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फिल्म ‘लगान’ में दलित लड़के को अधनंगा सा दिखाना और फिल्म सरपट्टा में कोच रंगन को कुर्सी पर बैठे और एक पंडित ज़मीन को बैठा दिखाया गया है। यह अपने आप में एक बड़ा बदलाव और एक क्रांति है। तमिल फिल्म इंडस्ट्री बॉलीवुड से काफी आगे निकल चुकी है। तमिल फिल्मों में कंटेंट से लेकर सिनेमैटोग्राफी और म्यूजिक तक सब मज़ेदार होते हैं। बॉलीवुड की तरह ‘नेपोकिड्स’ की भरमार नहीं होती। हाल ही में रिलीज़ हुई ऐसी ही एक तमिल फिल्म है ‘सरपट्टा’ जिसमें 1970 के दशक के मद्रास को दिखाया गया है। इसके प्रोड्यूसर आंबेडकरवादी पा रंजीत हैं जो इससे पहले मद्रास, काला, कबाली और परीयेरुम पेरुमल जैसी फिल्में बना चुके हैं। उनकी खासियत ये है कि वह बहुत कुछ कम दिखाते हुए भी सब कुछ कह जाते हैं। 

बात करें फिल्म ‘सरपट्टा’ की कहानी की तो यह एक स्पोर्ट्स ड्रामा फिल्म है जो कि सामाजिक, राजनीतिक पहलुओं को साथ में रखकर बुनी गई है। फिल्म में दो बॉक्सिंग समुदायों को दिखाया गया है जो कि अपने-अपने समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं। निश्चित ही सरपट्टा परंबराई एक दलित समुदाय का समूह है जबकि इदियप्पा सवर्ण समाज का समूह है। दोनों समूह अपनी-अपनी शान के लिए बॉक्सिंग खेलते हैं। कुछ समय से इदियप्पा समूह का ही बॉक्सिंग पर दबदबा था जबकि उसके कुछ साल पहले सरपट्टा के कोच रंगन और उसके साथी बॉक्सिंग में दबदबा रखते थे, जैसा कि कोच रंगन एक सीन में बताते हैं।

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कोच के एक दोस्त की बॉक्सिंग मैच की बहस के चलते हत्या भी कर दी गई थी लेकिन अब उसका लड़का छिप-छिपाकर बॉक्सिंग देखने आ जाता है। वह किसी अनाज की मंडी जैसी जगह पर मज़दूरी का काम कर रहा होता है। इसका नाम कबिलन है और यह बॉक्सिंग करने के लिए इतना उतावला होता है कि मैच देखते-देखते भी उसके हाथ-पांव चलने लगते हैं लेकिन उसकी मां को जब यह पता चलता है कि कबिलन बॉक्सिंग मैच देखने गया था तो उसकी मां उसे झाड़ू से पीटती है और खूब डांटती है। इसके पीछे का कारण यह है कि बॉक्सिंग ने ही उसके पति को छीन लिया और अब वह अपने बेटे को नहीं खोना चाहती थी। एकदिन कबिलन सरपट्टा ग्रुप के एक बॉक्सर को मुकाबले के लिए चुनौती दे डालता है और रिंग में बुरी तरह उसे हरा भी देता है जिसे देखकर कोच रंगन समेत सभी हैरान रह जाते हैं। जिस तरह से उसके हाथ और पांव मैच के दौरान चलते हैं उसे देखकर लगता नहीं था कि इससे पहले कबिलन ने कभी बॉक्सिंग नहीं की।

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पूरी फिल्म में नायक सिर्फ एक नहीं है। कई चेहरे अपने आप में नायक हैं। इसमें कबिलन की मां का संघर्ष है। कोच रंगन का बॉक्सिंग रिंग में सरपट्टा को जिंदा रखने का संघर्ष है और कबिलन का अपने समुदाय के लिए जीतने का संघर्ष है।

अब कोच रंगन को नया बॉक्सर कबिलन के रूप में मिल चुका था। उसका पहला मुकाबला ‘डांसिंग बॉक्सर’ के नाम से प्रसिद्ध बॉक्सर रोज़ से होता है जो एक खतरनाक बॉक्सर होता है। कबिलन उसे दूसरे राउंड में ही बुरी तरह हरा देता है। अब इदियप्पा ग्रुप हारकर बुरी तरह बौखला जाता है और इसी ग्रुप का सबसे शक्तिशाली बॉक्सर वेंबुली कबिलन से कहता है कि अगला मैच उन दोनों के बीच ही होगा जिसकी बात पहले भी हो चुकी थी। अब दोनों अगले मैच की तैयारी करने लगते हैं। कोच रंगन अपने बेटे को चुनने की बजाय कबिलन को मैच के लिए चुनते हैं जिसकी वजह से उसका बेटा बॉक्सिंग होने से एक दिन पहले कबिलन पर हमला कर देता है। सरपट्टा के लिए वह खुद बॉक्सिंग करना चाहता था लेकिन इसके लिए खुद कोच रंगन राज़ी नहीं थे क्योंकि वह जानते थे कि उनका बेटा मैच हार जाएगा।

