होम और प्रकाश कौर की कई और भी खास बातें हैं। यहां रहने वाली सभी बच्चियों का जन्मदिन हर साल 24 अप्रैल को मनाया जाता है। पूरे 100 किलो का केक कटता है। एक ही दिन सभी बच्चियों का जन्मदिन मनाने की वजह यह है कि किसी को भी नहीं पता कि ये लड़कियां किस – किस दिन पैदा हुईं। प्रकाश कौर के सिख होने के बावजूद सभी लड़कियों के नाम सिख नहीं हैं। यूनीक होम में हर धर्म के नाम की लड़कियां हैं। यहां हर त्योहार मनाया जाता है। दीवाली, होली, ईद, क्रिसमस सब। प्रकाश कौर की सबी लड़कियां शहर के अच्छे स्कूलों में पढ़ती हैं। कुछ मसूरी के बोर्डिंग स्कूल में हैं और तो और कई लड़कियां विदेशों में भी पढ़ रहीं हैं। कोई इंग्लैंड तो कोई कनाडा। उनकी शीबा नाम की बेटी न्यूरोसर्जन बनना चाहती है।

इंडिया टाइम्स से बात करते हुए वह कहती हैं, “मुझे जन्म देने वाली अपनी मां को मैं को साबित करना चाहती हूँ कि जो लड़की उन्होंने छोड़ दी, वो आज अपने पैरों पर खड़ी है। मैं फेमस होना चाहती हूँ ताकि उन्हें बता सकूँ कि लड़कियां बोझ नहीं हैं।” प्रकाश कौर ने अब तक करीब 17 लड़कियों की शादी भी करा दी है। सभी अपने ससुराल में खुश हैं।  साल 2017 में कनाडा के रक्षा मंत्री हरजीत सिंह सज्जन ने उनके यूनीक होम का दौरा किया था। प्रकाश कौर के कामों को सराहा था। देश का चौथा सर्वोच्च नागरिक सम्मान मिलने पर प्रकाश कौर खुश हैं।

और पढ़ें : पद्मश्री मंजम्मा जोगती : एक ट्रांस कलाकार जो बनीं कई लोगों की प्रेरणा


मेरा नाम अदिति अग्निहोत्री है। मैं आईआईएमसी में "हिंदी पत्रकारिता" स्नातकोत्तर डिप्लोमा की विद्यार्थी हूँ। इससे पहले दिल्ली विश्वविद्यालय से मैंने 'हिंदी पत्रकारिता एवं जनसंचार' में स्नातक किया है। मेरा उद्देश्य जनसरोकार और हाशिये के समाज के लोगों के लिए पत्रकारिता करना है। उनकी बात मुख्यधारा की मीडिया में पहुँचाना है।

Follow FII channels on Youtube and Telegram for latest updates.

नारीवादी मीडिया को ज़रूरत है नारीवादी साथियों की

हमारा प्रीमियम कॉन्टेंट और ख़ास ऑफर्स पाएं और हमारा साथ दें ताकि हम एक स्वतंत्र संस्थान के तौर पर अपना काम जारी रख सकें।

फेमिनिज़म इन इंडिया के सदस्य बनें

अपना प्लान चुनें

Leave a Reply