फिल्म के एक सीन में कबिलन और कोच रंगन, तस्वीर साभार: Indian Express

मैच में कबिलन और वेंबुली दोनों भिड़ते हैं। मैच रोमांच से भर उठता है लेकिन जैसे ही कबिलन मैच जीतने को होता है और वेंबुली बुरी तरह हारता दिखता है तभी इदियप्पा ग्रुप के लोग तोड़फोड़ शुरू कर देते हैं और लकड़ी की कुर्सियां रिंग में खड़े कबिलन पर फेंकने लगते हैं। अफरा-तफरी का माहौल देख इदियप्पा ग्रुप कबिलन को जान से मारने की कोशिश करता है। आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाने के उद्देश्य से चाकू के साथ उसके कपड़े फाड़ उसे नंगा कर देते हैं। भूतपूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के शासनकाल में लगे आपातकाल का ज़िक्र करते हुए कहानी को यहां बिल्कुल अलग मोड़ दिया गया है। तभी मैच के बीच में ही कोच रंगन को जेल में डाल दिया जाता है क्योंकि वह डीएमके पार्टी के सक्रिय सदस्य थे।

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खेल अब खेल नहीं रहा था बल्कि बदला बन गया था। कुछ समय बाद कोच रंगन जेल से छूटते हैं। उनके स्वागत में सभी चाहने वाले जेल के बाहर इकट्ठे होते हैंं। कोच कबिलन को देखकर हैरान हो जाता है क्योंकि अब वह किसी भी नजरिए से बॉक्सर नहीं लग रहा था, उसका पेट बाहर निकल आया था, उसे शराब की लत लग चुकी थी। कुछ समय बाद उसके अंदर का बॉक्सर फिर से ज़िंदा हो जाता है और वह अपने कड़ी मेहनत कर खुद को बॉक्सिंग के लिए तैयार कर लेता है। अब उसका मुकाबला फिर से वेंबुली से ही होना था। दोनों कड़ी मेहनत करते हैं। मैच में पहुंचने से पहले कबिलन पर हमला करवाया जाता है ताकि वह मैच में पहुंचे ही ना। लेकिन उन सबसे भिड़कर कबिलन मैच में पहुंचता है और लड़ता है। कड़ी मशक्कत के बाद वह वेंबुली को पटकनी दे देता है। कबिलन वेंबुली को ऐसा पंच मारता है कि वह दोबारा खड़ा नहीं हो पाता और कबिलन जीत जाता है। इदियप्पा समूह कोच रंगन को पहले ही चुनौती दे चुका था कि यदि वेंबुली कबिलन को हरा देता है तो सरपट्टा समूह कभी बॉक्सिंग नहीं खेलेगा और कोच रंगन उनकी यह शर्त मान चुके थे लेकिन सरपट्टा समुदाय की यह जीत बॉक्सिंग में डटे रहने के लिए भी ज़रूरी थी । कोच रंगन खुशी के मारे रिंग में चढ़ जाते हैं और कबिलन को गले से लगा लेता है। 

पूरी फिल्म में नायक सिर्फ एक नहीं है। कई चेहरे अपने आप में नायक हैं। इसमें कबिलन की मां का संघर्ष है। कोच रंगन का बॉक्सिंग रिंग में सरपट्टा को जिंदा रखने का संघर्ष है और कबिलन का अपने समुदाय के लिए जीतने का संघर्ष है। फिल्म की सिनेमेटोग्राफी कर्णन फिल्म के बराबर की है। ऐसा लगता है कि पा रंजीत गांव में कैमरा सेटअप कर आए हैं और फिल्म के सारे सीन सच्ची घटी घटनाएं लगती हैं। सभी कलाकारों ने जबरदस्त काम किया है। कबिलन के रूप में अभिनेता आर्य ने अभिनय किया है और कोच रंगन के रूप में पसुपथी हैं। बॉक्सिंग मैच के बैकग्राउंड में म्यूजिक ऑडियंस को बंधे रहने पर मजबूर कर देता है। फिल्म में कई जगह पेरियार, बुद्ध और आंबेडकर भी दिखाई पड़ते हैं जो बॉलीवुड जैसी फिल्मों में दीया लेकर ढूंढने से भी नहीं मिलते। ऐसे बेहतरीन मास्टरपीस ज़रूर देखी जानी चाहिए। यह फिल्म सबटाइटल्स के साथ ऐमजॉन प्राइम पर उपलब्ध है।

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रवि सम्बरवाल कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र से बीए मास कम्युनिकेशन में अंतिम वर्ष के छात्र हैं। इन दिनों स्वतंत्र लेखन जीवन का हिस्सा है। किताबें पढ़ने का शौक है। वह जाति विरोधी, आंबेडकरवादी, पत्रकार हैं। आप उन्हें फेसबुक पर फॉलो कर सकते हैं।

तस्वीर साभार : Twitter

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